नाम और दाम से बेपरवाह ‘आनन्द’

 

एक ज़माने में सक्रिय पत्रकारिता में रहीं डॉ तृप्ति की कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में गहरी पकड़ रही है। तमाम सामाजिक सवालों के साथ ही तमाम मनोवैज्ञानिक मसलों पर अपनी अहम् राय रखने वालीं डॉ तृप्ति ने इस आलेख के ज़रिये कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाले ब्रजमोहन आनंद की कला यात्रा पर बारीक नज़र डाली है।

 कम ही लोग होंगे जो ब्रजमोहन आनंद (1928-1986) के नाम और काम से परिचित होंगे।  ‘इंडिया आर्ट फेयर’ 2018 में  पहली बार मुझे उनके काम की झलक  दिखाई दी  जो चकित कर देने के लिए काफी थी। कितने भिन्न माध्यमों, शैलियों और विषयों पर ब्रज मोहन  आनंद एक ही समय पर  काम कर रहे थे, पर सब एक दूसरे से पूरी तरह अप्रभावित।


लगभग पांच साल पहले तक तो यह नाम बिल्कुल ही अनसुना था। यह गुमनामी एक तरह  से आनंद की खुद अपनी चुनी हुई थी जिसने न कभी अपने चित्रों की कोई प्रर्दशनी की न ही कोई पेंटिंग बेची।इसकी जो एक वजह समझ मे आती है वह यह कि आनंद शायद किसी भी प्रकार के दबाव से मुक्त हो कर काम करना चाहते थे।कला उनके लिए मन बहलाव का साधन नहीं थी जिसके लुभावने रंग और आकर्षक छवियां जिंदगी के बारे में एक इल्यूजन पैदा करें। नयी -नयी मिली आज़ादी भी उन्हें लुभाती नहीं क्योंकि आणविक हथियारों के साथ युद्ध के मुहाने पर बैठा एशिया उन्हे ज्यादा चिंतित करता था।
ब्रज मोहन आनंद के लिए कला उनकी सामाजिक -राजनीतिक  प्रतिबद्धता का प्रतिफलन थी। उनके चित्र तत्कालीन समय और समाज पर   तीखे सोशियो -पालिटिकल कमेंट की तरह हैं। इन चित्रों में साम्राज्यवादी , विस्तारवादी , तानाशाही प्रवृत्तियों  की विकृत   सूरत है तो शीत युद्ध की क्रूरता भी  है। उसमें परमाणु हमले का आसन्नसंकट है तो पालिटिकल आइडियोलॉजी के नाम पर ख़ेमों में बंटी दुनिया भी है। वहां बुद्ध की करुणा और अहिंसा लहूलुहान पड़ी है। इसीलिए आनंद के चित्रों में अवसाद  की एक परत चढ़ी सी  दिखती है ‌। 


उनके चित्रों में स्त्रियां भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।वे कमनीय तो हैं पर कोमलांगी नहीं,और पुरुष से कमतर तो बिल्कुल भी नहीं। वे  विषय की  दृष्टि से ही नहीं ,फिजिकली भी आनंद के चित्रों में पुरुष के बराबर स्पेस लेती हैं।
अपने विषय के अनुसार ही  बी. एम. आनंद रंग और टेक्नीक का चुनाव करते हैं। जिस किस्म की डार्क रियलटीज को वह दिखाना चाहते हैं उसके लिए काले के अलावा और कौन सा रंग कारगर हो सकता था।  इस तरह के सभी चित्रों में उन्ह़ोने स्क्रैचबोर्ड पर एचिंग की तकनीक अपनाई है जिसे शायद ही किसी अन्य कलाकार ने इस्तेमाल किया है। स्क्रैचबोर्ड पर चित्र बनाने का अर्थ है चरम एकाग्रता और हाथ और कलम पर अभूतपूर्व नियंत्रण।इस तरह आनंद खुद के आगे खुद को ही चुनौती के रुप मे खड़ा करते हैं।


