गोपाल दास ‘नीरज’ को सुनना और महसूस करना…

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई

गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

जाड़े की गुनगुनी धूप और गरमी की शाम में अलीगढ़ के अपने मकान के बरामदे में बिस्तर पर लेटे लेटे अपना ज्यादातर वक्त गुज़ारने वाले नीरज जी अक्सर अपना यही गीत गुनगुनाते थे –
देवानंद और राजकपूर की बेहद इज्जत करने वाले, उन्हें सबसे समझदार और शानदार फिल्मकार बताने वाले नीरज जी के लिए उनका यादगार गीत भी हमेशा उनका साथ देता था – ‘दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है।‘ इसी गीत को उन्होंने अपने फोन की कॉलर ट्यून भी बना रखा था।

19 जुलाई 2018 को जब गोपाल दास ‘नीरज’ ने करीब 94 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा तो मानो एक युग का अंत हो गया…लेकिन उनकी रचनाएं अमर हैं.. आज भी लोगों की ज़बान पर गूंजती हुई…

उनके आखिरी दिनों में उन्हें करीब से देखने, समझने और महसूस करने का मुझे अलीगढ़ के उनके घर में मौका मिला था। एक पूरा दिन उनके साथ गुज़ारना, उनके जीवन के तमाम पहलुओं के बारे में अंतरंग बातें… आज के दौर की कविता से लेकर गीतों तक के बारे में उनके अनुभव को जानना वाकई एक यादगार लम्हा है।
समाज और राजनीति से लेकर रिश्तों के ताने बाने तक को नीरज जी ने जिस गहराई से देखा, महसूस किया और शब्दों में पिरोया, वो हमेशा याद किया जाएगा।

 

नीरज प्रेम के कवि थे, उनका कहना था कि कविता हमेशा गेय होनी चाहिए। नई कविता को वे कविता नहीं मानते थे और खुद को किनारे किए जाने को लेकर भी उनकी अपनी नाराजगी थी।
साहित्य की खेमेबाजी को लेकर वो दुखी रहते थे उनका मानना था कि समानांतर कविता आंदोलन के नाम पर लिखी जा रही कविताएं दरअसल कविता नहीं है।
वो कहते थे कि लोग मंचीय कवियों को बेशक दोयम दर्जे का मानें, लेकिन असली कवि वही हैं जिन्हें लोग सुनते हैं, पसंद करते हैं और तालियां बजाते हैं।
बेशक अब उनके बगैर मंच सूने हो गए हों, उनकी गैरमौजूदगी कविता प्रेमियों को हमेशा खलती है। लेकिन नीरज तो नीरज हैं। हमेशा रहेंगे। अपनी कविताओं के साथ, गीतों के साथ और शायरी के साथ…

— अतुल सिन्हा

 

Posted Date:

July 19, 2020

11:29 am

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