देश विदेश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े तमाम कार्यक्रम होते हैं, ढेर सारी गतिविधियां होती हैं। कई ख़बरें भी होती हैं जो हम तक नहीं पहुंच पातीं। गोष्ठियां, कार्यशालाएं होती हैं, रंगकर्म की तमाम विधाओं की झलक मिलती है और लोक संस्कृति के कई रूप दिखते हैं। नए कलाकार, नई प्रतिभाएं और संस्थाएं साहित्य-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिशों में लगे रहते हैं लेकिन उनकी जानकारी कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। हमारी कोशिश है कि इस खंड में हम ऐसी ही गतिविधियों और ख़बरों को शामिल करें … चित्रों और वीडियो के साथ।

अगर आप ‘गूंज’ के संस्थापक अंशू गुप्ता के काम को देखेंगे या उनकी तस्वीरों को महसूस करेंगे तो आपको सचमुच ये समझ में आ जाएगा कि मिथक और वास्तविकता में कितना फर्क होता है। अंशू मूलत: एक फोटोग्राफर रहे हैं। नब्बे के दशक में उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान से फोटोग्राफी और विज्ञापन-जनसंपर्क के क्षेत्र में औपचारिक पढ़ाई की, कुछ साल प्रतिष्ठित अखबारों के लिए काम भी किया, लेकिन उनका मन कह
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अगर आज साहित्यकार और राजनेता डॉ शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव होते तो शायद संस्कृति और राजनीति के मौजूदा स्वरूप में कुछ न कुछ नया और सकारात्मक ज़रूर होता। जिस तरह उन्होंने साहित्य, भाषा और संस्कृति को समृद्ध करने में बेहद सरलता और मज़बूती के साथ अपना योगदान दिया, वैसा आज के राजनेताओं के लिए मुश्किल है। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डा शैलेंद्र नाथ श्रीवास्तव एक शिक्षाविद होने के नाते ह
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23 मार्च की खास अहमियत है। देश भर में इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन तीन क्रान्तिकारियों - भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गयी थी। इसी दिन पंजाबी के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश को खालिस्तानी आतंकवादियों ने अपनी गोली का निशाना बनाया था। 25 मार्च को दंगाइयों ने गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी थी। इन शहीदों की याद में लखनऊ कें कैसरबाग स्थित इप्टा के प्
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रंगमंच की दुनिया में नए नए प्रयोगों और कई नए नाटकों के मंचन के साथ 20वां भारत रंग महोत्सव खत्म हो गया। कथक की पाठशाला कहे जाने वाले पद्मविभूषण पंडित बिरजू महाराज को इस मौके पर सुनना एक अनुभव था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अपने गहरे जुड़ाव और तमाम नृत्यशैलियों के साथ नाटकों की प्रस्तुतियों के बारे में पंडित बिरजू महाराज से बेहतर भला कौन बोल सकता है। आखिरी दिन कमानी सभागार में पंडि
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रोहित वेमुला की आत्महत्या और उसके बाद उठे जनाक्रोश ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। दलित राजनीति के नाम पर वेमुला की खुदकुशी एक बड़ा मुद्दा बनी लेकिन इस घटना के पीछे के सच को तलाशने की कोशिश सही तरीके से कभी नहीं हुई। इस घटना के चार साल बाद फिल्मकार दीपा धनराज ने इस पूरी घटना पर और इसके तमाम पहलुओं पर फिल्म बनाई – वी हैव नॉट कम हियर टू डाई ।
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हिन्दी साहित्य व संस्कृति की पत्रिका ‘रेवान्त’ की ओर से हर साल दिया जाने वाला प्रतिष्ठित ‘रेवान्त मुक्तिबोध साहित्य सम्मान - 2018’ के लिए उनका चयन किया गया था। यह सम्मान उन्हें कैफी आजमी एकेडमी, निशातगंज के सभागार में आयोजित भव्य समारोह में दिया गया जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार व उपन्यासकार शिवमूर्ति ने की। लखनऊ के साहित्य जगत के लिए यह सुखद, आत्मीय और अविस्मरणीय पल था जिसमें ब
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महात्मा गांधी को देश अपने अपने तरीके से याद कर रहा है। तमाम सरकारी और निजी संस्थाएं भी उन्हें नमन कर रही हैं। लेकिन गांधी अपने तमाम रूपों में कलाकारों के लिए भी एक प्रिय पात्र रहे हैं। गांधी जी के व्यक्तित्व और दर्शन को केन्द्र में रखकर कलाकारों ने अलग अलग कालखंडों में अपनी अभिव्यक्ति की है। अपनी विशाल और अद्भुत मूर्ति शिल्पकला के लिए दुनियाभर में मशहूर हो चुके वयोवृद्ध कलाकार पद
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हिन्दी कविता की जो सुदीर्घ परम्परा है, उसकी समकालीन काव्य धारा के शीर्ष पर गोरख पाण्डेय है। एक तरफ उनमें जहां क्रान्तिकारी विचार की गहराई है, वहीं उनका शिल्प इस कदर तराशा हुआ है कि उसका सौदर्य देखते ही बनता है। जहां समकालीन कविता में मध्यवर्गीय बौद्धिक चिन्तन हावी है जिसका आम जनता से संवाद नहीं है, वहीं गोरख अकेले या अग्रणी कवि हैं जो संवाद करते हैं। इनके काव्य में सादगी है, अभिधा क
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दुनिया के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन्मदिन के मौक़े पर आगरा और उत्तर भारत की जानी मानी सांस्कृतिक संस्था रंगलीला की ओर से 'जश्न-ए-फ़ैज़ 19' आने वाली 14 फ़रवरी की शाम 'सूरसदन' में होने वाला है। पिछले साल यानी 2018 में भी यह कार्यक्रम बेहद सफल हुआ था। और इस बार भी वैसी ही सजधज, गर्मजोशी और देश भर से आने वाले क़ाबिल उर्दू-हिंदी के क़ाबिल विद्वानों की गुफ्तगू के साथ इसका आयोजन किया जा रहा है
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भारतीय कला और लोक संस्कृति के विभिन्न आयामों को आगे बढ़ाने और कलाकारों को मंच देने के काम में जुटा किरण नादर म्युजियम ऑफ आर्ट (केएनएमए) फरवरी में तीन दिनों का चित्रकला महोत्सव करने जा रहा है। दिल्ली के साकेत में म्युजियम के परिसर में होने जा रहे इस महोत्सव में देश भर की लोक और आदिवासी कलाओं के तमाम रूपों को देखा जा सकेगा। देश के अलग अलग हिस्सों के कलाकार 8 से 10 फरवरी को होने वाले इस महो
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