आनंद ने कला  की कोई विधिवत शिक्षा नहीं पाई थी।उनके समकालीनों में वे प्रख्यात आर्टिस्ट हैं जो आज कला बाजार का अनिवार्य ‌नाम हैं और उस समय प्रोग्रेसिव  आर्टिस्ट ग्रुप ( मुंबई) बना कर कला का नया व्याकरण और मुहावरा गढ़ने के साथ ही अपनी आइडेंटिटी की तलाश में विदेश का भी रुख कर रहे थे। हुसैन, रज़ा,सूजा,तैयब मेहता,किशन खन्ना आदि की ख्याति के समानांतर बी .एम.आनंद  किसी  पहचान की परवाह किए बिना एक एक्टिविस्ट की तरह कला साधना में लगे रहे‌।बिना किसी डर और समझौते के वे अपने विचार  न सिर्फ चित्रों के ज़रिए दर्ज कर रहे थे बल्कि महत्त्वपूर्ण मौकों पर सीधे दखल दे रहे थे।

आज जब आए दिन अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम राष्ट्रद्रोह का सवाल उठता रहता है, ऐसे में आनंद  के व्यवस्था विरोधी चित्र और प्रतिरोध से  जुड़ी घटनाओं का इतिहास और भी महत्वपूर्ण  हो जाता है।अगर हम कश्मीर में सन् 1947 की उस कला प्रदर्शनी को छोड़ भी दें जिसमें उनके न्यूड चित्रों की वजह से शेख अब्दुल्ला  से इतनी ठन गई कि  गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया गया और किसी प्रकार छिप छपा कर वे वहां से बच निकले पर सन् 1955 में  सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के लिए उठाए गए उनके दुस्साहसिक कदम जैसा कोई दूसरा उदाहरण तत्कालीन इतिहास में शायद ही मिले।


नवम्बर 1955 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने  राष्ट्रपति भवन में रूस के दो परम शक्तिशाली नेताओं बुल्गानिन  और ख्रुश्चेव के  स्वागत  समारोह का आयोजन किया था।   27 वर्षीय आनंद अपनी पेंटिंग ले कर वहां पहुंच जाते हैं । शायद आनंद यह बताना चाहते थे कि  विश्वशांति और समाजवादकी स्थापना में रुस की  भूमिका  से उन्हें असंतोष है।
आनंद अपने इस कदम से पं नेहरू की नाराज़गी मोल लेते हैं।यह लगभग राष्ट्रद्रोह सा अपराध था जिसके फलस्वरूप न सिर्फ उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया बल्कि लम्बे समय तक उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखी  गई। लेकिन यह सब भी बी एम आनंद को विचलित नहीं कर पाता। वियतनाम युद्ध उन्हें भीतर तक हिला देता है और वे फिर एक बार प्रतिरोध का एक नया तरीका ढूंढ़ते हैं। वे  एक  स्क्रैचबोर्ड संयोजन तैयार करते हैं और उसे ग्रीटिंग कार्ड के तौर पर छाप  कर दिल्ली स्थित तमाम राजदूतों, काउंसलेट और अखबारों को भेजते हैं जिस पर  स्पष्ट  संदेश था -Stop Burning Asia (The Death (sic) is shadowing you)क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि आनंद बतौर कलाकार    युद्ध की मुखालिफत को  इतनी भारी जिम्मेदारी समझते हैं कि ये ग्रीटिंग कार्ड छापने के लिए  न सिर्फ घर में प्रिंटिंग प्रेस  लगाते हैं बल्कि उन्हें भेजने के लिए  बाकायदा परिवार  और मित्रों की टीम तैयार करते हैं।1974 में  भारत द्वारा  पोखरण में किया गया  न्यूक्लियर टेस्टएक बार फिर आनंद की आत्मा को झकझोर देता है और वे परिणाम की परवाह किए बिना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इस कदम के विरोध में उन्हें देने के लिए पेंटिंग बनाते हैं।इस विद्रोही स्वभाव के पीछे संभवतः निजी जीवन की दुखद घटनाएं भी थीं जिनसे कच्ची उम्र में बी.एम.आनंद का  सामना  हुआ और शायद कोई भी चीज उन त्रासदियों के निशान धुंधले नहीं कर पाई थी जो आनंद के किशोर जीवन में बार बार घटीं।

