राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका “रंग प्रसंग” के 59वें अंक के लोकार्पण के दौरान वक्ताओं ने सांस्कृतिक पत्रकारिता के तमाम पहलुओं पर चर्चा की और आज के दौर में इसे हाशिए पर पहुंच जाने के संकट पर भी बात की। भारंगम के ’श्रुति ‘ कार्यक्रम में “रंग प्रसंग” के पूर्व संपादक और प्रसिद्ध कवि तथा कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल, एनएसडी के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी, पत्रिका की अतिथि संपादक शशि प्रभा तिवारी और युवा कवि एवं एनसीईआरटी में रंगकर्म पाठ्यक्रम से जुड़े अरूणा सौरभ ने इस पत्रिका का लोकार्पण किया ।
इस मौके पर पत्रिका के बहाने “ रंगमंच विधा” पर खास चर्चा हुई।
प्रयाग शुक्ल ने एनएसडी में बिताए गए अपने समय को याद करते हुए कहा कि “रंग प्रसंग” पत्रिका के कारण ही वे अपने देश को अच्छी तरह जान पाए क्योंकि इस पत्रिका का 12 वर्षों तक संपादन करने के दौरान उन्होंने देश के कोने-कोने में यात्रा की और इस दौरान उनकी मुलाकात देश के नामी गिरामी रंग कर्मियों से हुई और इस तरह उन्होंने अपने देश की सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध भारतीय रंगमंच को जाना।
उन्होंने केवलम पणिक्कर, श्रीराम लागू, कन्हाई लाल ,रतन थियम, राज बिसारिया जैसी हस्तियों से मुलाकात की और रंगमंच पर विस्तृत बात की। उन्होंने कहा कि वे चन्द्रशेखर कम्बार और रामगोपाल बजाज के आभारी हैं जिनके करण ही यह सब सम्भव हो पाया और उन्होंने काम करने की पूरी आजादी दी।
उन्होंने कहा कि ये 12 वर्ष उनके जीवन के सर्वाधिक स्वर्णिम दिन रहे और उपलब्धियां तथा स्मृति भरे दिन रहे हैं। आज भी उन दिनों की बहुत याद आती है। उन्होंने इस पत्रिका के प्रकाशन से जुड़े रंगकर्मी प्रकाश झा के सहयोग की भी बहुत तारीफ की।
श्रीमती तिवारी ने अपने फ्रीलांस पत्रकारिता के दिनों को याद करते हुए कहा कि किस तरह प्रयाग जी ने उन्हें प्रोत्साहित किया और वे सांस्कृतिक पत्रकारिता में मील के पत्थर बने। उन्होंने बताया कि जनसत्ता में लिखने के दौरान बिरजू महाराज के पैतृक गांव गईं और कथक तालाब देखा और उस चौक को देखा जहां उनकी (बिरजू महाराज) दादी सती हुई थीं। उन्होंने बताया कि पंडित जसराज ,भजन सोपोरी जैसे लोगों के साथ यात्राओं से भी बहुत सीखा।
उन्होंने रंग प्रसंग के इस अंक के संपादन का जिक्र करते हुए कहा कि सभी लेखकों और कलाकारों ने उनकी बहुत मदद की। उन्होंने कहा कि यह दुनिया एक रंगमंच है और हम सब अपना अपना अभिनय कर चले जाते हैं। इस तरह हम सब रंगकर्मी हैं और रंगमचं से जुड़े हैं। उन्होंने अपनी परम्परा से जुड़ने की वकालत की और कहा कि उसे जाने बगैर हम वर्तमान को भी समझ नहीं सकते।
अरुणाभ सौरभ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की इन दिनों रंगमंच पर लिखनेवाले बहुत कम लोग हैं और पत्रकारिता में संस्कृति के लिए जगह नहीं है पर प्रयाग जी ने अपना पूरा जीवन इसमें लगा दिया।
उन्होंने बताया कि यह अंक केवल पाठकों के लिए ही नहीं बल्कि रंगकर्मियों, शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें रंगमंच के साथ साथ उसके संगीत और नृत्य पक्ष पर भी गंभीर सामग्री है।
उन्होंने कहा कि संगीत रंगमंच की आत्मा है और वह नेपथ्य में रहता है। दरअसल रंगमंच एक सम्पूर्ण विधा है। और इस पत्रिका ने अच्छा दस्तावेजी करण किया है।
— दिल्ली से अरविंद कुमार की रिपोर्ट
Posted Date:
February 15, 2026
4:19 pm