विज्ञान के नाम पर आस्था और मिथक का खेल

कुमार नरेन्द्र सिंह

पिछले कुछ दशकों से  ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ (आईकेएस) नाम का एक प्रोजेक्ट पारंपरिक भारतीय ज्ञान को आधुनिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने की कोशिश कर रहा है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारत के अपने बौद्धिक इतिहास को फिर से पाने और एक अनौपचारिक सांस्कृतिक चाहत को शिक्षा का हिस्सा बनाने की कोशिश जायज़ है, लेकिन आज का आईकेएस  विज्ञान को बढ़ावा देने के बदले उसे आस्था और मिथक की वैधता के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

असली आईकेएस शायद पाणिनि के भाषा-विज्ञान, तर्कशास्त्र के न्याय स्कूल, गणित के केरल स्कूल, वूट्ज़ स्टील के विकास वगैरह पर ध्यान केंद्रित करता। लेकिन जिस आईकेएस को आईआईटी-मंडी के जाइरेक्टर लक्ष्मीधर बेहरा व अन्य की देखरेख में संस्थागत रूप दिया जा रहा है, वह “पौराणिक विज्ञान” को वासत्विक विज्ञान बताने पर तुला हुआ है, मिथक को इतिहास साबित कर रहा है, धार्मिक अनुष्ठानों को तकनीक बता रहा है और तथ्यों की पुष्टि के प्रति खुला तिरस्कार से भरा हुआ है।

आईकेएस के ज़्यादा आक्रामक अवतार को नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी), 2020 के तहत औपचारिक रूप दिया गया। इसकी शुरुआत धातु-विज्ञान और प्राचीन गणित में हुई अहम खोजों को दर्ज करने से हुई, लेकिन धीरे-धीरे ऐतिहासिक शोध और धार्मिक पुनरुत्थानवाद के बीच का फ़र्क धुंधला होता गया। अब आईआईटी-खड़गपुर, आईआईटी-गांधीनगर, आईआईटी-बॉम्बे और आईआईटी-कानपुर में आईकेएस हब हैं। खासकर कानपुर और मंडी के हब “चेतना”, पुनर्जन्म और “वैदिक” जीव विज्ञान पर “रिसर्च” में ‘लीडर’ बनकर उभरे हैं। इन शब्दों को कोटेशन मार्क्स में इसलिए रखा गया है कि आईकेएस की तरह ही इनके नाम से जो मतलब निकलता है, असल में इनका मतलब वह नहीं है।

छद्म-विज्ञान (pseudoscience) के समर्थक

आईकेएस केंद्रों के समर्थक कहते हैं कि वे भारतीय सोच को “औपनिवेशिक सोच से आज़ाद” (decolonise) करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह बात बेतुकी है। 19वीं सदी के बंगाल पुनर्जागरण के दौरान जगदीश चंद्र बोस और प्रफुल्ल चंद्र रे जैसी हस्तियों ने भारतीय पहचान को पुख्ता वैज्ञानिक अध्ययन के साथ जोड़ा और साबित किया कि औपनिवेशिक सोच से आज़ादी का मतलब छद्म-विज्ञान (pseudoscience) के लिए दरवाज़ा खोलना नहीं है। वास्तव में आईकेएस केंद्रों का मकसद आईआईटी  के ढांचे में पौराणिक कथाओं पर आधारित जांच-पड़ताल को शामिल करना है, ताकि वे इन संस्थानों की प्रतिष्ठा का इस्तेमाल करके अपनी राजनीतिक-धार्मिक मान्यताओं को वैज्ञानिक वैधता प्रदान कर सकें।

हाल ही में आईआईटी-मंडी और आईआईटी-कानपुर ने पुनर्जन्म के “विज्ञान” पर एक “खास सत्र” आयोजित किया। इस प्रोग्राम में बच्चों में “पिछले जन्म की यादों” का पता लगाने के लिए ईईजी (यह एक भौतिक उपकरण है, जो दिमाग के विद्युतीय गतिविधि को रिकॉर्ड करता है) डेटा और ज्योतिषीय जन्म-कुंडली का इस्तेमाल करने का प्रस्ताव रखा गया। इस कार्यक्रम में वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ परसेप्चुअल स्टडीज़’ (DOPS) के वक्ताओं को भी शामिल किया गया था। यह अलग बात है कि डीओपीएस एक विवादित संस्था है। इस संस्थान को छद्म-विज्ञान केंद्र के रूप में ही जाना जाता है।

