देख तमाशा दुनिया का… हमारे इस खास सेग्मेंट में इस बार वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार अनिल त्रिवेदी ने गालियों पर छिड़ी दिलचस्प बहसों और सियासत पर अपने निशाने पर ले रहे हैं .. तो पढ़िए उनका ये दिलचस्प व्यंग्य —
चाय की दुकान पर चर्चा छिड़ी है। बहस के लिए रोज कोई न कोई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दा मिल ही जाता है। गांव से लेकर दिल्ली की राजनीति तक और गली-मुहल्ले के कुत्तों से लेकर ट्रंप तक। कुछ नहीं तो मौसम तो है ही बहस का शाश्वत विषय। नीट का मामला तो कुछ हद तक नीट एंड क्लीन हो गया है इसलिए आज की बहस का विषय है-गालियां। इनदिनों गालियां एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है। इनकी गालियां-उनकी गालियां, गंदी गालियां-अच्छी गालियां। अत: इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर तो चर्चा होनी ही चाहिए।
सौजन्य – इंस्टाग्राम
बहस चल रही है। वे उन्हें गालियां दे रहे थे, यह ठीक नहीं था। क्यों ठीक नहीं था, भाई कोई गालियां क्यों नहीं दे सकता? विरोध करने की स्वतंत्रता है या नहीं? कोई गालियां खाने के लायक हो तो भी गालियां न दी जाएं, यह कौन सी बात हुई। अरे, गालियां देना ही है तो दीजिए मगर गालियों की भी कुछ मर्यादा होती है। देखा नहीं, कितनी गंदी-गंदी गालियां थीं, छी। कौन सी गाली गंदी थी, क्या ये गालियां पहली बार दी गई थीं? गालियां तो ऐसी ही होती हैं। न गंदी, न अच्छी। गालियां तो सिर्फ गालियां होती हैं। यह तो आप पर है, जो चाहें समझें।
चर्चा में और गंभीरता आ गई। चलो हम मान लेते हैं कि गालियां गंदी नहीं होतीं, लेकिन ये केवल मौखिक भी तो हो सकती थीं, पोस्टरों पर लिख-लिखकर दिखाने की क्या जरूरत। मुंह-जुबानी गालियां कोई सुनता, कोई नहीं सुनता पर लिखी हुई गालियां तो पूरा देश देख रहा था। हद हो गई भाई, देश देख रहा था तो क्या हो गया, देश-दुनिया को दिखाना ही तो था। आखिर व्यवस्था सुधारने के लिए गालियां निहायत जरूरी हैं, मौखिक हों या लिखित। सोशल मीडिया गालियों से भरी लिखित टिप्पणियों से पटा रहता है तब सबको आनंद मिलता है। गालियां लिखे पोस्टरों पर ही आपत्ति क्यों?
