बच्चों पर तनी बंदूकें भी हो चुकी हैं कला – मोहन राणा

धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत

धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता

धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात

धन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलते

धन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुख

उसकी स्मृति को

धन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँ

जो बन जाती टॉकीज़,

आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा में

धन्य यह साँस,

मैं कैसे भूल सकता हूँ घर

और कोने पर धारे का पानी

ये पंक्तियां हैं नब्बे के दशक के बेहद संवेदनशील कवि मोहन राणा की। कविता का शीर्षक है घर। कई बरसों के बाद मोहन राणा पिछले दिनों भारत आए। रहते वो इंग्लैंड में हैं। वहीं का एक शहर है – बाथ जहां मोहन राणा रहते हैं। अब तो ब्रिटेन के नागरिक भी हो गए हैं। दिल्ली में जन्में, पले बढ़े और पढ़े। जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे तो कला, साहित्य और खासकर कविता में दिलचस्पी हुई। जनसत्ता और नवभारत टाइम्स जैसे अखबारों में कला समीक्षाएं लिखते और कविताएं भी रचते।  बेहद कम बोलने वाले लेकिन अपने आसपास को बेहद बारीकी से पढ़ने और महसूस करने वाले। समाज, जीवन, संस्कृति, कला और प्रकृति को एक दार्शनिक भाव से देखने वाले। फिर शब्दों में गढ़ने वाले। एक कवि अच्छा वक्ता हो, या मंचीय प्रतिभा का धनी हो, या आज के बाजारवाद के साथ खुद को बेचने वाला हो, यह ज़रूरी नहीं। मोहन राणा भी ऐसे ही हैं। चुपचाप अपना काम करते हैं, लिखते पढ़ते हैं और लगातार कुछ न कुछ रचते हैं।

अबतक उनकी कविताओं के 11 संग्रह आ चुके हैं –जगह, जैसे जनम कोई दरवाजा, सुबह की डाक, इस छोर पर, पत्थर हो जाएगी नदी, धूप के अँधेरे में, रेत का पुल, शेष अनेक, मुखौटे में दो चेहरे और एकांत में रोशनदान। हाल ही में सेतु प्रकाशन ने उनका नया संग्रह छापा – पंक्तियों के बीच। उनके कुछ और संग्रह भी पाठकों के बीच आने हैं। कविता में कुछ नए प्रयोग मोहन राणा करते रहे हैं।

8 सितंबर को साहित्य अकादमी ने प्रवासी मंच के अपने कार्यक्रम में मोहन राणा को बुलाया, उनकी कविताएं वहां मौजूद तमाम साहित्य प्रेमियों ने सुनीं और मोहन को समझने की कोशिश की। कुछ को वो जटिल लगे, कुछ को समझ में नहीं आए, लेकिन जो मोहन के व्यक्तित्व को थोड़ा गहराई से समझते रहे, उन्हें उनकी कविताओं की गहराई कुछ हद तक समझ में आई। उनकी कविता एक अमूर्त पेंटिंग की तरह नज़र आई। साहित्य अकादमी की प्रेस विज्ञप्ति पर गौर करें तो कार्यक्रम के दौरान उन्होंने जहाँ अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताया वहीं अपनी अनेक कविताओं का पाठ भी किया। मोहन राणा ने कहा कि कविता और शब्द-संवेदना के बीच कवि एक कार्बन कॉपी की तरह है। कविता दो बार अनूदित होती है, पहली बार जब लिखी जाती है और दूसरी बार जब उसे लिखा या पढ़ा जाता है। उनका कहना है कि मैं कविता की खिड़कियाँ बनाता हूँ, जो हमेशा खुली रहती है। उन्होंने जो कुछ कविताएं सुनाईं वो थीं – पारगमन, यह जगह काफी है, एक सामान्य दिसंबर का दिन, चार चिड़ी तीन इक्के और एक जोकर, पानी का रंग, छतनार चीड़ की छाया में, होगा एक और शब्द तथा अर्थ शब्दों में नहीं तुम्हारें भीतर।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित श्रोताओं ने उनकी कविताओं को लेकर कई सवाल जवाब किए और संक्षिप्त टिप्पणियाँ भी प्रस्तुत कीं। कार्यक्रम में प्रवासी लेखन एवं कविता से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण लेखक – विमलेश कांति वर्मा, नारायण कुमार, अनिल जोशी, विनोद तिवारी, राजकुमार गौतम आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन और मोहन राणा का स्वागत साहित्य अकादेमी के उपसचिव देवेंद्र कुमार देवेश ने किया।

बहरहाल सात रंग के पाठकों के लिए मोहन राणा की एक और कविता पेश है –

तीसरा युद्ध

दुकान के कोने से आयी एक आवाज़

ले जाओ यह मुफ़्त है !

किताबों के साये में वह

दोपहर की छाया की तरह

अविचल मुझे भाँपता

अगर चाहो तो ले जाओ वह बोला

युद्ध की पुस्तकों का सूचीपत्र मुझे उलटते देख

दूसरे महायुद्ध पर इतनी पुस्तकें

कहानियाँ संस्मरण इतिहास और चित्र-

बच्चों पर तनी बंदूकें भी हो चुकी हैं कला

काले सफेद चित्रों में

इतने शब्द केवल एक बीते युद्ध के बारे में

अगर ऐसा फिर हो तो क्या फिर छपेंगी

इतनी ही किताबें

शायद नहीं, नहीं कहकर हँस पड़ा मेरे प्रश्न पर वह

चल रही है तैयारी फिर से….

Posted Date:

September 9, 2025

3:23 pm Tags: , , ,

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