
बेशक संगीत की दुनिया बदल गई हो, पार्श्वगायन का अंदाज़ बदल गया हो, इलेक्ट्रानिक और एआई तकनीक ने संगीत के मूल तत्व, गायन शैली, आवाज़ का अंदाज़ सबकुछ बदल दिया हो, लेकिन साठ और सत्तर के दशक के सदाबहार गायक-गायिकाओं, संगीतकारों और गीतकारों ने जो खज़ाना दे दिया, वह अमूल्य है। आज भी हरेक की वही पसंद है। किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, मन्ना जे, तलत महमूद, हेमंत कुमार से लेकर शमशाद

ग़ाजियाबाद में साहित्य की नई धारा बहने लगी है, कवियों और शायरों ने यहां समां बांध रखा है। चाहे कथा संवाद हो या बारादरी, कहानी और शायरी के नए रंग फूटने लगे हैं। कई वरिष्ठ तो कई नए रचनाकारों की सक्रियता ने यहां शब्दों और भावनाओं की रचनात्मक अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया है। इस बार की बारादरी में मशहूर शायर और कार्यक्रम के अध्यक्ष मोईन शादाब ने कहा कि गंगा जमुनी तहजीब की म


ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है... बेशक 1957 में आई प्यासा में साहिर लुधियानवी की इन बेहतरीन पंक्तियों को मोहम्मद रफ़ी ने जो दर्द भरी आवाज़ दी और इसे जिस किरदार ने परदे पर जीवंत कर दिया उस गुरुदत्त साहब को आ

साहित्य में विवाद अक्सर होते रहे हैं। चाहे लेखन पर, चाहे तथ्यों को पेश करने पर, चाहे भाषा पर या बड़े लेखकों की ज़िंदगी से जुड़ी सच्चाइयों पर। कथा सम्राट प्रेमचंद की ज़िंदगी, उनके लेखन, उनकी सादगी, उनके दर्शन या पत्रकारिता को लेकर बहुत कुछ लिखा, पढ़ा और बोला जाता रहा है। उनका तकरीबन सारा साहित्य उपलब्ध भी है और उनके उपन्यास, कहानियां और लेखन आज भी सबसे ज्यादा पढ़ा भी जाता



साहित्य के मौजूदा स्वरूप और चुनौतियों के बारे में अक्सर चर्चाएं होती रही हैं, समकालीन लेखन से लेकर तकनीक के इस बदलते दौर में पढ़ने लिखने की छूटती आदत पर भी चिंता जताई जाती रही है, लेकिन साहित्य अकादमी ने दो दिनों तक जो चर्चा की उसमें इसके तमाम पहलू सामने आए। खास बात यह कि यह पूरा आयोजन राष्ट्रपति भवन के सांस्कृतिक केन्द्र में हुआ और खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने