कहते हैं कि जहां संगीत नहीं है, वहां जीवन नहीं है। लय और ताल के बगैर सुर नहीं बनते और मन की गहराइयों तक उतर जाने वाला संगीत नहीं बन सकता।गीत-संगीत किसी भी संस्कृति का सबसे ज़रूरी हिस्सा है और ये एक ऐसी विधा है जो आपको एक सुकून भरे एहसास से भर देती है। दुनिया के निर्माण के साथ ही संगीत का जन्म भी हुआ और तमाम दौर से गुज़रते हुए संगीत में नए नए प्रयोग होते रहे। पारंपरिक वाद्यों से लेकर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वाद्यों तक और गायन की तमाम शैलियों से लेकर नए दौर के प्रयोगों तक संगीत हरेक के जीवन का ज़रूरी हिस्सा है – चाहे वो शास्त्रीय संगीत हो, लोक संगीत हो या फिर फ़िल्म संगीत।देश के तमाम हिस्सों में संगीत से जुड़े आयोजनों, कलाकारों, नए प्रयोगों के साथ साथ इस दिशा में होने वाली हर तरह की गतिविधि को समेटने की कोशिश हम करेंगे।


संगीत
शहनाई के शहंशाह से मिलना और उन्हें महसूस करना…
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June 11, 2020

शहनाई को शादी- ब्याह के मजमे से उठा कर बुलंदियों तक पहुंचाने वाले खां साहब  सुर की बारीक जानकारी को पहली शर्त मानते हैं फिर रियाज़ तो है ही। वे कहते हैं कि गला अच्छा होना या साज बजाना आना ही बहुत नहीं है। सुर और राग की गहरी जानकारी के बग़ैर संगीत में कोई आगे नहीं बढ़ सकता। आरोह-अवरोह की समझ बहुत बारीक चीज़ है। यह धीरे धीरे समझ आती है। लड़कपन में (सन 1930-32) में दालमंडी की गली के कोठों में रात

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आज पुरानी राहों से, कोई मुझे आवाज़ न दे…
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May 5, 2020

इक्कीसवीं सदी शुरु हो चुकी थी और बीसवीं सदी ने जाते जाते बॉलीवुड संगीत की दुनिया को एक नई शक्ल दे दी थी। इस नए दौर और संगीत के नए माहौल में भला नौशाद के संगीत को उतनी तवज्जो कैसे मिल सकती थी जितनी इस दौर के धूम धड़ाम वाले संगीतकारों को मिलती है। 5 मई 2006 को जब संगीतकार नौशाद ने दुनिया को अलविदा कहा, तब भी उनके भीतर यही दर्द छलकता रहा - 'मुझे आज भी ऐसा लगता है कि अभी तक न मेरी संगीत की तालीम पूर

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किशोरी अमोनकर को याद करते हुए…
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April 10, 2020

शास्त्रीय गायन में उनकी आवाज़, किसी राग के भीतर तक उतर जाने और श्रोताओं को एक नई दुनिया में ले जाने की उनकी कला का जवाब नहीं था। किशोरी अमोनकर अगर आज होतीं तो 89 बरस की हो रही होतीं... 10 अप्रैल 1931 को मुंबई में जन्मीं किशोरी अमोनकर तीन साल पहले हमसे रुखसत हो गईं... लेकिन उन्होंने शास्त्रीय संगीत को जो ऊंचाई दी, वह हर शास्त्रीय संगीतप्रेमी के लिए एक अद्भुत एहसास से गुजरने जैसा है... आज तकनीकी क�

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चिट्ठी ना कोई संदेश, ना जाने कौन से देश…
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February 8, 2019

वह 1977 का साल था। पहली दफा तभी जगजीत सिंह को सुनने का मौका मिला। लाइव नहीं, बल्कि उनके पहले अल्बम – ‘द अनफॉरगेटबल्स’ के दो एलपी रिकॉर्ड्स में। फिलिप्स के नए नए स्टीरियो की धमक के बीच जगजीत सिंह जब अपने अंदाज़ में ‘आहिस्ता आहिस्ता’ गाते तो हम सब उनके साथ साथ खुद भी ‘आहिस्ता आहिस्ता’ बरबस ही गाने को मजबूर हो जाते। वो अंदाज़ ही अलग था और उस दौर के नए नवेले ग़ज़ल गायक के इस अकेले अल्बम ने सं�

