‘समय, समाज और साहित्य’ का लखनऊ में विमोचन

समय से वैचारिक साक्षात्कार करते हैं कवि कौशल किशोर – शकील सिद्दीकी

लखनऊ में आयोजित पुस्तक मेले के दौरान हर रोज़ कोई न कोई किताब अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही है और उसपर चर्चा किताबों के इस फलक का विस्तार कर रही है। इसी कड़ी में कवि कौशल किशोर की नई किताब समय, समाज और साहित्य  ने भी पाठकों का ध्यान खींचा। जन संस्कृति मंच (जसम) ने इस किताब पर एक गंभीर चर्चा का कार्यक्रम रखा। वरिष्ठ साहित्यकार और अनुवादक शकील सिद्दीकी ने इस कार्यक्रम की  अध्यक्षता करते हुए कहा कि यह किताब समय से साक्षात्कार करती है। इसकी वैचारिकी स्पष्ट है। पिछले 10 साल का समय असामान्य रहा है जिसमें कोरोना जैसी त्रासदी का सामना करना पड़ा। नागरिकता संशोधन के खिलाफ से लेकर अनेक आंदोलन हुए। इन सब का समाज और साहित्य पर असर हुआ। कौशल किशोर इन सब से रूबरू हैं। जो साहित्य इधर लिखा गया उस पर भी विचार है। इस मायने में यह किताब समय और समाज का दस्तावेज है।

परिचर्चा की शुरुआत करते हुए कवि व कथाकार डॉ शैलेश पंडित ने कहा कि ‘ समय, समाज और साहित्य’ इतिहास बोध का लिखित दस्तावेज है। इसमें प्रेमचंद और नेहरू युग से आरंभ कर आज के मोदी युग तक की पड़ताल है । हमारे साहित्य का नाभि नाल उस पूरे दौर से जुड़ा है जिसमें नक्सलबाड़ी का संघर्ष है और जिससे जुड़कर हमारे रचनाकारों ने प्रतिरोध का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इनमें नागार्जुन हैं , पाश हैं, वरवर राव हैं, सरोज दत्त, चेराबंडा राजू और श्री श्री जैसे रचनाकार हैं । संघर्ष की यही विरासत आज के दौर में भी हमें प्रतिरोध के प्रति जागरूक बनाए हुए है। कौशल किशोर ने इतिहास बोध के उस लंबे दौर में रचनात्मक संघर्ष को अंकित किया है जिसमें किसान, मजदूर, श्रमिक वर्ग, महिलाएं, कारखानों-खदानों के किरदारों को प्रमुखता से जगह दी गई है । आज के दौर का रचनात्मक संघर्ष हमसे पहले से कहीं अधिक सजगता और प्रतिबद्धता की मांग करता है।

कवि-कथाकार व आलोचक डॉक्टर उषा राय का कहना था कि अपने समय, समाज और साहित्य की सूक्ष्म ध्वनियों को पकड़ने वाला लेखक ही कुछ मूल्यवान दे पाता है। कौशल किशोर ऐसे ही लेखक, एक्टिविस्ट और प्रखर वक्ता हैं। उनके इस किताब में उनतीस लेख हैं। शायद ही इनमें हिंदी साहित्य की कोई विधा बची हो। कविता, कहानी, लेख, रिपोर्ट, नाटक, आत्मकथा, अनुवाद एवं आलोचना सभी पर लेख हैं। करोना महामारी को धता बताते हुए जिन कविता संग्रहों का उल्लेख आया है वह मनुष्य की अप्रतिम जिजीविषा का द्योतक है।

