
नयी दिल्ली। हिंदी नवजारण के अग्रदूत आचार्य शिवपूजन सहाय के उपन्यास “देहाती दुनिया” के प्रकाशन के सौ साल पर आयोजित गोष्ठी में आलोचकों और वक्ताओं ने कहा कि यह उपन्यास बिहार में औपनिवेशिक ग़रीबी जमींदारी उत्पीड़न और पुलिसिया दमन का दस्तावेज है जिसके सहारे वहाँ के समाजशास्त्रीय इतिहास को जाना जा सकता है।
दिल्ली विश्विद्यालय के हिन्दू कालेज में आज शाम आयोजित इस संगोष्ठी में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवयित्री अनामिका रामेश्वर राय रवींद्र त्रिपाठी ज्योतिष जोशी और शिवपूजन सहाय के दौहित्र ने अपने विचार व्यक्त किये। समारोह के प्रारम्भ में देशबंधु के वरिष्ठ पत्रकार अतुल सिन्हा की शिववपूजन सहाय पर बनी फिल्म भी दिखाई गई औऱ देहाती दुनिया पर एक ब्रोशर का विमोचन भी किया गया।
स्त्री दर्पण और हिन्दू कालेज के हिंदी विभाग के सहयोग से आयोजित इस गोष्ठी के प्रारभ्भ में वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर रामेश्वर राय ने बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में भारत की चर्चा करते हुए कहा कि एक भारत नेहरू का था जिसे उन्होंने खोजा था डिस्कवरी ऑफ इंडिया में। एक भारत गांधी का था जिसे उन्होंने आजादी के संघर्ष में देखा था, जबकि प्रेमचन्द और शिवपूजन सहाय का भारत उनके उपन्यासों में चित्रित गांवों में था। इन सबके भारत को मिलाकर ही उस दौर के समाज को जाना जा सकता है।
उन्होंने कहा कि मैथिली शरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद और दिनकर ने अपनी कविताओं में जिस भारत का चित्रण किया है उससे अलग प्रेमचन्द और शिवपूजन सहाय ने किया। देहाती दुनिया मे कुछ भी नेपथ्य में नहीं है सबकुछ प्रत्यक्ष है। उपन्यास में कुछ अनकहा भी रह जाता है पर यह उपन्यास के उस ढांचे में नहीं है।
प्रसिद्ध आलोचक रवींद्र त्रिपाठी ने कहा कि यह उपन्यास औपनिवेशिक गरीबी, जाति व्यवस्था, जमींदारी उत्पीड़न, पुलिसिया दमन का चित्रण करता है जबकि रेणु का” मैला आँचल” जो करींब तीस साल बाद लिखा गया वह आज़ाद भारत के गाँव की राजनीति और समाज का चित्रण करता है। उन्होंने कहा कि यह गरीबी औपनिवेशिक शोषण से उत्पन्न हुई थी जिसे शिवपूजन सहाय ने खुद देखा और भोगा था। इसके नैरेटर भी वहीं है। प्रेमचन्द के उपन्यास अवध के किसानों के विद्रोह के बाद लिखे गए थे जबकि देहाती दुनिया भोजपुर के किसानों की जिंदगी को आधार बनाकर लिखे गए। इसमें कई लोक कथाएं भी हैं जो आपस में मिली और गुंथी हुई है मिश्रित संस्कृति और यथार्थ से जुड़ कर बनी हुई।
जाने माने आलोचक ज्योतिष जोशी ने कहा कि देहाती दुनिया मे जो समस्याएं दिखाई गई हैं वे आजतक बनी हुई हैं। जमींदारी प्रथा भले ही खत्म हो गयी हो पर नवधनाढ्य वर्ग उसी तरह वर्चस्व बनाये हुए है। देहाती दुनिया का ब्रह्मपिशाच अभी भी है और जाति व्यवस्था अभी भी है। आज गाँव भले ऊपर से बदल गया हो पर सौ साल पहले गाँव की मूल समस्याएं सुलझी नहीं हैं।
वरिष्ठ कवयित्री अनामिका ने गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कहा कि यह उपन्यास एक अलग नैरेटिव रचता है और आज उसे पढ़ने पर थॉमस हार्डी के उपन्यास और हेमिंग्वे की भाषा की याद दिलाता है। उन्होंने कहा कि इसमें स्त्रियों के दमन उत्पीड़न और प्रतिकार की भी कहांनी है।स्त्री दृष्टि से भी इस उपन्यास का अध्ययन किया जा सकता है। सुगिया और बुधिया जैसी लड़कियां इसमें हैं जो बाल विवाह , पुलिस दमन का शिकार बनती हैं ।
आर्किटेक्ट विजय नारायण ने कहा कि वह कोई आलोचक नहीं हैं बल्कि पाठक है पर यह बताना चाहूँगा कि प्रेमचन्द की” रंगभूमि “और “देहाती दुनिया” दोनों की पांडुलिपियां लखनऊ के दंगे में खो गयी थी। रंगभूमि तो मिल गयी बाद में पर देहाती दुनिया नहीं मिली इसलिए शिवपूजन सहाय ने इसे दोबारा स्मृति से लिखा जो मूल पांडुलिपि का आधा है। उन्होंने कहा कि शिवपूजन सहाय साहित्य के गांधी थे वे उसी तरह साहित्य और गाँव को देखते थे। स्वागत भाषण विमलेंदु तीर्थंकर ने दिया। धन्यवाद आलोचक एवम बनास जन के संपादक पल्लव ने दिया।
Posted Date:January 23, 2026
9:12 pm