कला के कई रूप हैं। रंगों की अपनी भाषा है। रेखाएं बोलती हैं। कलाकृतियां कुछ कहती हैं। चित्रों के पीछे पूरा एक दर्शन छुपा होता है और रंगों के संयोजन के पीछे कहीं न कहीं कोई कल्पना होती है। देशभर में कलाकार तो भरे पड़े हैं, दिल्ली, मुंबई समेत तमाम बड़े शहरों में बनी आर्ट गैलरी किसी न किसी कलाकार के काम का एक बेहतरीन आईना भी हैं। लेकिन तमाम कलाकारों का दर्द है कि इस देश में कला की कद्र नहीं। तमाम अकादमियां हैं, आर्ट और स्कल्पचर के तमाम कॉलेज हैं, बड़ी संख्या में यहां ये हुनर सीखने वाले भी हैं लेकिन ऐसा क्या है जो कलाकारों के भीतर उपेक्षा का भाव भरता है। हमारा मकसद इन सवालों पर बहस के साथ साथ देश भर के उन कलाकारों को मंच देना है और उनके काम को एक बड़ा आयाम देना है जो महज गैलरी में सिमट कर रह जाते हैं और चंद पेंटिग्स के बिक जाने का इंतज़ार भर करते हैं। कला के क्षेत्र में नया क्या हो रहा है, नई पीढ़ी के कलाकार क्या कर रहे हैं और जाने माने कलाकारों के काम को दुनिया किस तरह देख रही है – ये सब हम बताने की कोशिश करेंगे।

ललित कला अकादमी पिछले दिनों पांच महिला कलाकारों के बेहतरीन काम का गवाह बनी। इन पांचों कलाकारों ने अपनी सामूहिक प्रदर्शनी का नाम दिया था – ‘प्रथमा’। इन पांचों में एक मूर्तिशिल्पी हैं- निवेदिता मिश्रा, एक सेरामिक कलाकार हैं-मीनाक्षी राजेंद्र और तीन पेंटर हैं-माधुरी शर्मा, सोनी खन्ना और विम्मी इंद्रा। इन कलाकारों ने मिलकर ‘‘स्तब्धिका’ नाम की संस्था बनाई है। इन कलाकारों का कहना है
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ललित कला अकादेमी की ओर से हर साल आयोजित की जाने वाली राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी कला समुदाय के कैलेन्डर में सर्वाधिक प्रतिष्ठित आयोजन है। इस वर्ष आयोजित 60वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी उत्कृष्ट कलात्मक कृतियों के प्रदर्शन के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभाशाली कलाकारों को अनुशंसा और मान्यता प्रदान करने का भी एक मंच है। इसमें प्रदर्शित सभी कृतियाँ सौंदर्यांत्मक अपील और माध्यमों
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क्या आप जानते हैं कि दुनियाभर में अपनी जुझारू और लड़ाकू छवि के लिए मशहूर ममता बनर्जी एक बेहतरीन पेंटर, कवियत्री और लेखिका भी हैं? संगीत में उनकी गहरी रूचि है और पिछले ही साल दुर्गापूजा के मौके पर ममता बनर्जी ने रौद्रर छाया नाम का एक अल्बम भी जारी किया है जिसमें उनके कंपोज किए गए सात गीत हैं। हालांकि उनके व्यक्तित्व के इन पहलुओं को लेकर सियासत भी खूब होती रही है। लेकिन ममता ने अपनी रच
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देश भर में पुस्तकालयों की खस्ता हालत के बारे में हम अक्सर पढ़ते रहते हैं। यह बहस भी अक्सर सुनने को मिलती है कि इस डिजिटल ज़माने में किताबों के लिए किसके पास वक्त है। इसके बावजूद देश भर में पुस्तक मेलों का चलन बढ़ रहा है और प्रकाशकों की चांदी हो गई है। पुस्तकालयों को लेकर भी नज़रिये में बदलाव आ रहा है।
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अपने देश में गांधी जी पर बहुत काम हुआ है। गांधी को एक व्यक्ति से ज्यादा एक दर्शन माना जाता है और वही दर्शन हमारे कलाकारों से लेकर बुद्धिजीवियों तक को प्रेरणा देता रहा है। गांधी जी की 150वीं जन्म शताब्दि के मौके पर देश भर में उनके दर्शन से लेकर उनकी जीवन यात्रा को अपने अपने तरीके से बताने-दिखाने की कोशिशें हो रही हैं। दिल्ली की नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में गांधी के जीवन की एक अहम घटना
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रबीन्द्र भवन स्थित ललित कला अकादेमी आर्ट गैलरीज़ में आज गढ़ी विंटर शो 2018 का शुभारम्भ उत्तरी दिल्ली के मेयर श्री आदेश कुमार गुप्ता और अकादमी के अध्यक्ष श्री उत्तम पाचारणे द्वारा किया गया। शो का उद्घाटन संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव (अकादमी और संग्रहालय) श्रीमती निरुपमा कोत्रु, अकादमी के सचिव राजन श्रीपद फुलारी व अन्य गणमान्यों की गरिमामय उपस्थिति में हुआ. इस अवसर पर बड़ी संख्या
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325 स्टॉल्स, करीब एक हजार कलाकार। कला, नृत्य, संगीत और रंगकर्म का बेहद खूबसूरत संगम...इन बेहतरीन यादों के साथ पहला अंतर्राष्ट्रीय कला मेला खत्म हो गया। इस मेले में यूरोप, पैन एशिया और अफ्रीका से आए कलाकारों ने अपने देश की कला और संस्कृति से जुड़ी बेजोड़ प्रस्तुतियां दीं। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में ललित कला अकादमी की ओर से आयोजित 15 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कला मेले में एक ला
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अंतर्राष्ट्रीय कला मेला इतने बड़े पैमाने पर पहली बार हो रहा है। लेकिन इतनी कोशिशों के बावजूद मेले में मीडिया और आम लोगों की दिलचस्पी कम होने की वजह से यहां आए कलाकारों में कुछ मायूसी का भाव नज़र आ रहा है। तमाम कलाकार ये कहते नज़र आ रहे हैं कि अभी तक उनके स्टॉल का खर्च तक नहीं निकल पाया है, लेकिन उम्मीद है 18 फरवरी तक स्थितियां बदलेंगी।
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इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में आयोजित प्रथम अंतर्राष्ट्रीय कला मेला ने रंग जमाना शुरू कर दिया है। मेले के दूसरे दिन नोबल पुरस्कार विजेता डॉ. कैलाश सत्यार्थी भी मेला देखने पहुंचे जबकि शाम में साहित्य कला परिषद् की ओर से फ्यूज़न डांस पेश किया गया। डॉ सत्यार्थी ने कई कलाकारों से मुलाकात की और उनसे उनकी कला के बारे में जाना। उनका मानना है कि देश भर के स्कूली बच्चों को और नई पीढ
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