क्या सिर्फ हिंदी बिरादरी के हैं नामवर

हमारे समय के हिंदी के सबसे कद्दावर और सबसे वरिष्ठ साहित्यकार नामवर सिंह अस्वस्थ हैं। कल उन्हें ब्रेनहेमरेज होने की खबर आई। किसी ने बताया कि उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया है। फिर किसी ने बताया कि वह एम्स के ट्रामा सेंटर में भरती हैं। हिंदी के अखबारों में उनके अस्वस्थ होने की छोटी सी खबर आई। हिंदी के एकाध चैनल में भी यह खबर थी। अंग्रेजी के अखबारों में उनके अस्वस्थ होने की कोई खबर नजर नहीं आई। खबरिया टीवी चैनलों से तो वैसे भी कोई उम्मीद नहीं है। 
सोशल नेटवर्क में हिंदी के साहित्यकारों ने उनके स्वास्थ्य को लेकर जरूर चिंता जताई है और उनके स्वस्थ्य होने की कामना की है। 
क्या नामवर सिर्फ इतने के ही हकदार हैं। आखिर क्यों उनके स्वास्थ्य को लेकर आधिकारिक बुलेटिन जारी नहीं किया गया और किया जा रहा है?
क्या हिंदी की लड़ाई सिर्फ भाषायी लड़ाई है और नौकरियों तक ही सीमित है? क्या हिंदी की लड़ाई सिर्फ 14 सितंबर हिंदी दिवस और हिंदी सप्ताह तक सीमित है? कोई भाषा तब बड़ी होती है जब उसके साहित्यकार बड़े होते है और उन्हेंं समुचित सम्मान मिलता है। 
91 वर्षीय नामवर सिंह अभी हाल तक सक्रिय रहे हैं। उनकी किसी कार्यक्रम में उपस्थिति मात्र से उसका गौरव कितना बढ़ जाता है, यह हिंदी की बिरादरी बखूबी जानती है। नामवर किसी का नाम भर ले दें तो वह खुद को धन्य समझने लगता है। ऐसे समय जब संकीर्ण राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जब पूरे विमर्श के केंद्र में आ गया है और जिसे भारतीय होने की अनिवार्य शर्त की तरह बताया जा रहा है, नामवर सिंह की उपस्थिति के खास मायने हैं।

वह जल्द स्वस्थ हों यही कामना है…

(सुदीप ठाकुर के फेसबुक वॉल से साभार)

Posted Date:

January 16, 2019

8:45 pm

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