वास्तव में यह कार्यक्रम उच्च शिक्षा के लिए एक संकट जैसा था। छद्म-विज्ञान अब पूरी तरह से संस्थागत हो गया है और इसमें शामिल आईआईटी संस्थान धार्मिक मान्यताओं के लिए अपनी शैक्षणिक साख का सौदा करने के इचछुक दिखाई देते हैं। कार्यक्रम में मौजूद ‘शोधकर्ताओं’ ने उत्तर भारत के एक छह साल के बच्चे के मामले के आधार पर एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक दावे के लिए “व्यवस्थित कार्यप्रणाली” बनाने पर चर्चा की। आम तौर पर ऐसी चीज़ को महज़ एक दंतकथा कहा जाता है।

यह कहना कि किसी एक बच्चे का न्यूरल रिस्पॉन्स (दिमागी प्रतिक्रिया) पुनर्जन्म की आवधारणा को सही साबित कर सकता है, वास्तव में भारतीय दर्शन की सर्वोत्तम परंपरा के साथ अन्याय है। ये विचार इसलिए बेहतरीन नहीं हैं कि वे अपने समय की अजीब उपज थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें मानने वालों ने अपने पास मौजूद तथ्यों पर ईमानदारी और सावधानी से विचार किया था। आज हमारे पास जो तथ्य हैं, उन्हें देखते हुए भी सिर्फ़ एक व्यक्ति पर की गई ‘स्टडी’ या पुनर्जन्म जैसी डुअलिस्ट थ्योरी (दोहरी सत्ता वाला सिद्धांत) को साबित करने के लिए ईईजी (एक भौतिक उपकरण) का इस्तेमाल करके उसे सही मानना बेवकूफी है।

‘रिसर्चर’ ने बच्चे को “पिछले जन्म से जुड़े स्टिमुलस” (उत्तेजक चीज़ें) दिखाने का प्रस्ताव रखा, जैसे ‘पिछले जन्म’ के जीवनसाथी’ की तस्वीरें और दिमाग की प्रतिक्रिया रिकॉर्ड करने की बात कही। चूंकि ग्रुप के अपने प्रोटोकॉल में टेस्ट से पहले बच्चे के साथ “जान-पहचान बढ़ाना” और “पिछले जन्म के परिवार” से तस्वीरें इकट्ठा करना शामिल था, इसलिए रिसर्चर असल में वही स्टिमुलस बना रहे थे, जिन्हें वे ‘खोजने’ का दावा कर रहे थे। इसे कन्फरमेशन बायस यानी अपनी बात सही साबित करने की पक्षपातपूर्ण कोशिश कहते हैं। कोढ़ में खाज की तरह इसमें ज्योतिष को शामिल कर लिया गया, जो एक बकवास के सिवा कुछ नहीं है। आईकेएस सेंटर्स ने “वेस्टर्न” विश्वसनीयता के लिए डीओपीएस के साथ पार्टनरशिप की, लेकिन डीओपीएस का काम अपनी दोषपूर्ण मेथडोलॉजी के लिए बदनाम रहा है। दुनिया के बैज्ञानिक उसे गंभीरता से नहीं लेते। आलोचकों का कहना है कि मौत और कथित पुनर्जन्म के बीच के समय में ‘पिछले परिवार’ और ‘मौजूदा परिवार’ के पास मिलने, बातचीत करने और पुनर्जन्म की सांस्कृतिक कहानी के हिसाब से अपनी कहानियों को मिलाने का काफी मौका होता है। ‘रिसर्चर’ ने इस बात की भी जांच नहीं की कि “पिछले जन्म की यादें” लगभग उन्हीं संस्कृतियों में बताई जाती हैं जहाँ पहले से ही पुनर्जन्म में विश्वास किया जाता है।

