स्त्रीवाद का मतलब मानवतावाद – प्रो. रूपरेखा वर्मा
स्त्री दर्पण नामक ऐतिहासिक पत्रिका की संपादक और जानी मानी समाजिक कार्यकर्ता रामेश्वरी नेहरू को लखनऊ में याद किया गया। इस मौके पर स्त्री लेखा पत्रिका के नए अंक का लोकार्पण प्रो. रूपरेखा वर्मा, वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना, प्रो रमेश दीक्षित, आलोचक वीरेन्द्र यादव और कवि कात्यायनी ने किया। स्त्री विमर्श केवल अस्मिता विमर्श नहीं है बल्कि वह दुनिया को बदलने का एक व्यापक विमर्श है।

अपने ज़माने की मशहूर संपादक, स्वाधीनता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता और हरिजन सेवक संघ की उपाध्यक्ष रामेश्वरी नेहरू को लखनऊ में उनकी पुण्यतिथि पर लखनऊ में आठ नवंबर को तमाम बुद्धिजीवियों ने याद किया। रामेश्वरी नेहरू के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करते हुए मौजूदा स्त्री विमर्श और तमाम जरूरी सवालों पर कई अहम विचार सामने आए। स्त्री दर्पण, प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय जन नाट्य मंच की तरफ से आयोजित साझा आयोजन में स्त्री लेखा पत्रिका का विमोचन भी हुआ। यह अंक 21 वीं सदी के स्त्री लेखन पर केंद्रित है। इस अंक में पुष्पा भारती, अशोक वाजपेयी, वीरेंद्र यादव, अखिलेश, शम्भू गुप्त, निवेदिता झा, प्रियदर्शन, अनिता रश्मि, गीता दुबे, रेखा देशपांडे आदि की रचनाएं शामिल हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जानी मानी समाज सेवी और लखनऊ विश्वविद्यालय की भूतपूर्व कुलपति रूप रेखा वर्मा ने की और कार्यक्रम का संचालन प्रगतिशील लेखक संघ की महासचिव इरा श्रीवास्तव ने किया।
समारोह के दौरान एक विचारोत्तेजक गोष्ठी भी हुई जिसका विषय था – ‘स्त्री विमर्श केवल अस्मिता विमर्श ही नहीं है’। हिंदी में अब तक जो स्त्री विमर्श हुआ वह अधकितर मध्यम वर्ग की स्त्रियों पर केंद्रित रहा और स्त्रीवादी वैचारिकी पश्चिम के नारी चिंतकों पर आधारित रही। उसे देशी स्त्री विमर्शकारों की दृष्टि से नही देखा गया। हंस जैसी पत्रिका और राजेंद्र यादव ने स्त्री विमर्श को देह विमर्श तक सीमित करने का प्रयास किया जिसकी वजह से हमारी नवजागरणकालीन नायिकाओं पर बात ही नहीं हुई। इस दृष्टि से इस संगोष्ठी में स्त्री विमर्श के विभिन्न आयामों पर चर्चा हुई।
इलाहाबाद से आई वर्धा विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन की विभागाध्यक्ष और साहित्य की स्त्रीवादी आलोचक सुप्रिया पाठक, लखनऊ की रेड ब्रिगेड की संस्थापक ऊषा विश्वकर्मा, बनारस आर्या महिला पीजी कॉलेज बीएचयू बनारस की असिस्टेंट प्रोफेसर आलोचक वंदना चौबे ने अलग अलग दृष्टिकोणों से अपनी बात रखी। स्त्री दर्पण की सदस्य और नवजागरण अध्येता अलका तिवारी ने बीसवीं सदी के आरम्भ में हुए स्त्री विमर्श को रेखांकित किया और बताया कि स्त्री दर्पण डिजिटल प्लेटफार्म ने पूरी समग्रता में इस विमर्श को रखने की कोशिश की है।

सुप्रिया पाठक ने कात्यायनी की महत्वपूर्ण पुस्तक” दुर्ग द्वार पर दस्तक “और अनामिका की “पुस्तक स्त्रीत्व का मानचित्र “का हवाला देते हुए अपनी बात रखी और कहा कि विविध वर्गों, विविध जातियों की स्त्रियां एक साथ जब संघर्ष करती हैं तो सिर्फ अपनी अस्मिता के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए होता है ये संघर्ष। जिसे स्त्री विमर्श या अस्मिता विमर्श में बांध कर हम छोटा कर देते हैं जबकि वो बहुत व्यापक दृष्टिकोण है। उन्होंने स्त्री के स्व के बोध पर बल दिया। जिस दिन हम अपने समाज में स्त्रियों को मनुष्य मान कर उनके साथ बराबर का बर्ताव करने लगेंगे उस दिन किसी भी अस्मिता विमर्श की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