आनंद के जन्म से कोई नौ साल पहले उनके  भाई मदन मोहन जलियांवाला बाग़ में हुए नर संहार में  शहीद हुए थे । मदन मोहन की उम्र सिर्फ तब 12साल थी। इस घटना ने आनंद के पिता डा. मनीराम का कांग्रेस से मोहभंग कर दिया था और वे क्रांतिकारियों  की तरफ मुड़ गए थे। मनीराम सामाजिक रसूख वाले व्यक्ति थे।वे पंजाब के  शायद पहले व्यक्ति थे जिन्हें शराब बिक्री के लिए लाइसेंस मिला था और जिन्होंने यह उसूल बनाया था कि इस बिक्री की कुल आमदनी  सिर्फ आजादी की लड़ाई के काम आएगी।पहले कांग्रेस और बाद में क्रांतिकारियों  को वे आर्थिक मदद देते रहे। बाद में शायद यह जान कर अंग्रेजी हुकूमत की नज़र टेढ़ी हुई और डा.मनीराम को गैर कानूनी तरीके से  शराब रखने के झूठे मामले में फंसाया गया। उनके आगे इल्जाम मान लेने और माफी मांगने की शर्त रखी गई और इसके एवज में शायद ‘रायबहादुर’ का खिताब देने का लालच भी दिया गया था। मनीराम ने इससे इनकार तो कर दिया पर बदनामी  ने उन्हें तोड़ दिया। वे अमृतसर  छोड़ कर परिवार सहित नग्गर (हिमाचल प्रदेश)चले गए। ब्रज मोहन आनंद को हालांकि नग्गर में विख्यात रुसी चित्रकार रोरिक के निकट आने और सीखने का अवसर मिला पर कई कड़वी सचाइयों से भी उनका सामना हुआ।

उनके चौदह साल का होते -होते  मां और पिता दोनों की मृत्यु हो चुकी थी, पढ़ाई छूट गई थी और वे रिश्तेदारों के यहां रहने के लिए एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहे। फिर विभाजन की त्रासदी का  सामना भी  हुआ।आनंद 1947 में पठान का भेस धर कर छिपते -छिपाते अमृतसर पहुंचे।इस कठिन दौर में कितना कुछ उनसे छूट गया।साथ थी तो सिर्फ कला जिससे नौ साल की उम्र में उनका नाता जुड़ा था और जिसने उतनी सी उम्र में भी उन्हें बहुत हद तक आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर बनाया था।
आगे चल कर जब उन्होंने अपने  चित्र न बेचने का फैसला किया तब यही कला  दूसरे माध्यमों से  आय का जरिया बनी। दिल्ली में बस गए ब्रज मोहन आनंद एक कुशल ड्राफ्ट्समैन और इलस्ट्रेटर भी थे। अखबारों, पोस्टरों और किताबों के कवर  पर उनके कलाकार का एक दूसरा पहलू सामने था।  एन सी ई आर टी की पाठ्य-पुस्तकों के चित्र ,रेडक्रास के लिए उनके बनाए पोस्टर और उस दौर के तमाम लोकप्रिय उपन्यासों के कवर  कामर्शियल आर्टिस्ट के रूप में उनकी सफलता के गवाह हैं।
आनंद ने  इनके अलावा भी जन जीवन और प्राकृतिक सौन्दर्य  को विभिन्न माध्यमों से चित्रों का विषय बनाया और स्क्रैच बोर्ड की तरह ही इंक,वाटर कलर  आदि माध्यमों का सफल प्रयोग किया। उनकी मृत्यु के लगभग तीन दशक बाद उनके लगभग 15,00 चित्रों ने  अब कला जगत में दस्तक दी है। ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी ये चित्र निश्चय ही संरक्षित किए जाने चाहिए। ‘नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट’ से इस दिशा में पहल की आशा स्वाभाविक है।

Posted Date:

May 2, 2020

2:50 pm Tags: , , , , , ,

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