दुनिया एक रंगमंच है और हमसब इस रंगमंच की कठपुतलियां हैं। किसी ने ये पंक्तियां यूं ही नहीं कह दीं। अगर आप गहराई से देखें तो हम सब कहीं न कहीं ज़िन्दगी में हर रोज़ कोई न कोई किरदार होते हैं और हर पल हमारे हाव भाव, बोलचाल का अंदाज़ और तमाम घटनाक्रमों के बीच हमारी भूमिका एक नई कहानी गढ़ती है। भारतीय रंगमंच की परंपरा बेहद समृद्ध है और ये कहीं न कहीं हमारे जीवन के तमाम पहलुओं को स्वांग के ज़रिये सामने लाती है। फिल्मों और टेलीविज़न के आने के बाद से रंगमंच की दुनिया में हलचल मच गई और इसके अस्तित्व पर सवाल उठाए जाने लगे। लेकिन हर दौर में देश के तमाम हिस्सों में रंगमंच उसी शिद्दत के साथ मौजूद है और रहेगा। इसकी अपनी दुनिया है और अपने दर्शक हैं। यहां भी नए नए प्रयोग होते रहते हैं और देश भर में लगातार नाटकों का मंचन होता रहता है। कहां क्या हो रहा है, रंगमंच आज किस दौर में है, कौन कौन से प्रयोग हो रहे हैं, कलाकारों की स्थिति क्या है, पारंपरिक और लोक रंगमंच आज कहां खड़ा है – ऐसी तमाम जानकारियां इस खंड में।


रंगमंच
हबीब साहब का सपना पूरा करना अभी बाकी है…
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September 1, 2020

जाने माने रंगकर्मी  और  अपने दौर के जबरदस्त नाटककार  हबीब तनवीर पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा है... उनके नाटकों पर, उनके व्यक्तित्व पर और कभी समझौता न करने वाले उनके मिजाज़ पर। उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर उन्हें रंगकर्मी अपने अपने तरीके से याद करते हैं... कोई उनके तमाम नाटकों की बात करता है, कोई उनके सामाजिक सरोकार को याद करता है तो कोई नाटकों के प्रति उनके समर्पण के बारे में बताता है। इप्

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भारतीय रंगकर्म को अनुशासनबद्ध किया अल्काज़ी ने
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August 6, 2020

भारतीय रंगमंच के पुरोधा कहे जाने वाले इब्राहिम अल्काज़ी ने रंगमंच की दुनिया को क्या क्या दिया, उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक के तौर पर क्या क्या किया, एनएसडी जैसे बड़े फलक को संभालते हुए कैसे वो आधुनिक भारतीय रंगमंच के सम्राट बन गए और क्यों उन्हें रंगमंच के 'तुग़लक' जैसी उपाधियां मिलीं... ऐसे तमाम आयामों पर जाने माने रंगकर्मी-पत्रकार और आगरा में एक बेहद ज़मीन से जुड़ी सां

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एक जीवंत किंवदंती बन गए थे इब्राहिम अल्काजी
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August 4, 2020

इब्राहिम अल्काजी का जाना भारतीय रंगमंच के लिए एक बहुत बड़े शून्य की तरह है... उन्होंने रंगमंच के लिए जितना कुछ किया और भारतीय रंगमंच को जो ऊंचाई दी उसे कभी भूला नहीं जा सकता। जाने माने रंगकर्मी अरविंद गौड़ ने अल्काजी  की रंगमंच यात्रा को कैसे देखा और उन्हें कैसे महसूस किया, इसे हर रंगप्रेमी और थिएटर से जुड़े लोगों को ज़रूर पढ़ना चाहिए... 7 रंग परिवार आदरणीय अल्काजी को अरविंद गौड़ के इस

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‘गिरीश कर्नाड सिर्फ नाटककार नहीं एक संस्था थे’
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June 10, 2020

पिछले साल आज के ही दिन प्रख्यात नाटककार गिरीश कर्नाड का निधन हुआ था। निर्भीक संस्कृतिकर्मी, अद्भुत रचनाकार और बैखौफ योद्धा गिरीश कर्नाड को उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर सलाम। वरिष्ठ नाटककार, सामाजिक कार्यकर्ता, एक्टर और डायरेक्टर गिरीश कर्नाड से मेरा व्यक्तिगत रिश्ता था। गिरीश कर्नाड के नाटकों को पढ़ते, देखते और खेलते हुए ही मेरा थियेटर शुरू हुआ।

