(अरविंद कुमार की रिपोर्ट)
इस बुरे और हताशा से भरे समय में रजा फाउंडेशन ने विश्व कविता समारोह का आयोजन कर अंधेरे में एक रौशनी फैलाने का काम किया।भले ही यह रोशनी थोड़ी हो टिमटिमाती हो पर उसने जीने की उम्मीद और उल्लास को जगाया दुख और पीड़ा का बयान करते हुए प्रेम की खोज की।आलिंगन और चुम्बन में जीवन के रंग को शब्दों में चित्रित किया युद्ध और विध्वंस के मलबे में फूल खिलाने की कोशिश की।
यह तीन दिवसीय आयोजन ऐसे वक्त में समाप्त हुआ जब अमरीका और इजरायल ने युद्ध विराम का उल्लंघन करते हुए ईरान के लीडर खमनाई को मौत के घाट उतार दिया और तीसरे विश्वयुद्ध के बादल मंडराने लगे।
समारोह में आमंत्रित 13 कवियों में से 5 किन्हीं अपरिहार्य कारणों से नहीं आये पर समारोह में जब 8 कवि मंच पर मौजूद थे तो उनमें आधी कवयित्रियाँ ही थीं।
पहले दिन की शाम का मुख्य आकर्षण तीन कवयित्रियों की कविताएं थीं।इनमें
लिथुआनिया की कवयित्री इंद्रे वैलेन्टिनैटे (जो कविताएँ लिखने के अलावा एक गायिकाभी हैं,) युवा कवयित्री औसरा काज़िलिउनाइटे भी लिथुआनिया से थीं। तीसरी यूक्रेनी कवयित्री कतेरीना ओलेक्सांद्रिव्ना कलित्को थीं।
तेजी ग्रोवर और पूनम अरोड़ा ने उनकी कविताओं के सुंदर अनुवाद पेश किए तो सुनीत टण्डन ने अंग्रेजी में उनक़ा सुंदर पाठ किया।
जब मंच पर कविता पाठ शुरू हुआ तो इंद्रे ने अपनी प्रेम कविताओं की सेंसुअलिटी से हमें चमत्कृत कर दिया।हिंदी में किसी कवयित्री के पास इतने सुंदर भाव और कल्पनाएं नहीं है ।इन कविताओं में अपनी भावनाओं की ईमानदारी थी जबकि हिंदी में लोग जड़ाऊ कविता अधिक लिखते हैं और वे स्किल से अधिक लिखते हैं।
इंद्रे की कविता में एक खुलापन और निश्छलता थी ।हिंदी की ज्याद तर कवयित्रियाँ बनावटी प्रेम की कविताएं लिखती हैं।
यूक्रेन से आई कवयित्री कतेरीना की रचनाओं में युद्ध की छाया साफ दिखाई देती थी पर उसमें जीवन की पुकार भी थी।निःसहाय जीवन में प्रेम के खिले हुए हरे पत्ते थे।
अशोक वाजपेयी ने कहा कि दुनिया में अच्छी कविता बड़े देशों के कवि नहीं बल्कि इन छोटे छोटे देशों के कवि लिख रहे हैं।
उन्होंने आनंदवर्धन और दांडी को उद्धरित करते हुए कहा कि कवि सर्जक होता है और यह संसार ही एक कविता है।यह शब्दों से उत्पन्न रो शनी है।
उन्होंने दुनिया के शासकों व्यायवसायियों धर्म के ठेकेदारों की आलोचना करते हुए कहा कि कविता प्रतिरोध की आवाज है असहमति का विवेक है जो झूठ न बोलना सिखाती है।जो पवित्र प्रार्थना है शोर में शांति है जो विध्वंस में सृजन की तरह है।उन्होंने यह भी कहा कि मंच पर बैठे ये कविगण मोमबत्तियों की तरह हैं।
