चोट भी सुखद रही, सारी ज़िंदगी रहा अटल जी का हाथ: कृष्ण मित्र
♦ कृष्ण मित्र (जाने माने कवि)
  
पत्रकार के रूप में मेरा कैरियर भी दैनिक प्रलयंकर से शुरू हुआ था। कहा जा सकता है कि मैं भी एक “एक्सीडेंटल जर्नलिस्ट” हूं। मैं एमए कर रहा था। क्लास साढ़े दस बजे समाप्त हो जाती थी और मैं सीधा घर। मैं घर लौट रहा होता था और दैनिक प्रलयंकर के संपादक तेलूराम कांबोज जी उसी समय अपने कार्यालय से निकलकर फील्ड में जाने के लिए निकल रहे होते थे। एक दिन सवाल दाग ही बैठे “पढ़ाई पढ़ाई भी करता है या यूं ही मटरगश्ती करता है”? मैंने बताया कि मैं एमए कर रहा हूं। मेरे जवाब से संतुष्ट होते हुए कहा कल सुबह मेरे जवाब से संतुष्ट होते हुए कहा कल सुबह यात्री जी (मेरे पिताश्री से.रा. यात्री) को बुला कर लाना। उनके आदेश से मैंने पिताश्री को अवगत करवा दिया।
                         दैनिक प्रलयंकर के संपादक तेलूराम काम्बोज और जाने माने कवि कृष्ण मित्र के साथ अटल जी
अगले दिन दोपहर में मैं पिताश्री के साथ एक मुजरिम की तरह श्री कांबोज जी की अदालत में हाजिर हुआ। कांबोज जी ने चाय मंगाई और हाथ का काम समाप्त कर बोले “इस लड़के की पढ़ने लिखने में रुचि है या नहीं”? पिताश्री ने उन्हें बताया “पढ़ने लिखने में रुचि भी है और “सारिका” में कहानी छप गई है। “मोदी कला भारती” का पुरस्कार भी मिल चुका है।” लिहाजा “दैनिक प्रलयंकर” में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मुझे मिल गई। संपादक के रूप में यहां विनय संकोची पहले से ही मौजूद थे। और संपादकीय सहयोगी थे वरिष्ठ पत्रकार शिवकुमार गोयल और वरिष्ठ कवि कृष्ण मित्र जी। “दैनिक प्रलयंकर” का साप्ताहिक संस्करण पहले से ही प्रकाशित हो रहा था। तब तक इसके प्रकाशन के 23 वर्ष पूर्ण हो चुके थे। साप्ताहिक प्रलयंकर के रजत जयंती समारोह के मुख्य अतिथि के तौर पर माननीय अटल बिहारी वाजपेई जी पधारे थे। यह आयोजन एफ ब्लॉक कवि नगर के तत्कालीन एक उत्सव भवन में हुआ था। तड़क-भड़क से दूर।
  करीब 35 बरस पूर्व हुए इस आयोजन की बाबत मुझे ज्यादा तो कुछ याद नहीं है। लेकिन अटल जी का कहा एक वाक्य याद है। श्री कांबोज जी ने मुख्य अतिथि की शान में काफी कसीदे पढ़े। श्री वाजपेई जी ने अपना संबोधन यहां से प्रारंभ किया “मैं मेहमान नहीं हूं, अतिथि हूं।” उन्होंने श्रोताओं से सवाल किया अतिथि किसे कहते हैं”? जवाब भी खुद ही दिया। “अतिथि वह होता है जो तिथि निर्धारित किए बिना ही आ जाए।” और बाद के दिनों में उनका यह कथन कई बार व्यवहारिक रूप में भी सामने आया। कई भाजपा नेताओं की पुत्रियों के विवाह में वह अतिथि के तौर पर नहीं परिवार के वरिष्ठ सदस्य के नाते ही उपस्थित हुए।
