सेकंड क्लास में पढ़ रही मेरी पोती ने आज अचानक पूछा -बाबा, कर कमल क्या होता है? मैंने उसे बताया कि हाथों को कर कमल कहते हैं। पोती हंसी- हाथों को कर कमल कहते हैं? इसमें कमल कहां से आ गया? मैंने उसे समझाने की कोशिश की- कर का मतलब हाथ होता है लेकिन अच्छी भाषा में इसमें कमल भी जोड़ देते हैं। यानी कमल की तरह हाथ।
पोती को फिर हंसी आ गई-किसी के हाथ कमल की तरह कैसे हो सकते हैं? यह तो हंसने वाली बात हुई। कितनी सुंदर गुलाबी पंखुड़ियों वाला कमल का फूल और कैसे हमारे हाथ? मैंने कहा- सुंदरता और रंग पर मत ध्यान दो। कमल की पंखुड़ियां कोमल होती हैं इसलिए कोमल हाथों को कर कमल कह देते हैं। पोती ने अपने नन्हे नरम गुलाबी हाथ देखे और मुस्करा दी। उसने ऐसे सिर हिलाया जैसे अब पूरी तरह समझ गई हो।
अकसर पोती अजब सवाल पूछकर मेरे आधे-अधूरे ज्ञान की परीक्षा लेती रहती है। दो साल पहले वह एक दिन पूछ बैठी- बाबा, संविधान क्या होता है? मैं मुश्किल में पड़ गया। पोती को कैसे बताऊं कि अब तक तो मैं ही यह पूरी तरह नहीं जान पाया। फिर भी मैंने उसे समझाया कि संविधान लाल डायरी जैसी एक किताब होती है जिसे नेता लोग अपनी जेब में रखते हैं। जब चाहते हैं माथे से लगा लेते हैं और जब जरूरत होती है हाथ में लेकर लहराने लगते हैं। पोती बोली थी- मैं कुछ समझी ही नहीं आपकी बात। मैंने कहा कि अभी तुम संविधान को लाल डायरी ही समझो, जब तुम बड़ी हो जाओगी तब इसे ठीक से समझना।
हाथों को कर कमल बताने का श्रेय वेद पुराणों के रचयिताओं को जाता है। उन्हें देवताओं के हाथ कमल जैसे लगते थे। फूल तो उस समय भी नाना प्रकार के रहे होंगे। सुंदरता और कोमलता में तो गुलाब भी कमतर नहीं है। वे कर गुलाब या कर गुड़हल भी तो लिख सकते थे लेकिन उन्हें हाथों की उपमा के लिए कमल ही जंचा। कमल ने उन्हें इतना मोहित किया कि देवताओं के तमाम अंगों को कमल की उपमा ही दे डाली। कमल नयन, मुखारविंद, राजीव लोचन। उन्हें तो देवी-देवताओं के पैर भी साधारण नहीं लगे। उन्हें भी चरण कमल बना दिया।
कर कमल से लेकर चरण कमल तक की उन्नत परंपरा को हिंदी के कवि-लेखक मानव के स्तर तक खींच ले आए। कहीं कोई तनिक भी महान समझ में आया उसी के हाथ-पैर उन्हें कमल जैसे दिखने लगे। अब तो इसका प्रचार-प्रसार इतना हो गया कि संसद के गलियारे से लेकर गली तक और शहर से लेकर गांव तक जो भी महान टाइप है उसके हाथ कर कमल और पैर चरण कमल हो गए हैं। ऐसे महानुभावों के चरण कमल अवसर पाकर हर कहीं पहुंच जाते हैं और उनके कर कमल उन लोगों को कृतार्थ करते रहते हैं जो अब तक हाथ-पैर वाले हैं।
शिलान्यास, उद्घाटन, लोकार्पण या विमोचन कर कमलों से ही संभव है। ये काम साधारण हाथों से नहीं हो सकते। ऐसे मौकों पर कर कमल वाली हस्तियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं। उस समय जो शिलापट या पत्थर स्थापित किए जाते हैं उनमें बाकायदा दर्ज होता है कि यह उपलब्धि किसके कर कमलों की है ताकि भावी पीढ़ियां उनके कर कमलों के योगदान को याद करती रहें। किसी पुल, सड़क या स्कूल की इमारत उद्घाटन के बाद भले ही दूसरे दिन बैठ जाए लेकिन कर कमलों की गवाही वाले पत्थर लंबे वक्त तक अडिग रहते हैं। जैसे मुंह चिढ़ा रहे हों, देखो मेरा तो कुछ भी नहीं बिगड़ा।
हर हाथ को कर कमल बनने का सौभाग्य नहीं मिलता। नेताओं और जनप्रतिनिधियों के हाथ तो घोषित तौर पर कर कमल होते हैं। उनके तो चरण भी जहां पड़ जाएं, कमल हो जाते हैं। हजारों कार्यकर्ता, उपकार्यकर्ता, चमचे और भक्त जय-जय करते हुए उनके चरण कमलों के स्पर्श को सदैव आतुर रहते हैं। ठेकेदार, अफसर, नौकरशाह, बाबू लोगों के कर कमल तो नहीं हो पाते लेकिन वे अपने हाथों की करामात से जेबों को ही कमल सरोवर बना लेते हैं। गरीब, किसान, मजदूर और मेहनतकश के हाथों को तो कोई हाथ भी नहीं समझता।
बहुतेरी कोशिश के बावजूद मैं अपने हाथों को कर कमल नहीं बना पाया। कई बार कमलाने की तिकड़म भिड़ाई लेकिन नाकामी ही हाथ लगी। किसी ने फीता कटवाना तो दूर मंच पर बिठाने लायक भी नहीं समझा।
देश की सियासत भी कर कमल से मुक्त नहीं है। वहां भी इसका खेल लंबे समय से चल रहा है। पहले कर (हाथ) की तूती बोलती थी, अब कमल का दबदबा है। हाथ को कर कमल की उपमा देने वालों ने सोचा भी नहीं होगा कि कभी कर और कमल ही आमने-सामने खड़े हो जाएंगे और बयानों में रोज एकदूसरे की ऐसीतैसी करेंगे।
कमल आकर्षक है। सबको अपनी ओर खींचता है। तमाम पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी कमल के मोहपाश में हैं। उनका तो तन-मन सब कमल हो गया है। वे भौंरों की तरह मचल-मचलकर कमल की प्रशंसा में गुंजन करते नहीं थकते। यह उसके आकर्षण का जादू ही है कि ‘आप’ के कई बड़े साथी कमल से आ लिपटे हैं। वे किनारे खड़े साथियों को भी कमल सरोवर में गोते लगाने के लिए पुकार रहे हैं। ऐसे में ‘आप’ का बचकर रह पाना भी मुश्किल है।
अनिल त्रिवेदी
वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार
Posted Date:May 3, 2026
12:08 pm