सौजन्य – दैनिक भास्कर
एक ने प्रतिवाद किया-लेकिन भाई, लड़कों की बात तो चलती है लेकिन अब तो लड़कियां भी गालियों पर उतर आई हैं। और वही लड़कों वाली गालियां, यह तो निहायत बेहूदगी है। दूसरा चीखा- लड़कियां गालियां क्यों नहीं दे सकतीं। वैसे समानता के अधिकार की बात करते हो, इसमें औकात पर उतर आए। लड़कियां भी समाज का हिस्सा हैं, उनकी मर्जी जैसी चाहें गालियां दें। गालियों पर लड़कों का ही पट्टा है क्या? यह क्या तुक कि लड़के गालियां दें तो अच्छी, लड़कियां दें तो गंदी। गालियों पर दोनों का संविधान प्रदत्त बराबर का हक है।
बहस दो-दो कुल्हड़ चाय तक लंबी खिंच गई। आखिर नतीजा यह निकला कि गालियों का गंदापन या अच्छापन परिस्थिति पर निर्भर मानना चाहिए। कोई मजाक में गाली उच्चारे तो अच्छी है और गुस्से में दे तो गंदी। वैसे गुस्से में दी गई गालियों को भी मजाक समझा जा सकता है इससे गाली की क्वालिटी अच्छी हो जाएगी। अगर गालियां खाने वाला माफ कर दे तो भी गालियों को अच्छी की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। इससे गालियां खाने वाले को भी बुरा नहीं लगेगा और देने वाले को भी ग्लानि का अनुभव नहीं होगा। अंत भला तो सब भला।
गालियों की परंपरा समाज में सदियों से है। साहित्य समाज का दर्पण है इसलिए साहित्य में भी इनका खूब उल्लेख है। फिल्में भी कुत्ता-कमीना-हरामजादे जैसे शब्दों से आगे बढ़ गई हैं। राजनीति में भी गालियों को अब मजाक में ही लिया जाता है। पिछले दिनों एक पार्टी के नेता ने पत्रकारों के सामने अपने बागी सांसदों के लिए जो शब्द बोला था उसे उन्होंने गाली नहीं माना। कहा उनकी बोलचाल में तो यह शब्द खूब प्रचलित है।
गालियों से अनुशासन आता है, यह मैंने बचपन में ही जान लिया था। मेरी हरकतों पर मां अकसर मुझे जानवरों के नाम से पुकारती थीं जैसे-कुत्ता, घोड़ा, ऊंट और सांड़। रिश्ते में चचा तो इससे आगे थे। वे जब गुस्सा होते थे तो अपने बेटे को डपटते थे-गधे की औलाद। एक बार चाची ने सुन लिया तो विशेषाधिकार हनन का मामला बन गया। चाची के कड़े एतराज पर चचा ने कहा- आइंदा ऐसा नहीं बोलूंगा। फिर भी वे बेटे को गधा बोल देते थे।
सौजन्य – सामना
एक बड़े अखबार के नामी संपादक दफ्तर में आते ही एक दो साथियों को सभी के सामने फटकारते थे। डांट में ऐसे शब्द भी होते जिन्हें दूसरे लोग गाली मानते हैं। संपादक का मानना था कि गालियां आफिस में अनुशासन और नियंत्रण बनाए रखने में सहायक होती हैं। इससे गालियां खाने वाले के साथ-साथ बाकी साथी भी अनुशासित हो जाते हैं। वे गालियों से प्रतिभा निखारते थे। बाद में उनकी गालियों से निखरे कई साथी उसी अखबार में संपादक बन गए। वे अब अन्य प्रतिभाएं तराशने में लगे हैं।
मेरा आखिरी बॉस भी ऐसा ही अनुशासनप्रिय था। हर एक घंटे बाद वह एक साथी को गालियां देता था। उसकी गालियों में मानवीय अंग-प्रत्यंगों के नामों का भी जिक्र आ जाता। कुछ साथियों को बुरा लगता लेकिन बॉस को नहीं। ड्यूटी से आने के बाद मैं घर में अकसर आधा घंटा बैठकर बुदबुदाता रहता। एक बार पत्नी ने पूछ लिया तो मैंने कहा- बॉस को गालियां दे रहा हूं। उसे सबके सामने गालियां देने का अधिकार है, मैं एकांत में तो उसे गालियां बक ही सकता हूं।
गालियों के ताजा विवाद पर जब मैंने मुहल्ले के चूंचूं अंकल से उनकी राय जाननी चाही तो उन्होंने कहा- गंदी और अच्छी गालियों का सीधा सा फंडा है – हमारी गालियां अच्छी, उनकी गालियां गंदी। अंकल की बात से मैं सहमत हूं। अब आपकी राय आप जानें।
अनिल त्रिवेदी
वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार
Posted Date:August 5, 2026
4:23 pm Tags: अनिल त्रिवेदी, नरेन्द्र मोदी, गाली, कॉक्रोच