ज़बरदस्ती का तरीका

लगता है कि सालों तक छात्रों की हिंसा ओर उकसाने और टेक्स्टबुक में बदलाव करके बाहर से एकेडेमिया को बदलने की कोशिश बंद कर दी है और अब हिंदुत्व प्रोग्राम ने अपनी रणनीति बदलकर ऊपर से नीचे की ओर लागू करने वाला तरीका अपना लिया है। डॉक्टरेट के छात्रों के लिए “स्पेशल सेशन” में शामिल होना ज़रूरी कर दिया गया था। अजीब तो यह है कि केंद्रों ने फील्डवर्क के नाम पर आईआईटी के फंड और रिसर्च फेलो का इस्तेमाल फील्डवर्क के तौर पर भूत पकड़ने के लिए किया है। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की 2023 की गाइडलाइंस के तहत हायर एजुकेशन के सभी छात्रों के लिए क्रेडिट के लिए आईकेएस कोर्स करना ज़रूरी है। आईआईटी के एडमिनिस्ट्रेटर जानते हैं कि वे संस्थानों की प्रतिष्ठा से समझौता कर रहे हैं, लेकिन वे इसका जोखिम उठाने को तैयार हैं क्योंकि उनका लक्ष्य वैज्ञानिक लीडरशिप नहीं है, बल्कि उनका लक्ष्य घरेलू स्तर पर हिंदुत्व की विचारधारा को मज़बूत करना है। आईआईटी संस्थानों में फैल रही छद्म-विज्ञान की बीमारी भारत के बेहतरीन टैलेंट को विदेशों की उन यूनिवर्सिटीज़ में जाने के लिए बढ़ावा देगी, जो अभी भी उपनिवेश-मुक्ति और विज्ञान के बीच फ़र्क समझती हैं। इन “खास सत्रों” (special sessions) की वजह से अच्छे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक आईआईटी की डिग्रियों को कमतर समझने लगेंगे; इससे भारतीय शिक्षा को तर्कसंगतता के वैश्विक मानकों से अलग करके “आत्मनिर्भर” नैरेटिव को भी बढ़ावा मिलेगा।

आखिरकार, यह चक्र ऐसा बन जाएगा कि भारतीय स्कॉलर्स को सिर्फ़ एक खास सभ्यता-संबंधी प्रोजेक्ट के प्रति उनकी निष्ठा के आधार पर ही आंका जाएगा। सच तो ये है कि ऐसा होने भी लगा है। कोई यह न समझे कि यह आईकेएस केंद्र अपनी मर्जी से ऐसा कर रहे हैं। नई शिक्षा नीति का विशेष आग्रह रहा है कि दंतकथाओं को वैज्ञानिक जामा पहनाया जाए।

जब से केंद्र में मोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता पर काबिज हुयी है, तब से हमें लगातार ऐसे बयान सुनने को मिलते रहे हैं, जो तर्क और इतिहास का उपहास उड़ाते नजर आते हैं। दिलचस्प है कि ऐसे बयानों की शुरुआत स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने ही की थी, जब उन्होंने अक्टूबर 2014 में मुंबई के एक अस्पताल रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल के उद्घाटन के दौरान कहा कि भारत में प्लास्टिक सर्जरी और ऑर्गेन ट्रान्सप्लान्टेशन प्राचीन काल से ही काफी उन्नत रहा है। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने गणेश के धड़ पर हाथी का सर लगाए जाने का अप्रतिम उदाहरण दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के जन्म को क्लोनिंग का कमाल भी बताया। इसी तरह हमें यह भी बताया गया कि पुष्पक विमान कोई कल्पना नहीं, बल्कि हमारी इंजीनियरिंग का नायाब नमूना था। उसके बाद तो भाजपा नेताओं में ऐसे बयान देने की होड़-सी शुरू हो गयी। गाय का मूत्र सभी बीमारियों के लिए रामवाण है, गोबर परमाणु विकिरण को रोकने में सक्षम है, गोमूत्र में सोना होता है, रामायण और महाभारत की कहानियां वास्तविक हैं, वेद विज्ञान की पुस्तक है, डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत गलत है, क्योंकि किसी ने बंदर को आदमी होते नहीं देखा, महाभारत काल में इंटरनेट था आदि जैसे बयानों की झड़ी लग गयी, जो अब भी जारी है।

कोई यह न समझे कि इस तरह की बातें मोदी जी या भाजपा के अनिय नेताओं के मुंह से अनायास निकल जाती है। सच तो यह है कि आरएसएस समेत सभी हिंदूवादी संगठनों की यही सोच है और मोदी जी इसी सोच के आंगन में खेलते हुए बड़े हुए हैं।