उन्होंने आगे कहा कि पहला लेख नक्सलबाड़ी पर है, मानों बाकी सभी लेखों पर इसकी छाया हो। वे तमाम आंदोलन जो अपनी जड़ता को तोड़कर उठ खड़े हुए कौशल जी कहते हैं कि वे सभी लोग जो दर्ज होंगे इतिहास में लेकिन मिलेंगे वर्तमान में। आज के जेन जी के आंदोलन को भी इसी सीरीज में देखा जा सकता है। इस किताब में समय, समाज और साहित्य का अद्भुत संतुलन है जो इसे खास और बेहद पठनीय बनाता है। इस किताब में साहित्य की जो अंतर ध्वनि गूंजती है वह कबीर के परम्परा की है जो नागार्जुन, पाश, वरवर राव एवं फिलिस्तीनी कविताओं में दिखाई देती है। वीरेंद्र यादव की आलोचना भी है जो सबॉर्लटन के पक्ष में है। मोदीनामा किताब की समीक्षा है जिसमें सांस्कृतिक धारा की उल्टी गति को खास तौर पर चिंहित किया गया है।

बिहार से आए जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव कवि कुमार विनीताभ ने कहा कि कौशल किशोर अपने समय से संवाद करते हैं। इसमें लेखक की वैचारिक प्रतिबद्धता, जनसंघर्षों से सरोकार और वैज्ञानिक चेतना स्पष्ट परिलक्षित होती है। आज शासक वर्ग वित्तीय- कारपोरेट पूंजी की चाकरी में लगा है। इसकी नवफासीवादी प्रवृत्ति हर तरफ नंगा नाच कर रही है। भारतीय संविधान और साझी सांस्कृतिक विरासत के खिलाफ सत्ता का  चरित्र सबके सामने है। ऐसे दौर में पूंजीपरस्त वर्चस्ववादी सत्ता के प्रतिरोध में जारी अभियान के साथ सजीव सरोकार संस्कृति-कर्म के लिए जरूरी है। इस किताब से सामाजिक-आर्थिक- राजनीतिक अंतर्विरोधों को साहित्य का विषय बनाने और अपने सृजन को जनता के बीच ले जाने की दृष्टि मिलती है। निश्चित रूप से लेखक के निजी अनुभवों से लिखे गए इन आलेखों से जन पक्षधर नये रचनाकारों को अपने लेखन की दिशा तय करने में मदद मिलेगी।

उन्नाव से आए साहित्यकार दिनेश प्रियमन ने वीरेंद्र यादव को याद करते हुए कहा कि साल भर पहले यह कार्यक्रम उनकी अध्यक्षता में होना था। आज उनकी कमी महसूस की जा रही है। उन्होंने अपनी आलोचना के केंद्र में देश नहीं ‘देस’ को रखा यानी हाशिए का समाज।कौशल किशोर उनकी आलोचना पद्धति के साथ संवाद करते हैं। किताब में इनकी वैचारिक दृष्टि है। शोषक व प्रतिक्रियावादी शक्तियों की शिनाख्त है। महिलाओं, किसानों आदि के आंदोलन हैं। यहां वैचारिक दृढ़ता मिलती है लेकिन इसमें जड़ता नहीं है।

कार्यक्रम में भगवान स्वरूप कटियार, सईदा सायरा, प्रोफेसर इशरत नाहिद, डॉ अवन्तिका सिंह, डॉ हेमन्त कुमार, डॉ मन्दाकिनी राय, प्रेमलता राय, अलका पाण्डेय, शालिनी श्रीवास्तव, शहंशाह हुसैन, सुहेल वहीद, अजय शर्मा, आशीष सिंह, अनिल कुमार श्रीवास्तव, अखिलेश मयंक, राज शर्मा, सुचित माथुर, ए शर्मा, राकेश कुमार सैनी, के के शुक्ला, ज्योति राय, ओ पी सिन्हा, हेमेंद्र मिश्रा, रामायण प्रकाश, विवेक पडालिया आदि की मौजूदगी रही।

जन संस्कृति मंच, लखनऊ की प्रेस विज्ञप्ति

Posted Date:

October 7, 2026

10:50 pm

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