बेचारे चाणक्य को टिकट मिलना तो दूर वोटर आई कार्ड तक नहीं बन पा रहा…

मैं वही चाणक्य हूँ जिसे आप कौटिल्य भी कहते हो और मुझे विष्णु गुप्त के नाम से भी पुकारते हो। आज मैं बिहार विधानसभा चुनाव होने से पहले राजधानी पाटलिपुत्र से अपना दुख दर्द आपके सामने बयाँ कर रहा हूं। आपको मालूम है कि बिहार में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है और सभी राजनीतिक दलों ने टिकटों की घोषणा भी कर दी है ।इन टिकटो के बंटवारे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच खींचतान और मतभेद भी सामने नजर आए हैं लेकिन मैं आपके सामने अपनिब तकलीफों और मुश्किलातों का जिक्र कर रहा हूं। वह आपको जरूर सोचने को मजबूर कर देगा ।आखिर चाणक्य इतने सालों के बाद अपना मुंह क्यों खोल रहा है? आखिर आज वह क्या कहना चाह रहा है? आखिर कौन सी पीड़ा उसके भीतर वर्षों से पल रही है जो आज वह आपसे शेयर करना चाहता है? जी हां मैं चाणक्य जरूर हूँ मैं कौटिल्य जरूर हूँ मैं विष्णु गुप्त जरूर हूं लेकिन मैं वह नहीं हूं जो मुझे होना चाहिए था।इस जमाने में। आखिर मुझसे ही लोगों ने सीखी कूटनीति । आखिर लोगों ने मुझसे ही जाना राजनीति क्या है ?आखिर मुझसे ही लोगों ने जाना शतरंजी “चाल क्या है? लेकिन आज मैं आप सबके सामने बेबस और लाचार हूँ।आज मेरी वह औकात नहीं है जो कभी होती थी। आज मेरी वह पूछ नहीं हैजो कभी होती थी। आज तो मुझे लोग जानते भी नहीं है ।यह जमाना बिल्कुल बदल चुका है ।यहाँ हवा भी बिल्कुल बदल चुकी है। टेलीविजन पर जो बहसें चल रही है ,उसमें मुझे उल एंकर मुझे बुलाते नहीं है क्योंकि मैँ चिल्ला नहीं सकता।मैं नहीं कह सकता इनको स्टूडियो से बाहर फेंकिये। गोदी मीडिया नहीं जाना चाहते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव के बारे में चाणक्य की क्या राय है? क्या है उसका दुख? क्या है उसकी पीड़ा? आखिर वह कुछ क्या कहना चाहता है? क्या टीवी के एंकरों को मुझे स्टूडियो में नहीं बुलाना चाहिए? क्या अखबारों को मुझसे नहीं पूछना चाहिए? क्या पत्रकारों को मुझसे संपर्क नहीं करना चाहिए? क्या नागरिक समाज को नहीं कहना चाहिए -आपब हमें मार्ग दिखाइए ।हमें रास्ता तो बताइए।

लेकिन आज सोशल मीडिया का जमाना है, तो मैंने सोचा है- मैं क्यों ना अपनी बात आपके सामने रखूँ।नेहा सिंह राठौड़ की तरह वीडियो बनाऊं। अगर किसी को पसंद आएगा तो वह हो सकता है अखबार में न्यूज़ दे। अगर किसी को अच्छा लगेगा तो हो सकता है वह उसे इंस्टाग्राम पर लगा दे।अगर किसी को मेरी बात पसंद आये तो हो सकता है उसे वायरल करें, लेकिन मैं नहीं जानता आपलोग मेरी बातों को किस रूप में लेंगे लेकिन मैं आज आपके सामने अपना दुख व्यक्त कर रहा हूँ। आप ही सोचिए इतने सालों से मैं राजनीति कर रहा हूँ । मैं भगवान कृष्ण के बाद भारतीय राजनीति का दूसरा आर्किटेक्ट हूँ।मैंने ही चंद्रगुप्त मौर्य को सम्राट बनाया और आज मुझे सम्राट चौधरी भी नहीं पहचानते हैं। मेरी भी इच्छा थी कि मैं भी चुनाव लड़ूं।जनता की सेवा करूँ।देश का विकास करूँ।सपनों का बिहार बनाऊं क्योंकि मैंने देखा जिन लोगों के पास सत्त्ता नहीं होती है उन्हें वक्त भी इतिहास के कूड़ेदान में फेंक देता है ।मैं चाणक्य जरूर हूँ लेकिन आज मेरे पास कोई सत्ता नहीं है