दरअसल, इसके दो कारण नजर आते हैं। पहला तो यह कि ऐसे बयान भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने के उनके एजेंडे में फिट बैठते हैं। गाय, गोबर, गंगा और गीता के साथ-साथ हिन्दू धर्म को राष्ट्रवाद के पर्याय के रूप में उपस्थित और स्थापित करने की मंशा से ही उक्त बयान नि:सृत दिखायी देते हैं। चूंकि हिन्दू राष्ट्र स्वयं एक काल्पनिक अवधारणा है, इसलिए इसका औचित्य भी काल्पनिक तथ्यों से ही सिद्ध किया जा सकता है। संघ परिवार की कल्पना में भारत न केवल एक हिन्दू राष्ट्र है, बल्कि आज का सारा ज्ञान-विज्ञान वेदों, उपनिषदों, पुराणों में मौजूद हैं। अन्यथा नहीं कि वे रामायण, महाभारत समेत इन तमाम ग्रंथों को भारत का ‘वास्तविक’ इतिहास बताते हैं और इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के तर्कों को हिन्दू विरोधी और अन्तत: राष्ट्र विरोधी बताते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि एक बार यदि वे धर्मग्रंथों में वर्णित कथाओं को इतिहास का जामा पहनाने में सफल हो जाते हैं (भले ही काल्पनिक), तो यह भी स्वयं ही सिद्ध हो जाएगा कि प्राचीन काल में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भारत दुनिया का सिरमौर था यानी विश्वगुरु था।

उनके ऐसे बयानों का दूसरा मकसद अपने लिए व्यापक हिन्दुओं का समर्थन जुटाना है। आखिर इसका क्या कारण हो सकता है कि दुनियाभर की तमाम आलोचनाएं भी उनके इस तरह के बयानों पर अंकुश लगाने या उन्हें हतोत्साह करने में विफल हैं? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ऐसी बातें लोगों की नाजुक और क्षत भावनाओं को अपील करती हैं। आज दुनिया में हमारी हैसियत क्या है, हम जानते हैं। हम किसी भी क्षेत्र में विकसित देशों से अपनी तुलना नहीं कर सकते। ज्ञान-विज्ञान के मामले में हम उनके पासंग भी नहीं ठहरते। भारतीय, खासकर हिन्दू समाज इसे लेकर कुंठा का शिकार है। आज भी हमारे देश में लगभग 25 करोड़ लोग निरक्षर हैं और जो पढ़े-लिखे हैं, उनमें कुंठित लोगों की संख्या बहुतायत में है। ऐसे में यदि कोई भाजपा नेता कहता है कि हमारे देश में सर्जरी प्राचीन काल से ही उन्नत रही है, या महाभारत काल में यहां इंटरनेट था या नारद मुनी गुगल की तरह थे, तो लोगों की आहत भावनाओं को बड़ी राहत मिलती है। यह सोचकर उन्हें शुकून मिलता है कि आज हम भले ही पीछे हैं, लेकिन प्राचीन काल में हम विश्वगुरु रहे थे। ऐसी बातों से उन्हें आत्मतुष्टि मिलती है। उनका पराजय भाव प्रबल रूप से विजयी भाव में तब्दील हो जाता है। यह वही भाव है, जो बहुधा हमारी कहावतों में अभिव्यक्त होता है, जैसे हमारे दादा तो बावन बिघे में केवल पुदीना रोपते थे, भले ही आज हम कंगाल है। कहा जाए तो ऐसे बयान हमें भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर श्रेष्ठ समझने का आधार प्रदान करते हैं। यही कारण है कि भाजपा नेताओं के मूर्खतापूर्ण और तर्क विरोधी बयान भी व्यापक जनता के मन में वितृष्णा पैदा नहीं करते, बल्कि सम्मान का भाव पैदा करते हैं।

ध्यान से देखें तो साफ पता चलता है कि भाजपा नेताओं के बयान हमारी उन्हीं भावनाओं से ज्याद संबंधित हैं, जो हमारी छुईमुई यानी जल्दी आहत होनेवाली भावनाएं हैं और जो तर्क और विवेक से ज्यादा भावुकता से प्रेरित होती हैं। आखिरकार राष्ट्रवाद, गोरक्षा, अतीत का गुणगान (बहुधा काल्पनिक), धार्मिक आस्था आदि ऐसी ही तो भावनाएं हैं। भाजपा नेताओं के बयान हमारे विवेक को नहीं, बल्कि हमारी निकृष्ट भावनाओं को उद्वेलित करती हैं। एक तरह से उनके बयान हमारे मन में वह भाव पैदा करती हैं, जो हम हैं तो नहीं, लेकिन होना चाहते हैं। मुसलमानों के प्रति फैलायी जा रही निऱाधार घृणा इसी भाव की एक अभिव्यक्ति है। भाजपा नेताओं के झूठ बयानों को भी हिन्दू समाज में इसीलिए मान्यता मिल जाती है कि वह स्वयं भी ऐसा होते देखना चाहता है। कहा जाए, तो आईकेएस आज सत्ताधारी दल के हिंदुत्व प्रोजेक्ट का ही एक हिस्सा बन गया है।

(कुमार नरेन्द्र सिंह वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं)

Posted Date:

July 3, 2026

11:18 pm

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