समसामयिक सवालों पर अपनी तीखी नज़र डालने वाले रचनाकार आलोक यात्री ने देख तमाशा दुनिया का कॉलम की शुरुआत की थी… कुछ साल पहले तक लगातार आलोक यात्री ने इस सिलसिले का बरकरार रखा.. फिर इसे आगे बढ़ाने का काम किया अनिल त्रिवेदी ने… और अब एक बार फिर आपके सामने है आलोक यात्री की ताज़ा रचना… देश की मुख्यधारा की मीडिया कहे जाने वाले चैनलों और उनके महान एंकरों के अर्थशास्त्र और इतिहास के ज्ञान पर…
गोदी मीडिया आजकल खान सर की भूमिका में हैं। वह भी ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान…’ की तर्ज़ पर। छोटे पर्दे पर आ कर एंकर पूरे दिन ज्ञान देते हैं। अच्छा खासा रिमोट भी एक महीने में आत्महत्या कर लेता है। मेरा आरोप है कि महीने भर में रिमोट के आत्महत्या करने के लिए एंकर की पूरी फौज जिम्मेदार है। कोई सा बटन दबा लो एक ही ज्ञान सुनने को मिलता है। बस चेहरा बदल जाता है। ललिता पवार चली गईं, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे, लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे अधिकांश एंकर ललिता पवार जैसी लगती हैं।
रिमोट के आत्महत्या करने के बाद कसम खाता हूं कि बस… तौबा!! लेकिन एंकर के बिन घर सूना… श्रीमती जी का फरमान हमें अर्णब गोस्वामी की दहाड़ जैसा लगता है। ऐसी दहाड़ के बाद हम जैसे गीदड़ की क्या औकात…? दिल पर पत्थर रख कर ऑनलाइन का डबल खर्च बर्दाश्त करना पड़ता है।
प्राइम टाइम वेला में घर लौटे तो पर्दे पर गोदी मीडिया की कुख्यात एंकर मौजूद थी। जो देश की जीडीपी को लेकर अपने आंकड़ों के जरिए यह साबित करने पर आमादा थी कि देश की आर्थिक वृद्धि दर का पैमाना असल में ऊपर कैसे रहा? कई छप्पन इंचियों के बीच एक बत्तीस इंची बैठा अपनी दलील दे रहा था कि असल में आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि वह दो जमा दो का नतीजा सात नज़र आए… या 7.8 दिखाई दे… जो कि…
बत्तीस इंची की दलील सुनते ही एंकर को शायद मिर्ची लग गई थी। एंकर ने छप्पन इंचियों को अवसर देने के बजाए खुद ही मोर्चा संभाल लिया और यह समझाने लगी कि हरी मिर्च असल में तीखी नहीं होती… आप की सोच ही दकियानूसी है। लोग मारुति 800 से निकल कर स्विफ्ट डिजायर पर आ गए और आप अभी भी भोजन में हरी मिर्च पर अटके हुए हैं। हरी मिर्च के बजाए शिमला मिर्च खाइए… फिर बताइए… हरि मिर्च कहां तीखी है…?
सौजन्य – अनफिल्टर्ड भारत
और फिर… शिमला मिर्च के फायदे बताने लगी। और अचानक इतिहास की भाषा में अर्थशास्त्र पढ़ाने लगी… देखिए… सोने की चमक देखिए… आज से पहले आपने कभी सोने में ऐसी चमक देखी है…? जब से हम विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की दौड़ में शामिल हुए हैं तब से सोने में निरंतर निखार आता जा रहा है…
अचानक उसने बत्तीस इंची की ओर रुख किया और उसे गरियाना शुरू कर दिया “आप अपने पिछड़ेपन से मुक्त नहीं हो रहे हैं… आज भी बिजली, पेट्रोल, चीनी, दवा के बढ़ते दामों का रोना रो रहे हैं… गनिमत मनाइए इनकी राशनिंग नहीं हो रही… खुले बाजार में उपलब्ध तो हैं।
अरे भाई… सौ बात की एक बात… मिर्ची तीखी लगती है तो खा क्यों रहे हो…?
खाते भी हो और इसके तीखेपन के लिए सरकार को कोसते हो…। अब मिर्ची लगी है तो चीनी खाओ…”
इतना सुनते सुनते हमें वास्तव में मिर्ची लगने लगी। मिर्ची लगना स्वाभाविक था। हमारे प्राइम टाइम का चीर हरण ही हो रहा था। जी में आया एंकर के मुंह पर रिमोट दे मारें। लेकिन अगले ही पल ख्याल आया कि कंगाली में आटा क्यों गीला किया जाए…? श्रीमती जी की शान में गुस्ताखी करते हुए हमने टीवी ऑफ करने में ही भलाई समझी।
आलोक यात्री
कवि, कहानीकार और व्यंग्यकार
Posted Date:September 5, 2026
4:10 pm Tags: alok yatree