सिनेमा की दुनिया संस्कृति, समाज और साहित्य की अनूठी मिसाल है। यहां किस्सागोई भी है, हकीकत भी, अभिनय और कला के तमाम आयाम भी। देश और दुनिया की संस्कृति को आप इसके ज़रिये जितना देख पाते हैं, समसामयिक विषयों से जुड़ी घटनाओं और किरदारों को करीब से देख पाते हैं और साथ ही मनोरंजन और संगीत का अद्भुत जो सिल्वर स्क्रीन पर मिलता है, वो कहीं और मिलना मुश्किल है। बेशक सेलुलाइड का अपना गणित है और तकनीक का अपना संसार, लेकिन दुनिया भर में यह संप्रेषण का सबसे असरदार माध्यम है।

इतनी कामयाबी, इतनी शोहरत... लेकिन एक ऐसा अकेलापन जिसने एक बेहतरीन और संभावनाओं से भरे कलाकार को खुदकुशी जैसी कायराना हरकत करने को मजबूर कर दिया। कोरोना काल के तमाम खतरनाक संकटों में से एक सबसे बड़ा संकट डिप्रेशन को लेकर नजर आता है जिसके शिकार आम-ओ-खास होते दिख रहे हैं।
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एक लेखक के कितने आयाम हो सकते हैं, समाजवाद और इंसानियत के प्रति उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता किस हद तक हो सकती है ये समझने के लिए हमें ख्वाज़ा अहमद अब्बास की ज़िंदगी को करीब से देखना चाहिए। आज़ादी के आंदोलन के दौरान ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने इप्टा से जुड़कर तमाम इंकलाबी और तरक्कीपसंद हस्तियों के साथ तो काम किया ही, अपने लेखन को बचपन से जिंदगी के आखिरी दिनों तक बदस्तूर जारी रखा। एक पत्रकार
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आज फिल्मों का जो दौर चल रहा है, उसमें बासु चटर्जी जैसे फिल्मकार की गैर मौजूदगी भीतर कहीं एक शून्य पैदा करती है। उम्र को अगर नज़रअंदाज कर दें तो बासु दा के भीतर ज़िंदगी को देखने का अपना जो नज़रिया रहा वो 60 के दशक से आज तक वैसा ही रहा। आखिरी दिनों में भी उनके भीतर का फिल्मकार विषय तलाशता रहा लेकिन पिछले कुछ बरसों से वो चाहकर भी कुछ नया दे नहीं पाए। साहित्य में उनकी खासी दिलचस्पी थी और उनक
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इक्कीसवीं सदी शुरु हो चुकी थी और बीसवीं सदी ने जाते जाते बॉलीवुड संगीत की दुनिया को एक नई शक्ल दे दी थी। इस नए दौर और संगीत के नए माहौल में भला नौशाद के संगीत को उतनी तवज्जो कैसे मिल सकती थी जितनी इस दौर के धूम धड़ाम वाले संगीतकारों को मिलती है। 5 मई 2006 को जब संगीतकार नौशाद ने दुनिया को अलविदा कहा, तब भी उनके भीतर यही दर्द छलकता रहा - 'मुझे आज भी ऐसा लगता है कि अभी तक न मेरी संगीत की तालीम पूर
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सत्यजीत रे की फिल्में देखते हुए आपको अपने आसपास की जन्दगी, सामाजिक सच्चाइयों और उनकी गहरी कला दृष्टि का एहसास होता है। आज के दौर के फिल्मकारों को उनसे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है... जन्मशती वर्ष पर रे को नमन...
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बॉलीवुड ही नहीं पूरा देश सदमे में है। आखिर ये क्या हो रहा है। इरफ़ान के जाने का ग़म और अब बेहद ज़िंदादिल ऋषि कपूर के ऐसे चले जाने का सदमा। एक ऐसे कलाकार जिसकी सूरत में एक मुस्कराहट और सकारात्कता की झलक हमेशा रही... इरफ़ान और ऋषि कपूर में बुनियादी फर्क ये कि ऋषि को बॉलीवुड विरासत में मिला तो इरफ़ान ने इसे अपने संघर्षों से हासिल किया... एक राजस्थान के छोटे से शहर टोंक से जयपुर और एनएसडी (दि
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इरफान खान का जाना एक सदमे की तरह है। महज 53 साल की उम्र में इस कलाकार ने अपने संघर्षों और खास अंदाज़ की वजह से अपनी जगह बनाई। बॉलीवुड के साथ साथ करोड़ों दर्शकों के दिलों में अपनी छाप छोड़ी। बिंदास अंदाज़ में ज़िंदगी को लेने वाले और बेहद संवेदनशील तरीके से समाज को देखने वाले इस अभिनेता ने अपनी खास शैली बनाई...चाहे वह अपनी बेहद गंभीर और गहरी आंखों से बहुत कुछ कह देने का अंदाज़ हो या फिर डॉ
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जाने माने रंगकर्मी और फिल्मकार गिरीश कर्नाड नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद आज सुबह उन्होंने दुनिय को अलविदा कह दिया। गिरीश कर्नाड अपने मशहूर नाटक तुगलक और फिल्मों में अपने अहम किरदारों की वजह से खासे चर्चित रहे और कन्नड़ साहित्य में उनका जबरदस्त योगदान रहा है। कर्नाड कन्नड़ भाषा के सशक्त हस्ताक्षर होने के साथ ही नाटककार, अभिनेता और फ़िल्म निर्देशक थे।
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अपने बिंदास अंदाज़ और बेहतरीन अदाकारी के लिए मशहूर कंगना रनौत की फिल्म ‘मणिकर्णिका : द क्वीन ऑफ झांसी ’ का सबको बेसब्री से इंतज़ार है। फिलहाल इस फिल्म के दो गीत रिलीज़ हो चुके हैं। दिल्ली से सटे गुरुग्राम के किंगडम ऑफ़ ड्रीम्स में हुए एक भव्य और रंगारंग कार्यक्रम में फिल्म का दूसरा गाना ‘भारत’ रिलीज किया गया। इसके लिए खास तैयारियां की गई थीं और किंगडम ऑफ़ ड्रीम्स को राजशाही लुक दि
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