ऊषा विश्वकर्मा ने कहा कि वाकई में यह दुनिया ही एक इंसान के लिए खूबसूरत नहीं है और इसे बदलने के लिए हमें दलित बस्तियों और कामगार स्त्रियों से जमीनी तौर पर जुड़ कर उनकी अस्मिता को स्थापित करने की जरूरत है। उनका कहना था कि स्त्री अस्मिता तब सफल होगी जब पुरुष स्टेज पर बैठ कर हमारे हक की बात कहेंगे और हम बैठ कर सुनेंगे। उन्होंने जमीनी स्तर पर स्त्रियों के लिए जो कुछ किया उसका हवाला भी दिया।
वंदना चौबे ने स्त्री विमर्श को नए दृष्टिकोण से देखते हुए कहा स्त्री विमर्श को अस्मिता विमर्श से भी आगे ले जाने की जरूरत है जो अलग अलग अस्मिताओं में उलझ कर रह गया है। उन्होंने रंगनायकम्मा की किताब के अनुवाद घरेलू काम और बाहरी काम का संदर्भ देते हुए स्त्री और पुरुष के बीच श्रम के बराबर विभाजन पर बल दिया और कहा कि जो स्त्रियां पारिवारिक श्रम करती हैं उनका बनाया खाना खा कर पुरुष यदि अगले दिन काम पर जाने की ऊर्जा प्राप्त करता है तो उस स्त्री के घरेलू श्रम को भी महत्व और पहचान मिलनी चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्ष रूपरेखा वर्मा ने कहा कि स्त्रीवाद मेरे लिए मानवतावाद ही है। स्त्रियों को कोई अलग पहचान बनाने की ज़रूरत नहीं। स्त्री विमर्श के बहुत सारे स्वर हैं। उसे सिर्फ एक वर्ग में समेटना सही नहीं है। कुछ स्त्री विमर्श नि:संदेह अस्मितावादी है। मेरी नजर में स्त्रीवाद वास्तव में समानतावाद है। अधिकारों की, आजादी की समानता के साथ ये भी है कि स्त्रियों की कुछ खास जरूरतें हैं जिन्हें हमें पहचानना होगा जो हमारा हक बनता है जैसे कि मातृत्व का हक। बाकी हम स्त्रियां भी पुरुषों की तरह अंततः एक ही प्रकार के मनुष्य हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत स्त्री लेखा पत्रिका के विमोचन से हुई जिसके संपादक जाने माने कवि पत्रकार विमल कुमार हैं जो स्त्री दर्पण का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी चलाते हैं।
चंडीगढ़ से आई और स्त्री दर्पण से जुड़ी कवि आलोचक सुधा तिवारी ने स्त्री दर्पण पत्रिका पर प्रकाश डाला और बताया कि इस मंच ने स्त्री से जुड़ी बीसियों सीरीज चलाई जिनमें 47 साहित्यकारों की पत्नियों, स्त्री प्रतिरोध कविता, अफ्रीकी स्त्री कविता , स्त्री ग़ज़लकारों, बंगला, मराठी, कन्नड़ स्त्री कविता, हमारी माँ ,पुरुष कवियों की स्त्री विषयक कविता आदि शामिल हैं।
बाराबंकी से आई स्त्री जागरण अध्येता अलका तिवारी ने नवजागरण काल में स्त्रियों की भूमिका के साथ रामेश्वरी नेहरू और उनके द्वारा संपादित स्त्री दर्पण पत्रिका के महत्व और योगदान को रेखांकित किया।
कार्यक्रम में जाने माने कवि नरेश सक्सेना , कवि कात्यायनी , आलोचक वीरेंद्र यादव , सामाजिक कार्यकर्ता प्रो रमेश दीक्षित, कवि पत्रकार सुभाष राय, लेखक प्रताप दीक्षित, प्रो नलिन रंजन, राजेश श्रीवास्तव, परमानंद, प्रदीप घोष, सईदा सायरा, डॉ अवंतिका, सुनीता घोष, कल्पना पांडे, रामशंकर वर्मा, शालिनी सिंह, शकील सिद्दीकी, दया शंकर राय जैसे प्रबुद्ध लोगों के साथ कई शोधार्थियों ने भी शिरकत की।
Posted Date:
November 9, 2025
8:11 pm