सीरिया के अकरम अल्कातरेब सूडान के के.एल तिनै ,मिस्र के यहिहा लबाबीदी स्लोवेहिया की ग्लोरजना वेबर तथा इराक की दुनिया मिखाइल नहीं आ सकी।सपेशे से मेडिकल डॉक्टर समीरा नेग्रौचे, फ्रैंकोफोन अल्जीरियाई कवयित्री हैं। इटली के आंद्रे नैफिस-साहेली कवि, अनुवादक हैं। अर्जेंटीना के डैनियल लिपारा कवि, अनुवादक और संपादक हैं। सिनान अंतून एक इराकी कवि, उपन्यासकार, और अनुवादक हैं।
रज़ा फ़ाउंडेशन के तीन दिवसीय आयोजन में कविताओं से प्रेरित ड्रॉइंग्स की एक चुनिंदा प्रदर्शनी भी लगी थी। इनमें मनु पारेख, गोपी गजवानी, अतुल डोडिया, अमिताव दास, मोना राय, वी. रमेश, अखिलेश, जी.आर. इरन्ना, मिठू सेन, मनीषा गेरा बसवानी, मंजूनाथ कामथ, एस. हर्षवर्धन और मनीष पुष्कले की ड्राइंग्स थीं।
रज़ा फाउंडेशन ने संसार कार्यक्रम में दस देशों के तेरह कवियाँ की चुनी हुई कविताओं का एक संचयन भी निकला है जिसका दूसरे दिन विमोचन किया गया। इसमें अशोक वाजपेयी और तेजी ग्रोवर के भी अनुवाद हैं। गिरधर राठी निधीश त्यागी पूनम अरोड़ा रश्मि भारद्वाज ने दो दो कवियाँ की कविताओं के अनुवाद किये हैं।इसके अलावा अणु शक्ति सिंह और अम्बर पांडेय तथा शोभा अक्षर के भी अनुवाद हैं।
इस पुस्तक में 274 कविताओं के अनुवाद हैं। तनाव पत्रिका के अनुवादों के संचयन के बाद विश्व कविता का यह एक बड़ा संचयन हैं।
इनमें सबके अनुवाद बहुत सुंदर हैं और कविताएँ बहुत अच्छी हैं। पुस्तक में अशोक जी की एक भूमिका भी है।उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी को संसार में भाषा ने बदला है और कविता भाषा का सबसे सघन, उत्कट और सर्जनात्मक रूप है। संसार कविता में अपने को साहिर करता, अपना उत्सव मनाता, उसकी पुष्टि करता और प्रश्नांकन करता है। कविता संसार का गुणगान करती, उसे दीप्त-उद्दीप्त करती, उसे अर्थ और आभा देती, उसके अवगुण चित धरते हुए उसका प्रश्नांकन करती है। ऐसी कोई सभ्यता नहीं है जिसमें कविता और कहानी न हों। प्रायः सभी धर्म, प्राचीन परम्पराओं में ईश्वर या उसका दूत पहली बार कविता में हो बोला है। कविता संसार में ही सम्भव है, उसी में हो सकती है जैसे कि संसार भी बिना कविता के नहीं रह सकता भले इन दिनों वह ज्यादातर ऐसा नहीं मान पाता।”
वाजपेयी की इस भूमिका में गहरी चिंता अपने समय की है। वे कहते हैं- हमारा समय अँधराता समय है जिसमें बहुत सारी चकाचौंध हमारे बढ़ते अँधेरों को ढाँप या छुपा रही है। संसार बिखर सा रहा है-उसने जो मंगल, सन्तुलन और सामंजस्य, आस्था और मुक्ति, पारस्परिकता और सहचारिता, विचार और व्यवहार में, सदियों के आर-पार अर्जित की हैं वे सभी इस समय संकट में हैं या दरकिनार किये और हाशिये पर ढकेले जा रहे हैं। एक ऐसी दुनिया बन रही है जो हिंसक आक्रामक, बाधक और बन्धक, अनिश्चित और अधि न्तित है। जिस तकनालजी ने पूरे संसार को घेर लिया है और जिसमें हरेक को अभिव्यक्ति का अवसर-सा सुलभ हो गया है, उसी तकनालजी ने झूठ-नफ-रत-हिंसा को दूर-दूर तक फैला दिया है। हम एक-दूसरे के बहुत नप्तदीक आ गये हैं, लेकिन हममें अक्सर अबोला है। अन्तःकरण, साहस-जोखिम, सृजनशीलता, उम्मीद नाउम्मीदी की जुगलबन्दी, संवाद और असहमति की सम्भावना कविता में बची है-कविता ही हमारी बची-खुची पर अनश्वर
