
कुंभ आपने पहले भी देखा होगा। इसके बारे में सुना होगा। तस्वीरों में और चैनलों पर देखा होगा। हर 12 साल में लगने वाले कुंभ की खासियत के बारे में जाना होगा। 2013 में पूर्ण कुंभ का नज़ारा भी देखा होगा और इस बार के अर्धकुंभ की शानदार झलक भी देख रहे होंगे। देश की संस्कृति का एक बेहतरीन आयाम देखने को मिलता है इस महाआयोजन में। इस बार उत्तर प्रदेश सरकार और यहां तक कि केन्द्र सरकार ने इस अर्धकुंभ को
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आसमान पर राज करने वाले, अपने हैरतअंगेज़ करतबों से आसमान को मुट्ठी में कर लेने वाले और दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराने वाले भारतीय वायु सैनिकों का जलवा देखना अपने आप में एक अनुभव से गुज़रने जैसा है। 86वें वायुसेना दिवस के मौके पर हिंडन एयरबेस पर वायुसैनिकों ने पूरी लयबद्धता और तालमेल के साथ जो एयर शो दिखाया, जिस तरह की परेड पेश की और अनुशासन का जो शानदार नमूना दिखाया उससे पूरे देश क
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जिनके जीवन में रंग नहीं हैं, वृंदावन की गलियां उन्हें भी रंगीन बना देेती हैं... विधवाओं के लिए समाज में जो परंपरागत सोच है, वृंदावन उसे खारिज करता है। कहते हैं कि देश में ये इकलौती ऐसी जगह है जहां समय-असमय सफ़ेद कपड़ों में लिपट जाने वाली महिलाओं के जीवन में यहां रंग भर जाते हैं। कृष्ण भक्ति में रमी और राधे राधे करती ये महिलाएं यहां ज़िंदगी के मायने तलाशती हैं, कुछ नए रंगों को अपने जीवन
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ब्रज की होली के कई रंग हैं। ब्रज की होली की छटा अलग है, कहते हैं कि जग में होली ब्रज में होला.. बाकी ज्यादातर जगहों पर जहां होली एक दिन खेली जाती है, वहीं मथुरा, वृंदावन, गोकुल, नंदगांव, बरसाने में कुल एक हफ्ते तक होली चलती है। कान्हा के गांव नंदगांव और ब्रज की गलियों में घूमते और अपने कैमरे में होली के तमाम रंग कैद करते वरिष्ठ फोटोग्राफर रवि बत्रा ने जो रंग 7 रंग के लिए भेजा, वो आप भी देखिए.
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हमारे गणतंत्र की अपनी खासियत है। हमारे शौर्य, ताकत और विकास की कहानी के साथ साथ हमारी संस्कृति के तमाम रंगों से मिलकर बनता है हमारा गणतंत्र। हर साल 26 जनवरी को राजपथ पर इसकी झलक मिलती है। 69वें गणतंत्र दिवस की कुछ बेहतरीन तस्वीरें हम 7 रंग के पाठकों के लिए ले कर आए हैं जिन्हें अपने कैमरे में उतारा है जाने माने फोटोग्राफर रवि बत्रा ने। रवि के कैमरे का कमाल देखिए इस फोटो फीचर में।
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अगर आप रामायण को महज एक आध्यात्मिक ग्रंथ और हिन्दू धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर न देखें तो ये एक ऐसा महाग्रंथ है जिसमें जीवन और समाज के हर पहलू का बेहद तार्किक और सटीक चित्रण है। इसके हर दृश्य, हर अध्याय और हर कांड का अपना महत्व है। हज़ारों साल बीत गए लेकिन रामायण आखिर आज भी क्यों प्रासंगिक है, क्यों राम से जुड़ी लीलाएं हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की एक नायाब मिसाल हैं, इसे समझना ज
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क्या आज कठपुतली कला कहीं गुम हो रही है या फिर इसमें नए प्रयोग किए जा रहे हैं... तमाम लोक कलाओं की तरह कठपुतली को लेकर जो चिंता इससे जुड़े कलाकार जताते रहे हैं, उनमें आज के दौर के हिसाब से क्या सचमुच बदलाव आ रहा है.. ये तमाम सवाल जब हमने कठपुतली को बचाने और इसके विकास के लिए काम कर रहे दादी पदुमजी से पूछे तो उनके चेहरे पर कोई खास उत्साह के भाव नहीं दिखे।
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