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लॉकडाउन के वक्त का नया रंगमंच
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June 1, 2020

क्या इस क्वारंटीन समय में रंगमंच में कोई नवीनता आ सकती है? बहसें चल रही हैं। कई, बल्र्कि ज्यादातर, रंगकर्मी ऐसे हैं जो भरतमुनि और स्तानिस्लावस्की के सिद्धांतों से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि थिएटर सिर्फ वास्तविक स्पेस यानी रंगमंच में संभव है और ऑनलाइन थिएटर नाम की कोई चीज संभव नहीं हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो इन दौर में नया प्रयोग कर रहे हैं और वीडियो की तकनी

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सामाजिक चेतना से लैस एक अभिनेता का जाना
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April 29, 2020

इरफान खान का जाना एक सदमे की तरह है। महज 53 साल की उम्र में इस कलाकार ने अपने संघर्षों और खास अंदाज़ की वजह से अपनी जगह बनाई। बॉलीवुड के साथ साथ करोड़ों दर्शकों के दिलों में अपनी छाप छोड़ी। बिंदास अंदाज़ में ज़िंदगी को लेने वाले और बेहद संवेदनशील तरीके से समाज को देखने वाले इस अभिनेता ने अपनी खास शैली बनाई...चाहे वह अपनी बेहद गंभीर और गहरी आंखों से बहुत कुछ कह देने का अंदाज़ हो या फिर डॉ

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‘थिएटर की अपनी स्वतंत्र भाषा होती है’
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April 24, 2020

उषा गांगुली का गुज़र जाना रंगमंच के लिए आखिर क्यों इतना बड़ा शून्य पैदा करता है.. दरअसल उषा जी उन सुलझी हुई रंगकर्मियों में रही थीं जिन्होंने रंगकर्म को सामयिक संदर्भों में जोड़ने के साथ ही समाज और सियासत को भी बेहद बारीकी से देखा, समझा। दिसंबर 2018 में नवभारत टाइम्स ने उषा गांगुली का यह इंटरव्यू छापा था... दिलीप कुमार लाल ने उनसे लंबी बातचीत की थी जिसमें उन्होंने तमाम मुद्दों पर कई अहम

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फिल्म ‘रेनकोट’ की पटकथा लिखी थीं उषा गांगुली ने
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April 24, 2020

बहुत कम लोगों को मालूम होगा ऋतुपर्ण घोष की हिंदी फिल्म 'रेनकोट' (2004) की पटकथा उषा गांगुली ने लिखी थीं। सर्वश्रेष्ठ सिनेमा के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन ने बेहद डूबकर अभिनय किया था। देश और देश के कई फिल्म महोत्सव में यह शामिल भी थीं। निर्देशक ऋतुपर्ण घोष से इसकी पटकथा को लेकर उषा जी अनेक बार मिली थी। तब जाकर फाइनल पटकथा तैयार हुई थी।

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रंगकर्म की उस झुंझलाहट की याद…
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April 7, 2020

वाराणसी के जाने माने रंगकर्मी गोपाल गुर्जर की बेशक कोई राष्ट्रीय पहचान न बन पाई हो लेकिन उनकी प्रतिभा को रंग जगत और सिने जगत ने कुछ हद तक पहचाना जरूर। उनका गुज़रना कम से कम वाराणसी रंगमंच की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है। संवेदनशील पत्रकार और ‘नाद रंग’ पत्रिका के संपादक आलोक पराड़कर ने गोपाल गुर्जर को ‘राष्ट्रीय सहारा’ में लिखे अपने लेख के ज़रिये कुछ इस तरह याद किया.. 7 रंग के पाठको

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प्रतिरोध के नाटक के पर्याय हैं राजेश कुमार
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September 1, 2019

राजेश कुमार राजनीतिक व विचार प्रधान नाटकों के लिए जाने जाते हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की ओर से 2014 के लिए नाटक लेखन के लिए पुरस्कृत किये जाने की घोषणा की गयी है। वैसे राजेश कुमार इन पुरस्कारों से बहुत ऊपर हैं। हिन्दी रंगमंच और नाट्य लेखन के क्षेत्र में उनका सृजनात्मक काम विशिष्ट है। उनके आसपास भी कोई नहीं दिखता। उनके जैसा प्रतिबद्ध और प्रयोगधर्मी भी कोई नहीं।

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