
मैं वही चाणक्य हूँ जिसे आप कौटिल्य भी कहते हो और मुझे विष्णु गुप्त के नाम से भी पुकारते हो। आज मैं बिहार विधानसभा चुनाव होने से पहले राजधानी पाटलिपुत्र से अपना दुख दर्द आपके सामने बयाँ कर रहा हूं। आपको मालूम है कि बिहार में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है और सभी राजनीतिक दलों ने टिकटों की घोषणा भी कर दी है ।इन टिकटो के बंटवारे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच खींचतान और मतभेद भी साम
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कवि कई दिनों से अत्यंत प्रफुल्लित है। दिल बाग-बाग है। प्रसन्नता इतनी कि कवि हृदय बार-बार छलकने को आतुर हो जाता है। कवि जब अत्यधिक खुश होता है तो कविता नहीं लिख पाता। कविता उसे सूझती ही नहीं। वह लिखने की कोशिश अवश्य करता है लेकिन शब्द ही धोखा दे जाते हैं। वह गीत गाने का भी प्रयास करता है पर बोल ही नहीं उचरते। खुशी में कवि मधुर सुर छेड़ना चाहता है लेकिन उसके होंठ नहीं फड़कते। हां, पैर जर
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कुंभ अब सामान्य कुंभ नहीं रहा.. महासमुद्र की तरह महाकुंभ हो गया है... वैसे तो फिल्मों में अक्सर कुंभ के मेले में बिछड़ने के किस्से सुने जाते रहे... रही भगदड़ की बात तो भला वो तो सियासत की भाषा में होती ही रहती है.. जहां भीड़ है वहां भगदड़ है और जहां भगदड़ है वहां मरना, गुम होना, डूबना, उतराना तो आम बात है... मंत्री संतरी तो यही कहते हैं भाई कि जहां इतनी भीड़ होगी, जहां इतना बड़ा आयोजन होगा, वहां त
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संसद में इन दिनों थैला बंद सियासत का ज़ोर है… कुछ थैले कंधे पर हैं तो कुछ अलग अलग तरीकों से संसद के भीतर… बाहर तो झोला छाप कामरेड से लेकर झोला झाप लेखक और डॉक्टर की चर्चा तो अक्सर होती है लेकिन अब ये झोला संस्कृति कुछ बदली बदली सी है.. कुछ झोले पर पार्टी के निशान तो नेताओं की फोटो तो कुछ पर आंदोलन के नारे… कमाल की इस झोला या थैला संस्कृति पर जाने माने व्यंग्यकार और पत्रकार अनिल त्रिवेदी
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मच्छर आपको हर जगह मिल जाएंगे। इनके लिए कहीं कोई रोक-टोक नहीं। जहां अनुकूल माहौल मिला डाल दिया डेरा डंगर और फैला लिया अपना साम्राज्य। कोई भी मौसम या कोई भी जगह इनके लिए पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। फिर भी जहां इनके रहने, खाने और पीने की सुविधाएं मिलती हैं, वहां चप्पे-चप्पे पर इन्हीं का कब्जा रहता है। अपने यहां मच्छरों के लिए सारी सुविधाएं मौजूद हैं। प्रशासन इनका विशेष ध्यान रखता है।
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लड्डू प्रकरण के बाद चूंचूं अंकल का दिल रह रहकर लड्डुओं के लिए मचल उठता है। मुंह का पानी कतई सूखने में नहीं आ रहा है। हर समय उनके मन में लड्डू फूट रहे हैं। लड्डुओं के प्रति अचानक उमड़ी उनकी प्रीति से घर के बाकी लोग हैरान हैं। रोज घर में आधा किलो लड्डू आते हैं और चूंचूं अंकल शाम तक सब अकेले ही निपटा देते हैं। सुबह फिर लड्डू-लड्डू की रट लगाने लगते हैं। अंकल का लड्डू प्रेम इनदिनों उनके देश
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यह तो भाई हद हो गई। वे बार-बार कह रहे हैं कि वे कट्टर ईमानदार हैं, बेईमानी से दूर-दूर तक उनका कोई नाता नहीं है। फिर भी कोई मानने को तैयार ही नहीं है। जब वे गला फाड़-फाड़कर ईमानदारी की कसमें खा रहे हैं तब तो हर किसी को उनकी बात पर विश्वास कर ही लेना चाहिए।
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साहित्यकार भुवनेश्वर ने आज के 85 साल पहले प्रसिद्ध कहानी लिखी थी- भेड़िये। तब यह कहानी जितनी चर्चित हुई थी उससे ज्यादा भेड़िये चर्चा में आए थे। उसी खौफ के साथ भेड़िये फिर लौटे हैं। यूपी के बहराइच और आसपास के इलाकों में भेड़ियों का खौफ पसरा है। टीवी चैनलों पर सिर्फ भेड़िये छाए हैं। पैने और नुकीले दांत दिखाते, जीभ से लार टपकाते और खून सने मुंह वाले भेड़िये। नदी-नालों और खेतों में झुंड
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ताओं का माफी मांगना, वोट की खातिर जनता के आगे नतमस्तक हो जाना, खुद को निरीह और वक्त का मारा बता कर रोना और सहानुभूति लेना आम बात है... लेकिन जब कोई 'सर्वशक्तिशाली विश्वगुरु' या परालौकिक प्राणी की जुबान पर माफी जैसा शब्द आ जाए तो सोचिए वह किस मानसिक द्वंद्व और मजबूरी का शिकार होगा.. जिसके अहंकार की मिसालें दी जाती हों, जिसे ईश्वर का अवतार साबित किया जाता रहा हो, वह गांधी जी बन जाए, उसके भीतर
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दलबदल और वैचारिक भटकाव के इस ज़माने में आप किसी पर भरोसा नहीं कर सकते... वैसे भी सत्ता और फायदेमंद राजनीति का स्वाद जिसे लगा, उसके लिए विचारधारा का कोई मतलब नहीं रह जाता... घर घर में यही हालत हो गई है... न कोई नैतिकता, न कोई ईमान, लेकिन यह खेल दिलचस्प है अगर आप इसे कुछ इस नज़रिये से देखें तब... वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार अनिल त्रिवेदी का ताज़ा व्यंग्य..
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