नाटक करने करने वालों के भीतर भी नाटक होता रहता है

प्रसिद्ध रंग समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने कहा है कि हमेशा से रंगमंच का संकट मौजूद रहा है, यहां तक कि भरत मुनि के काल में भी और नाटक करने वालों के भीतर भी एक नाटक होता रहता है। उनका कहना है कि यह सच है कि एनएसडी से इब्राहिम अल्का जी के ज़माने में एक से एक दिग्गज कलाकार सामने आए पर हिंदी रंगमंच का कभी कोई स्वर्णकाल नहीं रहा और स्वर्ण काल की अवधारणा भी एक तरह का भ्रम है
लेकिन उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि आधुनिक हिंदी रंगमंच को विकसित करने में अल्काजी, हबीब तनवीर ,बादल सरकार और भानु भारती जैसे लोगों का बड़ा योगदान है। उन्होंने अपनी किताब के मुख्य पृष्ठ पर इन हस्तियों की तस्वीरें डाली हैं। त्रिपाठी ने कल भारतीय रंग महोत्सव के श्रुति कार्यक्रम में अपनी पुस्तक” रंगमंच : शख्सियतें मुद्दे और प्रस्तुतियां” के विमोचन समारोह में यह बात कही ।
समारोह में “रंग प्रसंग“ के पूर्व संपादक प्रयाग शुक्ल, एनएसडी के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित रंगकर्मी भारती शर्मा और कैम्पस थिएटर के सूत्रधार कुलजीत सिंह ने इस पुस्तक का विमोचन किया। प्रकाशन संस्थान द्वारा प्रकाशित 184 पेज की पुस्तक में त्रिपाठी ने रंगमंच पर समय समय पर लिखे गए आलेखों को शामिल किया है और मुद्दों को उठाया है।
रवीन्द्र त्रिपाठी का कहना है कि रंगमंच का संकट तो हमेशा बना रहता है पर रंगकर्मी इसे सुलझाते भी हैं फिर नयी चुनैतियाँ सामने आ जाती हैं लेकिन रंगकर्मियों के लिए आज बड़ी समस्या यह है कि सभागार बहुत महंगे हो गए हैं, रिहर्सल के लिए जगह नहीं है। ऐसे में कलाकार कब तक मुफ्त में काम करें।


उन्होंने कहा कि इसके बावजूद देश भर में नाटक हो रहे हैं। नाटकों का विस्तार हो रहा है। अब खुद भारंगम देश के 41 शहरों में हो रहा है।मैथिली, भोजपुरी और अब मगही में भी नाटक हो रहे हैं। प्रकाश झा ने मैथिली रंगमंच को विकसित किया है। समारोह के आरम्भ में चितरंजन त्रिपाठी ने कहा कि जब वे एनएसडी के छात्र थे तब से वे रवींद्र त्रिपाठी को जानते हैं और उनकी लिखी रंग समीक्षाएं पढ़ते और सीखते रहे हैं।रवींद्र जी ने हमेशा हम लोगों को प्रोत्साहित किया है प्रेरणा दी है। उन्होंने रंगमंच के मुद्दों को हमेशा ईमानदारी से उठाया है।
भारती शर्मा ने कहा कि कहा कि रवींद्र त्रिपाठी जी ने मेरे सभी नाटकों को देखा है और उनपर लिखा है और जब मैं एनएसडी से जुड़ी तब से उन्हें जानती हूँ और पढ़ती रही हूं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि वे बाद की पीढ़ी के रंगकर्मियों पर फोकस करेंगे।

कुलजीत सिंह ने रवीन्द्र त्रिपाठी से अपने पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा कि अब देश में रंग समीक्षक कम हैं जबकि उनकी आवश्यकता है। मीडिया में स्पेस कम हो गया है। उन्होंने इस बात की शिकायत की कि रवींद्र जी ने कैम्पस थिएटर पर किताब में कुछ नहीं लिखा। उन्होंने बताया कि वे कैसे बीस सालों से कैम्पस थिएटर कर रहे हैं और फेस्टिवल कर रहे हैं। उन्होंने यह सवाल उठाया कि इस किताब के कवर पर 5 रंगकर्मियों की ही फोटो क्यों है।

प्रयाग शुक्ल ने कहा कि वे जब 27 साल के थे तो उन्होंने अल्काजी का इंटरव्यू किया था। उन्होंने कहा कि उन्होंने आधुनिक रंगमंच के इतिहास को बनते देखा है। अल्का जी,  हबीब तनवीर, ब व कारन्त, रतन थियम, रामगोपाल बजाज, पंचानन पाठक, तापस सेन सबको काम करते देखा, इन शख्सियतों से बातचीत होती रही। इस तरह रंगमंच का इतिहास और दस्तावेज बना। रविंद्र त्रिपाठी जैसे लोग कम हैं जो थिएटर, चित्रकला, फ़िल्म और साहित्य सब पर लिखते रहे हैं।
उन्होंने एनएसडी में रंगकर्म के अपने संपादन के अनुभव सुनाते हुए कहा कि एनएसडी का प्रकाशन शंभु मित्र की पुत्री सांवली मित्र की पुस्तक के अनुवाद से शुरू हुआ और तब से कई महत्वपूर्ण किताबों का प्रकाशन हुआ।

— दिल्ली से अरविन्द कुमार की रिपोर्ट

Posted Date:

February 13, 2026

4:44 pm

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