‘बाहर से भीतर की यात्रा है रंगकर्म’

सात्विक अभिनय की बात कही है भरत मुनि ने – देवेन्द्र राज अंकुर


राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक और “कहानी के रंगमंच” के प्रणेता देवेंद्र राज अंकुर ने कहा है कि भरत मुनि के” नाट्यशास्त्र” पर जब भी चर्चा हुई है उसमें वर्णित अभिनय पक्ष पर चर्चा बहुत कम हुई है जबकि भरत मुनि के उस ग्रन्थ में सर्वाधिक जिक्र अभिनय का ही किया गया है। भारंगम के श्रुति कार्यक्रम में देवेन्द्र राज अंकुर ने ये बात कही। उनकी लिखी पुस्तक ‘भरत मुनि की अभिनय परिकल्पना’ पुस्तक का विमोचन भारंगम के श्रुति कार्यक्रम में हुआ।
गौरतललब है कि देवेन्द्र राज अंकुर ने यह पुस्तक संस्कृति मंत्रालय के” टैगोर फेलोशिप” के तहत लिखी है जिसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने छापा है। अंकुर ने कहा कि भरत मुनि ने अपने ग्रन्थ में कुल 36 अध्याय लिखें हैं जिनमे बेजेंक तो अभिनय पक्ष पर लिखा है लेकिन इस पक्ष पर कम ही चर्चा हुई है। उन्होंने बताया कि भरत मुनि ने चार तरह के अभिनय की बात कही है – आंगिक, वाचक, आहारिक और सात्विक। उनकी दृष्टि में अभिनय तब पूर्ण होता है जब वह सात्विक अवस्था में पहुँचता है। दरअसल कलाकार बाहर से भीतर की यात्रा करता है और उसके अभिनय का चरम और उत्कर्ष सात्विक भाव में है।

उन्होंने कहा कि भरत मुनि ने जिस लोकधर्म की बात कही है वाह लोक folk नहीं है बल्कि व्यवहार की बात है। इस तरह भरत मुनि ने सैद्धांतिक रंगकर्म की बजाय व्यवहारिक रंगकर्म की बात की है। यानि भरत मुनि ने 2500 साल जो बातें कहीं उसे स्टालिनेवस्की, ब्रेख्त और ग्रोटोवस्की ने बाद में कही। भरत मुनि के इस ग्रन्थ की अपनी प्रसंगिकता है।

उन्होंने कहा कि 2009 में रामगोपाल बजाज ने पुस्तक प्रकाशन की योजना शुरू की और यह मेरी पहली किताब है जिसे एनएसडी ने प्रकशित की है। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सचिव सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यूनेस्को ने गीता के बाद भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र को मेमोरी ऑफ़ कल्चर के रूप में मान्यता दी है। उन्होंने कहा कि उन्होंने बाबूलाल शर्मा और राधा वललभ त्रिपाठी द्वारा अनुदित भरत मुनि का नाट्य शस्त्र पढ़ा है लेकिन अंकुर जी ने बहुत ही सहज सरल अंदाज़ में लिखा है। यह किताब न केवल छात्रों बल्कि शिक्षकों और अभिनेताओं के लिए महत्वपूर्ण है। यह छात्रों के लिए आइडियल टेक्स्ट बुक है। उन्होंने कहा कि राग, भाव और ताल केवल रंगकर्मियों के लिए ही नहीं किसी भी व्यक्ति के लिए जरुरी है क्योंकि उसके बिना मनुष्य नहीं हुआ जा सकता।

प्रसिद्ध रंगकर्मी अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा कि छात्र के रूप में मैंने भरत मुनि के नाट्यशास्त्र को पढ़ा था और एक बार नहीं कई बार पढ़ने की कोशिश की पर उसकी भाषा ऐसी थी कि समझ में नहीं आया और मैंने पढ़ना छोड़ दिया. लेकिन अंकुर जी कि किताब आसान भाषा में लिखी गयी है जिसे कोई भी समझ सकता है।

पुस्तक विमोचन से पूर्व राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी ने कहा कि अंकुर जी का मैं छात्र हुआ करता था और मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा भी है। उन्होंने बड़ी मेहनत से यह किताब लिखी है जो वैसे महत्वपूर्ण तो है ही छात्रों के लिए भी उपयोगी है.

— दिल्ली से अरविन्द कुमार की रिपोर्ट

Posted Date:

February 17, 2026

11:39 pm

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