मानवीयता उसकी ऊष्मा, आभा का एक लगातार बीहड अटपटे अबूझ होते जा रहे संसार में आखिरी मकान है।”
वाजपेयी सभ्यता समीक्षा का प्रश्न उठाते हुए कहते हैं कि “विश्व सभ्यता आज जिस मुकाम पर है उसमें शक्तिशाली बाहुबली अत्याचारियों और शासकों, तानाशाहों, नृशंस अमीरों, क्रूर व्यापारिक चुरन्थरों, कारपोरेट नेताओं, प्रबल टैक्नोक्रेट का वर्चस्व है। वे भी फूहड़, अक्सर अभद्र, भावहीन गद्य में बोलते और सबको डराते रहते हैं। उनकी कभी-कभार प्रकट होती भावुकता सतही और संवेदनहीन होती है। सभ्यता के धूमिल और विपर्यस्त होने, उदारता और मानवीय सहकार के शिथिल पड़ने, अन्तःकरण सहयोग के विजड़न और करुणा-सहानुभूति-सहायता सहचारिता के कमजोर पड़ने की दारुण कथा और व्यथा, इस समय, संसार की अनेक भाषाओं में, कविता व्यक्त कर रही है। कविता में, ऐसे भयानक समय में, मनुष्य होने और बने रहने की सचाई, उम्मीद और सम्भावना विन्यस्त हो पा रही है। इसी ने हमारे समय में कविता की एक विश्व बिरादरी अनायास गठित कर दी है और २०२६ में हो रहा ‘संसार एक अन्तरराष्ट्रीय कविता समारोह’ उसका साक्ष्य है।
उन्होंने आगे यह भी लिखा कि आज सच्ची, ईमानदार और साहसी कविता, संसार में कहीं भी, जो हो रहा है उसे दर्ज कर रही है- जो नहीं हो पा रहा है उसे हिसाब में ले रही है: वह गवाह है और हिस्सेदार भी। वह अवरुद्ध प्रश्न उठा रही है, वह अँधेरों-उजालों की शिनाख्त कर रही है, वह नाउम्मीदी की कारा में उजाले की एक दरार देख पा रही है। वह बार-बार हमें जता रही है कि जब असम्भव लगता है तब भी मनुष्य होना और बने रहना सम्भव है। कविता आज बहुत सारे जलावतन हुए लोगों और कवियों की मातृभूमि है- वह बेघरबार हुओं का आखिरी घर है। वह एक साथ सचाई का अरण्य है और शरण्य भी।
“कविता की संसार में आज कई आवाजें हैं वह प्रार्थना है, विलाप है, चीख है, पुकार है वह निर्भीकता से बोल रही है वह मनुहार है और ललकार भी। वह रोजमर्रा की ज़िन्दगी में वाबस्ता है और उसी में कॉस्मिक प्रतिध्वनियाँ सुन पा रही है। वह संसार के बुनियादी रहस्य और विस्मय का पुनर्वास करने में लगी है। हमसे जो छूटता जाता है, कविता उसकी क्षतिपूर्ति है। याद पर रोजीना हमलों के बरअक्स कविता याद को बचाये रखती और याद दिलातीहै; उसमें चेतावनियाँ हैं, उसमें पूर्वाभास हैं और उसमें सपने देखने और दूसरों के साथ होने की क्षमता बची हुई है।”
तेरह समकालीन भारतीय चित्रकारों के रेखांकनों की प्रतिकृतियाँ भी इस पुस्तक में शामिल की गयी हैं। यह सब सामग्री इस प्रकाशन को हिन्दी में अद्वितीय बनाता है। हिंदी कवि रश्मि भारद्वाज द्वारा अनुदित कविताएँ हम दे रहे हैं।
