बंदूक से हिंसा निकलती है जबकि किताबों से प्रेम: राजकुमार गौतम
मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन के ‘कथा संवाद’ में मर्डर मिस्ट्री ‘जजमेंट’ का  विमोचन
 गाजियाबाद। हिंदी के मशहूर लेखक राजकुमार गौतम का मानना है कि किताबों से जब मनुष्य बदलता है तब पूरी दुनिया बदलती है। कुछ सिरफिरे बंदूक के बूते दुनिया बदलने की कोशिश कई बार कर चुके हैं। लेकिन बंदूक से हिंसा ही निकलती है और किताब से प्रेम निकलता है। प्रेम ही मनुष्य को इंसान बनाने के साथ उसे इंसाफ के रास्ते पर ले जाता है। वरिष्ठ पत्रकार संजय शिशोदिया की आरुषि हत्या कांड पर लिखित पुस्तक ‘जजमेंट’ का विमोचन करते हुए उन्होंने कहा कि संजय शिशोदिया का यह प्रयास लेखन की एक नई दिशा और संभावना का परिचारक है।
   होटल रेड बरी में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री गौतम ने कहा कि “कथा संवाद” की यह घटना राजधानी दिल्ली में भी विरल है।नवागंतुकों के लिए इस तरह की कार्यशाला बेहद अहम है।हिन्दी लेखन में बाढ़ आई हुई है। लेकिन श्रेष्ठता की कमी है।इतर भाषाओं का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भैरप्पा से एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने पूछा कि आपके कितने उपन्यास आ चुके हैं।लेकिन भैरप्पा को अपने उपन्यासों की संख्या ठीक से याद नहीं थी।इसके विपरीत हिन्दी का यह हाल है कि एक कहानी या उपन्यास लिखने वाला भारत रत्न की ओर ताकने लगता है। ‘जजमेंट’ की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि आज विषयों की कमी नहीं है।लेखन का बहुत मसाला मौजूद है। के दौर में विषय सीमित थे। ‘ईदगाह’ कहानी इसका उदाहरण है।
  श्री गौतम ने रोजगार परकता से उभरी लेखकीय संभावनाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि भगवती चरण वर्मा और खुशवंत सिंह दोनों पेशे से वकील थे। ‘चित्रलेखा’ और ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ पेशागत विफलता और गर्दिश के दौर की साहित्य को अविस्मरणीय देन है।रोजगार की उम्मीद में कचहरी पहुंचे भगवती चरण वर्मा ने उस दौर में प्रचलित एलिफेंट कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा ‘आखिर पाप क्या है, पुण्य क्या है?’ यही पंक्ति ‘चित्रलेखा’ जैसी कालजयी रचना का आधार बनी। श्री गौतम ने कहा कि पत्रकार और लेखक का रिश्ता बहुत गहरा है।
  ‘जजमेंट’ के लेखक संजय शिशोदिया ने कहा कि यह पुस्तक अदालती कार्यवाही का वस्तुनिष्ठ ब्यौरा है। अदालत के फैसलों के बावजूद यह हत्याकांड आज भी एक मिस्ट्री बना हुआ है। बतौर बीट रिपोर्टर उन्हें 216 दिन चली अदालती कार्यवाही को कवर करने का अवसर मिला।केस की सुनवाई में हर दिन आ रहे दिलचस्प मोड़ और रहस्यों से उठ रहे पर्दे ने ही उन्हें किताब लिखने को प्रेरित किया। उन्होंने पुस्तक के प्रकाशन के लिए अनुभव प्रकाशन और पराग कौशिक का आभार भी जताया।
संस्था के अध्यक्ष शिवराज सिंह ने कहा कि इस हत्याकांड को महाभारत के सयदृष देखा जाए तो संजय शिशोदिया ने संजय की साक्षात भूमिका निभाई है। श्री सिंह ने अपनी एक ताजा कहानी ‘धप्पा’ का रचना पाठ भी किया। लेखक प्रवीण कुमार ने कहा कि आरुषि हत्याकांड आज भी अपने कुछ सवालों के जवाब तलाश रहा है। जिसके चलते पुस्तक का शीर्षक न्याय संगत है। कार्यक्रम में मौजूद बचाव पक्ष के वकील मनोज सिसोदिया ने घटनाक्रम से जुड़े उन रहस्यों से पर्दा उठाया जो अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए।
  “कथा संवाद” में सुभाष चन्दर ने ‘कबूतर की घर वापसी’, डॉ. स्नेह लता ने ‘सीख की फीस’ और डॉ. बीना शर्मा ने ‘बैड ब्वायज’ का वाचन किया। विमर्श के दौरान नित्यानंद तुषार ने सभी रचनाओं को आंख खोलने वाली रचना बताया।श्री चंदर ने ‘सीख की फीस’ पर पुन: काम करने की सलाह दी। श्री चंदर की कहानी की तुलना काफ्का की कहानी ‘ट्रायल’ से करते हुए डॉ. संजय शर्मा ने कहा कि समाज सदैव ही मनुष्यता को इस बेरहमी से जकड़े रहा है कि “स्व” के रूप में मनुष्य स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रख सकता।लेखक इसी जड़ता को तोड़ कर समाज में स्वतंत्र सांस लेने की प्रेरणा देता है। लेखक एवं आलोचक हरीश चंद्र ने कहा कि सुनी गई लघु कथा ‘बैड ब्वॉयज’ को वह संपूर्णता की श्रेणी में नहीं रखते।लघु कथा लिखना सबसे मुश्किल काम है। यह गजल के शेर की तरह मुकम्मल होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज चर्चा के केंद्र में धर्म और आस्था भी रहे। इसे लेकर भ्रमित लोगों को नरेंद्र कोहली और भैरप्पा को पढ़ना चाहिए।
  चर्चा में डॉ. धनंजय सिंह, वीरेश्वर सिंह भदौरिया, गोविंद गुलशन, डॉ महकार सिंह, सलामत मियां, सुशील शर्मा, संदीप सिंघल, आशुतोष यादव, मुकेश सिंघल, प्रमोद शर्मा, अभिषेक पंडित, सोनम यादव, अर्चना शर्मा, हिमांशु भसीन,गिरीश जोशी, भारत भूषण बरारा सहित बड़ी संख्या में लोगों ने भागीदारी की। कार्यक्रम का संचालन आलोक यात्री ने किया।
Posted Date:

August 12, 2018

5:05 pm

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