देश विदेश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े तमाम कार्यक्रम होते हैं, ढेर सारी गतिविधियां होती हैं। कई ख़बरें भी होती हैं जो हम तक नहीं पहुंच पातीं। गोष्ठियां, कार्यशालाएं होती हैं, रंगकर्म की तमाम विधाओं की झलक मिलती है और लोक संस्कृति के कई रूप दिखते हैं। नए कलाकार, नई प्रतिभाएं और संस्थाएं साहित्य-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिशों में लगे रहते हैं लेकिन उनकी जानकारी कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। हमारी कोशिश है कि इस खंड में हम ऐसी ही गतिविधियों और ख़बरों को शामिल करें … चित्रों और वीडियो के साथ।


स्त्री सशक्तिकरण के इस दौर में जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियाँ आगे बढ़ रही हैं।भला वे साहित्य की दुनिया में पीछे क्यों रहे। महादेवी वर्मा सुभद्रा कुमारी चौहान शिवानी अमृता प्रीतम कृष्णा सोबती और मंन्नू भंडारी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए लेखिकाएँ साहित्य की हर विधा में रच रही हैं। विश्व पुस्तक मेला में एंट्री फ्री होने से पुस्तक प्रेमियों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ तो लेखिकाओं और म
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“कविता का स्वभाव औरत के स्वभाव से मिलता-जुलता है। कविता इशारों में बात करती है, यही एक स्त्री के जीवन का शिल्प है । “ हिंदी की प्रसिद्ध कवयित्री अनामिका ने विश्व पुस्तक मेले के उद्घटान दिवस पर साहित्य अकादमी के कार्यक्रम में यह विचार व्यक्त किये। सहित्य अकादमी सम्मान से विभूषित कवयित्री अनामिका ने अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में संवाद करते हुए कहा कि अपने बारे में बात करना मुश्
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क्या आप कुदपोली के अनाम स्वतंत्रता सेनानियों को जानते हैं जिन्होंने 1857 से 21 साल पहले सशत्र विद्रोह किया था? 53 वें विश्व पुस्तक मेले में इस विद्रोह के बारे में पुस्तक के लोकार्पण से शुरू हुआ उद्घाटन समारोह के दौरान इन अनाम स्वतंत्रता सेनानियों का ज़िक्र हुआ। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ‘द सागा ऑफ कुदोपली: द अनसंग स्टोरी ऑफ 1857’ के अनूदित संस्करणों का विमोचन किया। यह प
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स्त्री दर्पण नामक ऐतिहासिक पत्रिका की संपादक और जानी मानी समाजिक कार्यकर्ता रामेश्वरी नेहरू को लखनऊ में याद किया गया। इस मौके पर स्त्री लेखा पत्रिका के नए अंक का लोकार्पण प्रो. रूपरेखा वर्मा, वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना, प्रो रमेश दीक्षित, आलोचक वीरेन्द्र यादव और कवि कात्यायनी ने किया। स्त्री विमर्श केवल अस्मिता विमर्श नहीं है बल्कि वह दुनिया को बदलने का एक व्यापक विमर्श है।
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भारतीय मूर्तिकारों, शिल्पकारों ने हमारी आधुनिक संवेदनाओं, जीवन और मिजाज को किस तरह पकड़ा है और इन सौ सालों में कला को, समाज को और राष्ट्र को क्या दिया है। पिछले दिनों इस आकलन की कोशिक के तहत प्रोग्रेसिव आर्ट गैलरी और रजा फाउंडेशन ने त्रिवेणी कला संगम की श्रीधरणी आर्ट गैलरी में एक अनोखी प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसमें गत 100 वर्षों की मूर्तिकला को सामूहिक रूप से पेश किया गया। इसे क्यूरे
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निर्भया कांड पर बनी बीबीसी की एक डाक्यूमेंटरी देख रही थी। उनमें से एक आरोपी की मां ने अपने इंटरव्यू में कहा “हमारा बेटा ऐसा नहीं कर सकता। वो तो बहुत अच्छा है।” तब एक कविता लिखी थी “मैं लड़का नहीं जन्मूंगीं” फिर एक नाटक लिखा “यत्र-तत्र-सर्वत्र” उसे करने पर बहुत से लोगों ने कहा तुम भी फंसोगी, हमें भी जूते पड़वाओगी। क्योंकि उस नाटक में पूरी समाजनीति और राजनिति दोनों पर सवाल उठाए गए थे।
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“लिखत पोएटिका – क” (प्रकाशक - पाखी रे क्रियेटिव्स, जयपुर) नाम से आई इस पुस्तक में 95 रचनाकारों की एक-एक रचना शामिल है। इनमें चर्चित नाम भी हैं और नवोदित भी। संग्रह के शुरू में इरशाद कामिल और तस्वीर कामिल के संबोधन (“कविता के नाम” और “आपको इकबाल मुबारक”) भी हैं। “कविता के नाम” और “आपको इकबाल मुबारक” के लिए इतना ही कहा जा सकता है कि अगर आप किसी बेमिसाल उपन्यास या कहानी को पढ़ने के बाद ल
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‘उन्मेष’ अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव के तीसरे संस्करण का आयोजन इस बार पटना में 25 से 28 सितंबर 2025 के बीच सम्राट अशोक कन्वेंशन सेंटर में होगा। इस उत्सव का आयोजन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय एवं साहित्य अकादेमी द्वारा संयुक्त रूप से बिहार सरकार के सहयोग से किया जा रहा है। यह जानकारी आज इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित प्रेस सम्मेलन में संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक
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