मैं विधायक नहीं हूं। मैं सांसद नहीं हूं। मैं मंत्री नहीं हूं। मैं मुख्यमंत्री भी नहीं हूं ।शायद यही कारण है कि आज कोई इस चाणक्य को पूछ नहीं रहा है। मैं भी चाहा था कि बिहार विधानसभा में के चुनाव में मुझे भी किसी पार्टी का टिकट मिल जाए।मेरे पास पैसे नहीं कि चुनाव लड़ सकूं। अगर मैथिली ठाकुर को टिकट मिल सकता है तो मुझे क्यों नहीं? अगर मंजू वर्मा के बेटे को टिकट मिल सकता है तो मुझे क्यों नहीं ? अगर अनंत सिंह को टिकट मिल सकता है तो मुझे क्यों नहीं? क्या मैं इतना आयोग हूं? क्या मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं? क्या मैं गया गुजरा हूं ?मैंने भी राजनितिक दलों से संपर्क करने की कोशिश की। पटना जब अमित शाह आए तो मैं भी उनसे मिला और उनसे अनुरोध किया कि एक टिकट तो मुझे भी आप दे दीजिए कहीं से मैं चुनाव लड़ूं ।आखिर मैँचाणक्य हूं राष्ट्रवादी हूँ, तो पता है उन्होंने मुझसे क्या कहा- तुम तो कभी आरएसएस में थे नहीं। तुमने तो हमेशा गुजरात दंगे के खिलाफ लिखा और बोला। तुम तो अंबेडकर की बात करते हो ।आखिर यह बताओ तुम्हें टिकट क्यों दिया जाए? मैं उनसे क्या कहता क्या बोलता , फिर सोचा चलो बीजेपी वाले अगर मुझे टिकट नहीं दे रहे तो कोई बात नहीं। मैंने जनता दल का दरवाजा खटखटाया।लल्लन सिंह संजय झा के माध्यम से मैं नीतीश कुमार से भी मिला। मैंने कहा नीतीश जी आप तो योग्य लोगों को पहचानते हैं पररखते हैं। आप मुझे कहीं से टिकट क्यों नहीं देते ? तो जानते हैं उन्होंने मुझसे क्या कहा- आप सवर्ण हो पिछड़ी जाति के नहीं हो और आपने कभी उन लोगों का विरोध नहीं किया जिन्होंने मुझे पलटू राम कहा तो भला बताओ मैं आपको टिकट कैसे दे सकता हूं? आखिर मैँ क्या करता मैं शिवानंद तिवारी के माध्यम से तेजस्वी यादव से मिला। मैंने उनसे अनुरोध किया कि आप ही मुझे टिकट दे दीजिए तो मैं चुनाव में नीतीश कुमार को धूल चटा दूं तो मालूम है तेजस्वी ने मुझे क्या कहा- आप लोग की राजनीति मैँ समझता हूं। इतने सालों से आप जैसे ब्राह्मणों ने ही बिहार का विनाश किया है। आप लोगों ने चारा घोटाला में मेरे पिता को फंसाया है ,जगन्नाथ मिश्र को बचाया है ।मैं भला आपको टिकट कैसे दे सकता हूं ।मैं क्या करता मैं फिर चला गया चिराग पासवान के पास। मैंने कहा- भाई तुम्हें तो मेरे भतीजे के समान हो । कंगना राणावत का पत्र लेकर आया हूँ।तुम्हें मुझे कोई टिकट दे दो। मैं वहां से चुनाव लड़ूं तो मालूम है चिराग पासवान ने मुझसे क्या कहा – भाई आप दलित तो है नहीं और नहीं आप दलितों की राजनीति करते हैं। आप लोगों के कारण ही देश का यह हाल हुआ है ।मैं भला आपको टिकट कैसे दे सकता हूँ। आखिर में क्या करता? मैं प्रशांत किशोर के पास गया. मैंने कहा- भाई जन स्वराज में मुझे शामिल कर लो. मुझे अपनी पार्टी से ही टिकट दे दो तो मालूम है प्रशांत किशोर ने मुझे क्या कहा -उन्होंने कहा कि आप तो नीतीश कुमार के आदमी थे । उससे पहले आप लाल यादव के आदमी थे तो भला बताइए आपको मैं टिकट कैसे दूं। मेरे पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं था तो मैंने सोचा क्यों न मैं निर्दलीय चुनाव लड़ूं हालांकि मैं जानता हूँ अपने देश में निर्दलीय चुनाव का इतिहास ।हार निश्चित है।मुझे मालूम है संविधान निर्माता बाबा अंबेडकर भी चुनाव हार गए थे। मुझे मालूम है कि समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र चुनाव हार गए थे। मुझे यह भी पता है के कलम के जादूगर रामबृक्ष बेनीपुरी भी एक बार चुनाव मैदान में उतरे तो वह हार गए थे। मुझे पता है हिंदी के प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह भी चुनाव हार गए थे और तो और रेणु जी भी चुनाव हार गए थे ।