आंद्रे बेते नहीं रहे। हिंदी मीडिया के लिए भले ये खबर हो या ना हो या कोई छोटी मामूली सी खबर हो लेकिन एकेडमिक वर्ल्ड में आंद्रे बेते का नहीं रहना एक बहुत बड़ी खबर है और इस बात को दीपांकर गुप्ता ,वीणा दास, अभिजीत पाठक और आनंद कुमार जैसे प्रख्यात समाज शास्त्री समझ सकते हैं जो अभी सक्रिय हैं। भले ही हमारे टीवी एंकरों को न पता हो कि आंद्रे बेते , . कौन थे या यूट्यूबरो को ना पता हो आंद्रे बेते कौन थे लेकिन जो लोग देश में समाजशास्त्र की किताबें पढ़ते हैं या उनके बारे में अध्ययन करते हैं वह जरूर उनके बारे में जानते होंगे ।अब हमारे देश में वैसे भी एम एस श्रीनिवासन , ए आर देसाई, योगेंद्र सिंह और श्यामा चरण दुबे जैसे समाजशास्त्री नहीं रहे जिनको कोई याद करता हो।ऐसे में भला आंद्रे बेते को कौन याद करेगा जो कभी किसी राजनीतिक दलों की पार्टियों में नहीं जाते थे जो किसी मंत्री से मिलने में दिलचस्पी नहीं लेते थे और जो न किसी सत्ता के गलियारे में चहलकदमी किया करते थे क्योंकि उन्हें राज्यपाल बनने का अब शौक नहीं रहा था ,वैसे भी अब सरकारें किसी विद्वान को राज्यपाल नहीं बनाती। पर आंद्रे बेते अशोका यूनिवर्सिटी केकुलाधिपति रह चुके थे और नेहू के भी कुलपति रह चुके थे ।भला हो पिछली सरकारों का पर अब वर्तमान सरकार से यह उम्मीद नहीं कर सकते।
आप दस साल में बने कुलपतियों का रिकॉर्ड देखें।ऐसे आंद्रे बेते बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी एक श्रद्धांजलि में उनके इस मिजाज और स्वभाव तथा स्वाभिमान की तरफ इशारा किया है । आंद्रे बे ते इसी दिल्ली शहर में रहते थे जो सत्ता की गहमा गहमी का बड़ा केंद्र है और जहां लोग दिल्ली विश्वविद्यालय या जेएनयू के कुलपति बनने के लिए भाग दौड़ करते रहते हैं दिन रात जुगाड़ बढ़ते रहते हैं । ऐसे में आंद्रे बे ते का कद बहुत ही बड़ा था। अब ऐसे बुद्धिजीवी और विद्वान लोग कम ही बचे हैं ।आज रोमिला थापर इरफान हबीब जैसे कुछ लोग अगर बचे हैं तो वे सार्वजनिक जीवन से दूर रहकर अपना काम करते रहे हैं। उन्हें किसी चकाचौंधो या लोकप्रियता या मंच की जरूरत नहीं रही न किसी पद की ।वे अपना काम करने में यकीन रखते हैं ।आंध्र बे ते जैसे लोगों को एक जमाने में भले ही पद्मभूषण मिल गया भले ही वे लिए वह नेहरू के वंशजों के आलोचक थे ।उनका मानना था जवाहरलाल नेहरू ने अपने ज्ञान और गरिमा से लोगों को आकर्षित किया उसको उनके परिवार के लोगों ने बाद में मटियामेट में ठीक किया ।जाहिर है आंद्रे बेते जैसे आदमी कोई सनातनी कोई धार्मिक कोई फसादी व्यक्ति नहीं हो सकता है और शायद यही कारण है कि वर्तमान सरकार के किसी मंत्री प्रधानमंत्री राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति ने उनके लिए कोई शोक संदेश जारी नहीं किया जबकि आए दिन सरकार से जुड़े लोग ट्वीट करके अपना शोक संदेश जारी करते हैं ।यह देश का ही दुर्भाग्य कहा जाएगा कि आंध्र बे ते जैसा व्यक्ति मरता है तो किसी चैनल पर खबर नहीं आती है ।
अंग्रेजी के कुछ अखबार जरूर है जो वह ऐसे लोगों की खोज खबर रखते हैं और पीटीआई जैसी न्यूज़ एजेंसी कई बार ऐसे लोगों की खबर दे देती है जिससे मीडिया के एक हिस्से में यह खबर थोड़ी बहुत छप जाती है ।कुछ साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रख्यात मार्क्सवादी चिंतक विद्वान शिक्षक रणधीर सिंह नहीं रहे तब भी मीडिया ने कोई खोज खबर नहीं ली थी। यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि मीडिया का तंत्र बाजार के तंत्र से हावी हो गया है और अनपढ़ता उसका स्वभाव हो गया है ।वह जिज्ञासु भी नहीं रहा और न चाहता है कि देश की जनता कुछ नई चीज जाने बल्कि वह दिन रात सांप्रदायिक उबाल नकली देशप्रेम बाजारू, हिंसा तथा बलात्कार की सनसनीखेज खबरों में दिलचस्पी लेता रहा है। आंद्रे बे ते 91 वर्ष की उम्र में इस दुनिया से विदा हुए और वह दिल्ली विश्वविद्यालय के डी स्कूल से रिटायर होने के बाद वहां एमेरिटस प्रोफेसर थे।
उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शैक्षिक संस्थानों लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी शिकागो यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में पढ़ाया था और लेक्चर दिया था। वह भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान संस्थान के अध्यक्ष भी रह चुके थे ।इस नाते देखा जाए तो उनका कद काफी बड़ा था लेकिन जब इस देश में अमर्त्य सेन जैसे लोगों को सत्ता अपमानित करती है तो ऐसे में भला आंद्रे बे ते को कौन पूछेगा यह तो अच्छा हुआ कि वह चुपचाप चले गए।
देश में जब भी जाति सत्ता की संरचना के अध्ययन की बात होगी उन्हें पढ़ा जाएगा भले ही जाति की राजनीति करनेवाले लोग उन्हें न जानते हों।यह सच है कि हमारे बुद्धिजीवी जनता से नहीं जुड़ते और इसलिए बड़ा समाज उन्हें नहीं जानता और वे हिंदी में नहीं लिखते लेकिन अंग्रेजी के अखबारों में आंद्रे बे ते लिखते थे।
अरविंद कुमार की रिपोर्ट
Posted Date:February 6, 2026
5:56 pm Tags: Arvind Kumar, vimal kumar, आंद्रे बेते