60 मास्टर कलाकारों की प्रदर्शनी

भारत में आधुनिकता का जन्म कैसे हुआ, इसको लेकर पहले यह अवधारणा रही कि यह आधुनिकता पश्चिम से आयातित है यानी जब भारत का संपर्क पश्चिमी देशों से हुआ और वहां से ज्ञान विज्ञान की शाखाएं भारत में फैली तो यहां आधुनिकता का जन्म हुआ लेकिन अब इस आधुनिकता को लेकर एक नई तरह की अवधारणा विकसित हो रही है कि भारतीय आधुनिकता का उत्स भारत में ही है,उसका उत्स पश्चिम में नहीं है भले ही पश्चिम के साथ उसका संवाद हुआ हो ज्ञान विज्ञानं और संस्कृति का आदान प्रदान हुआ हो.साहित्य ही नहीं विभिन्न कलाओं में भी इस अवधारणा को लेकर आज कल कुछ वर्षो से विचार विमर्श शुरू हो गया है.गत दिनों टैगोर की चित्रकला पर अपने लेक्चर में अशौक भौमिक ने कहा कि भारत मे आधुनिक चित्रकला के जनक राजा रवि वर्मा नहीं बल्कि टैगोर हैं।बंगाल स्कूल के चित्रकारों की कलाकृतियों में आधुनिकता की एक झलक देखी जा सकती है जो अमृता शेरगिल तक आते आते पुष्ट दिखाई देती है।
त्रिवेणी कला संगम में रजा फाउंडेशन और प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप की ओर से संयुक्त रूप से आयोजित चित्रप्रदर्शनी ”Making the Modern“ को देखने के बाद यह एहसास हुआ कि भारतीय चित्रकला में आधुनिकता का जन्म तो भारतीय संदर्भों और भारतीय चित्त सौंदर्य बोध के बीच विकसित हुआ है.
इस प्रदर्शनी में 19वीं और 20वीं सदी के 60 मास्टर कलाकारों के चित्रों और कलाकृतियों को शामिल किया गया है। इनमें 1834 को होरेस वैन रुथ से लेकर राजा रवि वर्मा , रविंद्र नाथ टैगोर और अबनिंद्र नाथ टैगोर,जामिनी राय, नंदलाल बसु से लेकर प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप के जाने माने चित्रकारों रजा , गायतोंडे, हुसैन, आरा सूजा.कृष्णा खन्ना तथा आजादी के बाद कला की दुनिया में छाए अनेक कलाकार शामिल हैँ। इस तरह कला की चार -पांच पीढ़ी शामिल हैँ। इसके बाद दो तीन और पीढ़ी सक्रिय है.इस तरह देखा जाए भारतीय कला परम्परा और आधुनिकता से लेकर उत्तर आधुनिकता के दौर में पहुँच गयीं है.
इस प्रदर्शनी को क्यूरेटर यशोधरा डालमिया ने किया है,उन्होंने भी भारतीय चित्रकला के आधुनिकता का जिक्र करते हुए कहा कि यह आयातित नहीं थी।
अशोक वाजपयी का भी कहना था कि आधुनिक भारतीय कला भारतीय यथार्थ, अनुभव और विचार की जटिल बहुलता को संबोधित करती है, उसका अन्वेषण करती है, उसका उत्सव मनाती है।”
प्रदर्शनी में ए ए अलमेलकर, अकबर पदमसी, अंबादास खोब्रागड़े, अमृता शेरगिल, अर्पिता सिंह, बी एनआर्य, बी प्रभा, बी विट्ठल, भानु अथैया, भूपेन खाखर, बिकास भट्टाचार्जी, बिरेन डे चिंतामणि कर, चित्तोप्रसाद भट्टाचार्य, गणेश हलोई ,गणेश पाइन,गोपाल घोष, एच ए गाडे, हिम्मत शाह, जगदीश स्वामीनाथन, जोगेन चौधरी, के के हेब्बार, के एस राधाकृष्णन, कार्तिक चंद्र पाइन, कृष्ण खन्ना, एम ए महबूब, माधव सातवलेकर, मंजीत बावा, मकबूल फ़िदा हुसैन, मीरा मुखर्जी ,मृणाल कांति दास, मृणालिनी मुखर्जी, नारायण एस बेंद्रे, नसरीन मोहामेदी, परितोष सेन, प्रभाकर बर्वे, प्रदोष दासगुप्ता, प्रकाश कर्माकर,रामकिंकर बैज ,रामकुमार एस धनपाल ,एस के बाकरे, एस नंदगोपाल, शैलोज मुखर्जी, सतीश गुजराल, शांति डे, श्यामल दत्ता रे ,सोमनाथ होरे ,वी एस गायतोंडे, यशवंत देवलालिकर और ज़रीना हाशमी हैँ.