मेधा पाटकर शर्मिला इरोम् शिव खेड़ा भी चुनाव हार गए जिनके इतने फॉलोवर थे। जब भी इतने सारे दिग्गज लोग चुनाव हार गए थे तो भला मैं चुनाव कैसे जीत सकता हूं। आज कोई चाणक्य को क्यों वोट देगा ।वोट देने की तो बात ही छोड़िए मेरा तो नामांकन भी दर्ज नहीं हो पाया। पता चला बिहार में “ सर” के कारण मेरा नाम ही मतदाता सूची से कट गया है। मैंने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा कि भाई- चाणक्य हूँ। अब मेरी भी नागरिकता तुम पूछोगे? क्या तुम मुझसे मेरा आधार कार्ड मांगोगे या मुझे मेरा पैन कार्ड मांगोगे या मेरा बर्थ सर्टिफिकेट मांगोगे। क्या मुझे यह सब सबूत के तौर पर पेश करना होगा। तब मुझे तुम बिहार का नागरिक मानोगे। क्या बिहार के लोग भूल गए हैं कि चाणक्य यही का था। क्या चुनाव आयोग को पता नहीं कि उसका ही नाम कौटिल्य है और वह यही का है? क्या उन्हें यह भी नहीं मालूम कि उसका ही नाम विष्णु गुप्त है। अगर मेरे वोटर कार्ड पर मेरा नाम विष्णु गुप्त है तो क्यों मुझे यह सबूत मांगा जा रहा है कि मैं ही चाणक्य हूं? क्यों मुझसे कहा जा रहा है कैसे मान लिया जाए कि तुम वही विष्णु गुप्त हो जिसे चाणक्य कहा जाता है। भला बताइए अब मैं इन सवालों का क्या जवाब दूं? पूरी दुनिया जानती है। इतिहास की किताबें जानती है कि मैं ही चाणक्य हूं मैं ही विष्णु गुप्त हूं मैं ही कौटिल्ट। क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने पाठ्यक्रम में मेरे बारे में नहीं पढ़ा है? क्या वह भी भूल गए हैं? आखिर आपसे मेरा अनुरोध है कि कम से कम आप चुनाव आयोग को यह जरूर बताइए कि मैं बिहार का नागरिक हूं मैं कोई बांग्लादेशी घुसपैठियों नहीं हूं। मैं कोई दुबई का नागरिक नहीं हूं और नहीं मैं पाकिस्तान से आया कोई मुस्लिम हूं। मैं विशुद्ध बिहारी हूं और मगध साम्राज्य का एक अदद नागरिक हूं ।अगर मैं नहीं होता तो आज यह साम्राज्य इतना फलता-फूलता नहीं लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज मतदाता सूची में मेरा ही नाम नहीं है ।रवीश और अंजुम भी नहीं बोले। भाई चाणक्य का नाम क्यों कट गया ?और सच्चाई तो यह भी है की कोई राजनीतिक दल मुझे टिकट देने को भी तैयार नहीं है। उन्हें लगता है कि मैंने जिस तरह चंद्रगुप्त मौर्य को सम्राट बनाया था इस तरह किसी और चंद्रगुप्त को बिहार का मुख्यमंत्री बना दूंगा जो इन राजनीतिक दलों से जुड़ा नहीं होगा शायद यही कारण है कि मैं इस चुनाव में टिकट से वंचित हो गया हूं और तो और अब तो मैं मतदाता भी नहीं रहा। यह मेरा दुर्भाग्य नहीं है। यह केवल बिहार का दुर्भाग्य नहीं है ।यह देश का दुर्भाग्य है। अगर आप समझते हो कि मैंने जो कुछ कहा है वह सच है तो आप इस पोस्ट को एक लाइक जरूर कीजिएगा और हो सके तो उसे शेयर कीजिएगा। किसी को व्हाट्सएप से यह मैसेज भेजिएगा और इंस्टाग्राम पर भीअगर आप पोस्ट करते तो अच्छी बात है। किसी यूट्यूबर को भी भेज दें शायद वह चाणक्य की पीड़ा को लोगों तक पहुंचने में सफल हो।

अरविंद कुमार
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं
Posted Date:
October 18, 2025
10:53 am
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