
एक बेहद जीवंत और उम्मीदों से भरे कवि-गीतकार कुंअर बेचैन का जाना आहत करने वाली ख़बर है... गाज़ियाबाद में अमर उजाला का संपादक रहते हुए मैं डॉ बेचैन के करीब आया... उनसे मुलाकातें हुईं.. उनकी जीवंतता का गवाह बना... शहर के तमाम अति वरिष्ठ और आदरणीय शख्सियतों को हमने अपने अखबार के जरिये सम्मानित करने का एक छोटा सा प्रयास किया। उनके अनुभवों को अखबार में विस्तार से छापा...उन्हीं में हमारे डॉक्टर
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आखिर राहुल सांकृत्यायन में ऐसा क्या है जो उन्हें बार बार पढ़ने और याद करने की ज़रूरत महसूस होती है? आखिर मौजूदा दौर में राहुल सांकृत्यायन क्यों ज़रूरी हैं? क्यों उनकी किताब 'वोल्गा से गंगा' का ज़िक्र हमेशा आता है और क्यों एक ब्राह्मण होने के बाद भी उन्होंने ब्राह्मणवाद और ढकोसलों का खुलकर विरोध किया? उनके तार्किक विश्लेषणों और समाज को देखने के उनके नज़रिये ने कैसे एक नए समाज की परि
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