  अटल जी के निधन के बाद गाजियाबाद में सबसे पहले मैंने उस व्यक्ति की तलाश शुरू की जो वाजपेई जी के बारे में कुछ रोचक संस्मरण साझा कर सकता ऐसे में श्री कृष्ण मित्र से बेहतर कोई और हो नहीं सकता था। श्री कांबोज जी के अलावा श्री मित्र ही हैं जिन्हें अटल जी का लंबा सानिध्य प्राप्त हुआ है।
  श्री मित्रों बताते हैं कि विभाजन के बाद वह परिवार सहित पाकिस्तान से गाजियाबाद आ गए उनके बड़े भाई मनमोहन वैध जी का अटल जी से परिचय था बकौल श्री मित्र अटल जी उन दिनों वीर अर्जुन अखबार के संपादक थे। परिचय के बाद अटल जी ने पूछा ” क्या काम जानते हो?” फिर कुछ साहित्यिक सामग्री दुरुस्त करने को दी। संतुष्ट होने के साथ ही मित्र जी को वीर अर्जुन के साप्ताहिक संस्करण की सामग्री के चयन और उसके सुधार का कार्य मिल गया।मित्र जी बताते हैं कि अटल जी में पत्रकारिता की असीम संभावनाएं छिपी हुई थीं। दैनिक वीर अर्जुन के अलावा वह साप्ताहिक संस्करण के प्रति भी बेहद गंभीर थे। जगह कम होने की वजह से चित्रों के ब्लॉक कार्यालय की दुछत्ती में रख दिए गए थे। अटल जी ने साप्ताहिक को और अधिक रचनात्मक बनाने के लिए उनके साथ ब्लॉक की छंटाई का काम शुरू किया और कहीं से तलाश कर बांस की सीढी ला कर उन्हें दुछत्ती पर चढ़ा दिया। वह खुद सीढ़ी पकड़ कर खड़े हो गए।
  मित्र जी के दिखाएं दो तीन कट आउट ब्लॉक अटल जी को पसंद आ गए। जिन्हें मित्र जी ने अटल जी को पकड़ा दिया। काम निपटाकर मित्र जी यह सोचकर सीढ़ी से नीचे उतरने लगे कि अटल जी सीढ़ी ही पकडे खड़े हैं। लेकिन अटल जी ब्लॉक लेकर आगे बढ़ गए। सीढ़ी चढ़ने उतरने का कोई अभ्यास न होने के कारण मित्र जी फिसल कर सीढ़ी समेत फर्श पर आ गिरे। कंधे में चोट आ गई। कहीं से मोटर कार का इंतजाम कर अटल जी ने उन्हें अस्पताल भेजा। मित्र जी बताते हैं कि उनकी चोट तो ठीक हो गई लेकिन अटल जी हर मुलाकात में कंधे का हाल पूछते और कंधा जरूर थपथपाते। श्री मित्र जी कहते हैं यह चोट भी बड़ी सुखद रही। सारी जिंदगी उनके कंधे पर अटल जी का हाथ रहा। वीर अर्जुन की नौकरी के दौरान ही वह कविता लिखने लगे थे। एक दो कविता अटल जी ने सुनी तो कहा कि आपकी वाणी में ओज है। ओज की कविता लिखो और इसे जन जन तक पहुंचाओ। यह वह दौर था जब अटल जी के कंधे पर जनसंघ का जनाधार बढ़ाने की जिम्मेदारी थी। मित्र जी कहते हैं कि वर्षों तक उनकी कविता और अटल जी का भाषण मंच से साथ साथ चलते रहे, लेकिन एक दशक पूर्व यह सिलसिला दोनों की अवस्था की वजह से समाप्ति के कगार पर आ पहुंचा। मित्र जी का कहना है अब ना वैसा कहने वाला बचा है और न ही सुनने वाला। मित्र जी कहते हैं कि अटल जी का देहावसान कि नहीं हुआ है बल्कि कविता के एक अटल युग का अवसान हुआ है।
Posted Date:

August 18, 2018

2:36 pm

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