किसी भी देश की संस्कृति को विकसित करने, इसे सहेजने और खुद को अभिव्यक्त करने का एक बेहतरीन ज़रिया है साहित्य। साहित्य वो विधा है जिसके कई आयाम हैं। कहानियां, कविताएं, गीत, शायरी, लेख, संस्मरण, समीक्षा, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज, व्यंग्य – अभिव्यक्ति के तमाम ऐसे माध्यम हैं जिनसे साहित्य बनता है और समृद्ध होता है। साहित्य में समाज और जीवन के हर पहलू की झलक होती है। संवेदनाओं और दर्शन का बेहतरीन मेल होता है। संस्कृति और तमाम कालखंडों की और राजनीति से लेकर बेहद निजी रिश्तों तक की अद्भुत अभिव्यक्ति होती है। भाषा का एक विशाल संसार गढ़ता है साहित्य। साहित्य के मौजूदा स्वरूप, नए रचनाकर्म और छोटे बड़े साहित्यिक आयोजनों के अलावा आप इस खंड में पाएंगे साहित्य का हर रंग…

गाजियाबाद में साहित्य की परंपरा को एक अहम मुकाम तक पहुंचाने वाले कथा शिल्पी से रा यात्री की कथा यात्रा के कई पड़ाव रहे। उनकी कहानियों में समाज और सियासत के साथ रिश्तों के इतने शेड्स मिलते हैं कि आज भी इस कथाकार की रचनाशीलता और दृष्टि की गहराई को समझ पाना आसान नहीं है। जीवन के आखिरी दिनों तक से रा यात्री जनतांत्रिक मूल्यों की बात करते रहे, सरकार और व्यवस्था के संवेदनहीन रवैये को लेक
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साहित्य में विवाद अक्सर होते रहे हैं। चाहे लेखन पर, चाहे तथ्यों को पेश करने पर, चाहे भाषा पर या बड़े लेखकों की ज़िंदगी से जुड़ी सच्चाइयों पर। कथा सम्राट प्रेमचंद की ज़िंदगी, उनके लेखन, उनकी सादगी, उनके दर्शन या पत्रकारिता को लेकर बहुत कुछ लिखा, पढ़ा और बोला जाता रहा है। उनका तकरीबन सारा साहित्य उपलब्ध भी है और उनके उपन्यास, कहानियां और लेखन आज भी सबसे ज्यादा पढ़ा भी जाता है और उसपर चर्
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साहित्यकारों, लेखकों के लिए और खासकर साहित्य की सबसे बड़ी अकादेमी के लिए यह विषय अहम है - बदलते दौर में कितना बदला साहित्य। अक्सर इस विषय पर चर्चाएं होती भी रहती हैं, लेकिन इस बार यह खास इसलिए बन गया क्योंकि इसका आयोजन साहित्य अकादेमी ने राष्ट्रपति भवन परिसर के भव्य सांस्कृतिक केन्द्र में हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इसका उद्घाटन किया और संस्कृति मंत्री से लेकर मंत्रालय के
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साहित्य के मौजूदा स्वरूप और चुनौतियों के बारे में अक्सर चर्चाएं होती रही हैं, समकालीन लेखन से लेकर तकनीक के इस बदलते दौर में पढ़ने लिखने की छूटती आदत पर भी चिंता जताई जाती रही है, लेकिन साहित्य अकादमी ने दो दिनों तक जो चर्चा की उसमें इसके तमाम पहलू सामने आए। खास बात यह कि यह पूरा आयोजन राष्ट्रपति भवन के सांस्कृतिक केन्द्र में हुआ और खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इसका उद्घाटन किय
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साहित्य अकादेमी और राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आज ‘कितना बदल चुका है साहित्य? विषयक दो दिवसीय साहित्यिक सम्मिलन का उद्घाटन भारत की माननीय राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र, नई दिल्ली में किया। उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि 140 करोड़ देशवसियों के हमारे परिवार में अनेक भाषाएँ और अनगिनत बोलियाँ है
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साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित साहित्य मंच कार्यक्रम में 7 मई को चार रचनाकारों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। ये रचनाकार थे - संग्राम मिश्र (ओड़िआ), रत्नोत्तमा दास (असमिया), रीता मल्होत्रा (अंग्रेज़ी) एवं राजिंदर ब्याला (पंजाबी)। कार्यक्रम की अध्यक्षता संग्राम मिश्र ने की। सर्वप्रथम रत्नोत्तमा दास ने अपनी असमिया कहानी ‘रई जावा घड़ी’ के अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द वाच ऑन हर रिस्ट’ का पाठ किया, जो
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हिंदी के प्रख्यात कवि एवं कथाकार विनोद कुमार शुक्ला को 59 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने की आज घोषणा की गई। 88 वर्षीय श्री शुक्ला को यह पुरस्कार उनके आजीवन लेखन के लिए दिया जा रहा है। पुरस्कार में 11 लख रुपए की राशि स्मृति चिन्ह प्रशस्ति पत्र तथा वाग्देवी की प्रतिमा शामिल है। ज्ञानपीठ की चयन समिति की बैठक में यह फैसला लिया गया।
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दिव्यांग लेखकों के काव्य पाठ और कहांनी पाठ के साथ ही एशिया के सबसे बड़े साहित्योत्सव का शानदार समापन हुआ। 7 दिनों तक चले इस उत्सव के अंतिम दिन हुए पंद्रह सत्रों में से एक में 10 भाषाओं के दिव्यांग लेखकों ने विनोद आसुदानी एवं अरविंद पी. भाटीकर की अध्यक्षता में काव्य-पाठ एवं कहानी पाठ प्रस्तुत किया।
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प्रसिद्ध ट्रांसजेंडर लेखक कल्कि सुब्रमनियम ने साहित्य अकादमी से अपने समुदाय के लोगों के लिए एक अलग पुरस्कार शुरू करने की मांग की। कल्कि ने आज साहित्योत्सव के तीसरे दिन ट्रांसजेंडर साहित्य के बारे में गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए यह मांग की।
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हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री गगन गिल समेत 23 भारतीय भाषाओं के लेखकों को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किये गए। कमानी सभागार में एक गरिमापूर्ण समारोह में अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने श्रीमती गिल समेत सभी विजेताओं को यह सम्मान प्रदान किया।सम्मान में एक लाख रुपये की राशि प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिन्ह शामिल है। श्रीमती अनामिका के बाद दूसरी कवयित्री हैं जिन्हें यह सम्मान मिला।उंन
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