ग्रेगोर पॉडलॉगर, जिनका जन्म १९७४ में लुबियाना में हुआ था, नेलबिय यूनिवर्सिटी से फिलॉसफ़ी में बी.ए. किया। स्लोवेनिया और कई विद साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हई हैं। उनके पिछले कविता संग्रह- ‘हैप्पी न्यू इयर्स’, (२०१०), ‘वर्ल्ड एण्ड वर्ल्ड’ (२०१६) लिए नामजद किया गया था और जिसका क्रोएशियाई में अनुवाद किया गया को स्लोवेनिया में साल के सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह के लिए वेरोनिका पुरस्कार ‘एटलस’ (२०२२), संग्रह को वेरोनिका पुरस्कार और जेनको पुरस्कार (पि दो सालों में स्लोवेनियाई में लिखे गये सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह के लिए) के लि भी नामजद किया गया था। उनकी कविताओं का १२ भाषाओं में अनुवाद कि गया है, जिसमें मराठी भी शामिल है। वह एक अनुवादक भी हैं, जिन्होंने २०० में आर. के. नारायण के उपन्यास ‘द गाइड’ का अनुवाद किया था। वह स्त PEN सेण्टर और स्लोवेन राइटर्स एसोसिएशन के सदस्य हैं। वह २०१५२ २०२१ तक वियना में रहे और वर्तमान में लूबियाना में रहते हैं। इनकी कविताओं के कुछ नमूने देखिए –
एक वाक्य
एक मनुष्य की तरह नहीं,
बल्कि प्राणियों के बीच एक प्राणी की तरह,
बिना मृत्यु के एक क्षण की तरह,
ब्रह्माण्ड में एक आधात की तरह,
ब्रह्माण्ड के साथ गुनगुनाते हुए सब कुछ में सब कुछ के साथ
*
आरम्भ
.….सिर्फ रोशनी।
इसके साथ जो आती हैं वो हैं
चीजें।
जो मायने रखता है वह है छाप शब्द से पहले।
कुछ ऐसा जिसका कोई अर्थ नहीं,
मेरे नाम :
पुराने मिट्टी के चूल्हे के मुहाने पर छोटे दरवाजे।
**
3
कितना चमकदार
कितनी सांसें
कैसा होता है चलना और सांस लेना
और तारे निहारना
कैसा है जुड़ना
और दूरियों को पाटना।
किस तरह क्षण की अनन्तता गिर रही है, नीचे गिर रही है।
कथा में। कथा से निकल कर इतिहास में।
और वहाँ होना, कैसे के रूप में। हमारे रूप में।
कैसे हम हैं।
कैसे हम और चीजें हैं।
कैसा है मरना।
कैसा है सब कुछ होना और मरना।
कैसे चीजें।
मृत्यु चीजों की तरह।
चीजें मृत्यु की तरह।
जिन्हें हम याद करते हैं।
जिन्हें हम याद नहीं करते।
कैसा है कभी नहीं सोना।
कैसा है तेज भागना और नहीं सोना।
कैसा है साँसें लेना।
कैसे हमारा होना ताकि वह साँसें ले सके।
कैसे वास्तविक होना।
कैसे कृत्रिम होना।
कैसे सब कुछ एक साथ वास्तविक और कृत्रिम होना।
सब एक साथ।
कैसे है एक जीवित प्राणी।
कैसे हर जीवित प्राणी अपना संसार है।
एक में एक संसार, जो एक नहीं है।
कैसे घूमता हुआ।
कितना ऊँचा।
कितना मजबूत और
एक क्षण के लिए। यदि कभी। यदि ऐसा हो, कि हम हों और यह भी हो।
किस तरह संसार बदल रहा है, किस तरह संसार हमेशा एक जैसा है।
कितना चमकदार। सब कुछ चमक रहा है। सब शान्त है। सहसा, एक साथ, सब कुछ शान्त।
Posted Date:
March 2, 2026
5:23 pm