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दिल का खिलौना हाय टूट गया…
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August 21, 2018

उस्ताद बिस्मिल्ला खां को गुज़रे आज 12 साल हो गए, लेकिन न तो शहनाई का कोई और उम्दा कलाकार उभर कर सामने आ सका और न ही शहनाई का वो रुआब अब बाकी रह गया। शादी-ब्याह के दौरान, तमाम शुभ अवसरों पर शहनाई का बजना एक परंपरागत और बेहद संजीदा माहौल पैदा करता था। बिस्मिल्ला खां तब भी सबके आदर्श थे और तमाम पेशेवर शहनाईवादक उनकी ही धुनें बजाने को अपनी शान समझते थे। खासकर फिल्म गूंज उठी शहनाई के उस गीत की

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मीडिया और सोशल मीडिया पर अप्पा को नमन…
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October 25, 2017

तमाम अखबार, सोशल मीडिया और टेलीविज़न चैनल ठुमरी साम्राज्ञी और बनारस घराने की अभूतपूर्व शख्सियत गिरिजा देवी को अपने अपने तरीके से श्रद्धांजलि दे रहे हैं... हर कोई इस महान गायिका की तमाम यादों और मन में बस जाने की उनकी गायन शैली के बारे में अपनी भावनाएं अभिव्यक्त कर रहा है... सोशल मीडिया के कुछ साथियों की पोस्ट हम आपको पढ़वाते हैं.. साथ ही अमर उजाला का वो शानदार पेज भी आपके लिए लाए हैं जो �

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अपने संस्कार और संस्कृति को कभी मत छोड़िए – गिरिजा देवी
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October 25, 2017

आज पैसा कमाना लोगों की जरूरत है, लेकिन बस यह समझिए कि जैसे आप रोज-रोज बर्गर खाकर जिंदा नहीं रह सकते, क्योंकि जिंदा रहने के लिए चावल-दाल खाना पड़ता है, जिसे खाकर हम पले-बढ़े हैं। वैसे ही, भले ही आज हजार जगहों के साहित्य आ गए हों, हजार जगहों के संगीत आ गए हों, लेकिन हमें अपनी संस्कृति नहीं छोड़नी चाहिए। उनकी अच्छी चीजें ले लीजिए, लेकिन अपने संस्कार, अपनी संस्कृति को कभी मत छोडि़ए।

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सूना हो गया बनारस घराना…
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October 25, 2017

बनारस घराना आज एकदम सूना हो गया। ठुमरी, दादरा और उपशास्त्रीय गायन की तमाम शैलियों की महारानी गिरिजा देवी का जाना एक गहरे आघात जैसा है। उनकी जीवंतता, उनकी आवाज़ और व्यक्तित्व की सरलता किसी को भी अपना बना लेने वाली रही है। वो हमारे घर की एक ऐसे बुज़ुर्ग की तरह लगती थीं मानो उनसे हमारी कई कई पीढ़ियों को बहुत कुछ सीखना हो। आवाज़ की वो गहराई, जहां ठुमरी एक नई परिभाषा के साथ आपके भीतर तक उतर

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जहां ग़म भी न हो, आंसू भी न हो…
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October 13, 2017

एक ऐसी दुनिया की कल्पना, एक ऐसे खुशनुमा समाज का सपना और हर तरफ प्यार ही प्यार की तमन्ना लिए 58 साल की उम्र में किशोर दा ने बेशक सबको अलविदा कह दिया हो, लेकिन वो हमेशा सबके बीच हैं... उसी तरन्नुम में, उसी अंदाज़ में और अपने उन्हीं खूसूरत सपनों के साथ....  उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने उन्हें इस लायक बनाया, उनकी प्रतिभा को मंच दिया, तमाम मौके दिए और किशोर को किशोर बनाया... संयोग देखिए दादा मुनि  के ज�

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ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया…
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October 7, 2017

जब भी ग़ज़ल, ठुमरी और दादरा की चर्चा होती है, बेग़म अख़्तर का नाम सबसे पहले ज़हन में आता है। 103 साल पहले 7 अक्तूबर को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में अख़्तरी बाई ने एक कुलीन परिवार में जन्म लिया। बेग़म अख्तर की जिंदगी के अगर पन्ने पलटिए तो उसमें कई शेड्स मिलेंगे। कुछ उदासीन, तकलीफ़ों और अभावों से भरी।

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