अशोक वाजपेयी ने इसके कैटलॉग में लिखा है – भारत की दृश्य कलाओं में आधुनिकता उतनी ही गतिशील, बहु-स्तरीय, जटिल और बहुलतावादी रही है, जितना कि भारत में आधुनिक जीवन। एक सदी से अधिक की यह यात्रा लंबी और रोमांचक रही है, जिसमें रचनात्मक अभिव्यक्ति के नए मुहावरों और भाषाओं, संभावनाओं और चिंताओं, कई अप्रत्याशित मोड़ों और विचलनों की कई खोजें हुई हैं।”
उनका कहना है कि भारतीय कला ने अपने स्वयं के अतीत को विरासत में लिया है, खुद को बाहरी प्रभावों के लिए खोला है, और आत्मविश्वास, रचनात्मकता और साहस के साथ कला की वैश्विक बातचीत में भाग लिया है।”
हालांकि इसी कैटलॉग में हर्षवर्धन सिंह लिखते हैँ – “यह प्रदर्शनी भारतीय आधुनिकतावाद को परिभाषित करने का प्रयास नहीं करती। बल्कि, यह इसकी बहुलता का उत्सव मनाती है। इन कलाकारों ने केवल आधुनिक भारत के निर्माण का दस्तावेजीकरण नहीं किया – उन्होंने इसमें सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने विरासत में मिली धारणाओं को चुनौती दी, दुनिया भर से प्रभावों को आत्मसात किया, भारतीय परंपराओं की ओर लौटे, उन्हें फिर से आविष्कृत किया और नई दृश्य भाषाएँ बनाईं जो गहरी भारतीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुंजायमान दोनों थीं। ऐसे समय में जब भारतीय कला ने वैश्विक मंच पर एक असाधारण उपस्थिति हासिल की है, उन कलाकारों को फिर से याद करना महत्वपूर्ण है जिन्होंने इस उल्लेखनीय यात्रा की नींव रखी। “
इस प्रदर्शनी में बंगाल स्कूल के चित्रकार हैं तो प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप के भी चित्रकार हैं ।इसके अलावा आजादी के बाद के चित्रकार मसलन जे स्वामीनाथन मनजीत बाबा हिम्मत शाह जैसे लोग भी शामिल हैं। इन सभी चित्रकारों के काम को देखें तो मीडियम की विविधता तो है ही विषय वस्तु की विविधिता है और कला मुहावरों की भी विविधता है। शहरी और लोक जीवन के भी रंग है। इस तरह एक भरा पूरा हिंदुस्तान है क्योंकि इसमें दिल्ली, कोलकत्ता, चेनई, मुम्बई, इंदौर, बड़ोदरा जैसे शहरों के कलाकार हैं।,इसमें चित्त प्रसाद और रामकिंकर बैज जैसे लोग भी हैं जो साधारण जन को चित्रित करते हैं। इंसमे विकास भट्टाचार्य का एक रिक्शावाला भी है, बी प्रभा की एक ग्रामीण महिला भी है, भानु मुथैया की महिलाएं भी, सोमनाथ होर का एक तांगा घोड़ा भी है जो हुसैन के घोड़े से अलग है रामकिंकर बैज का एक मुर्गा भी है सूजा द्वारा बनाई गई गोआ की एक लड़की भी है।यानी जितनी विविधता जीवन और समाज मे है वह सब इस प्रदर्शनी में है।
अशोक जी ने कहा भी कि एक कलाकार ने पूछा कि इसमें मैं क्यों नहीं हूँ तो मैंने उनसे कहा कि यह संचयन प्रोग्रेसिव आर्ट गैलरी के चित्रों के भंडार से हुआ है. हो सकता है कि आपकी कलकृति उनके पास न रही हो। शायद अशोक जी की इस बात में दम लगता है क्योंकि इसमें विनोद बिहारी मुख़र्जी की पेंटिंग नहीं है। सम्भव है गैलरी के पास न रही हो. इसमें अंजलि एला मेनन, गुलाम मोहम्मद शेख, माधवी पारेख, अर्पणा कौर आदि जैसे कलाकार भी नहीं हैँ। बहरहाल यह प्रदर्शनी एक साथ भारतीय चित्रकला के सौ – सवा सौ साल के सफर की एक झांकी पेश करती है।
कला समीक्षक ज्योतिष जोशी कहते हैँ कि ललित कला अकदमी और नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट के पास अथाह भंडार है। उन्होंने पहले इस तरह की प्रदर्शनी लगाई है। लेकिन यह सच है कि गत दस पंद्रह सालों में इस तरह की प्रदर्शनी नहीं लगी। दरअसल,किसी एक गैलरी और फाउंडेशन नहीं बल्कि सभी संस्थाओं को आपस में मिलकर एक विशाल प्रदर्शनी निकालनी चाहिए ताकि करीब डेढ़ वर्षो का इतिहास एक जगह नजर आए.
बहरहाल, इस प्रदर्शनी से भारतीय चित्रकला की विविधता और समृद्धि का पता तो चलता ही है तथा बदलते सौंदर्य बोध एवं मुहावरों की एक झलक भी देखनो को मिल जाती है. उम्मीद है,आम दर्शकों तथा नई पीढ़ी के लिए ऐसी प्रर्दशनी सहायक साबित होगी.
— अरविंद कुमार
Posted Date:October 19, 2026
9:38 am Tags: अशोक वाजपेयी, रज़ा फाउंडेशन, चित्र प्रदर्शनी