एक जबरदस्त पटकथा में छिपे ‘शोले’

वह 1975 का साल था। स्कूल में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम खत्म होते ही हम दो दोस्त पटना के एलिफिन्सटन सिनेमा हॉल जा पहुंचे। भयानक भीड़ और टिकट के लिए जबरदस्त मारामारी। एक दूसरे पर चढ़ते लोग और टिकट विंडो में किसी भी तरह हाथ डालने की जद्दोजहद। आज ही के दिन शोले रिलीज़ हुई थी और हमें फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का जुनून सवार था। तीन बजे के शो के लिए सुबह से ही लंबी लाइन और विंडो खुलते ही एक दूसरे पर चढ़ते लोग। हमने भी पूरी ताकत लगाई, किसी तरह विंडो खिड़की तक तो पहुंचे लेकिन तभी हाउस फुल और विंडो बंद। तब न तो ऑनलाइन बुकिंग थी, न मल्टीप्लेक्स, न हफ्ते भर पहले एडवांस बुकिंग का कोई सीन। एडवांस बुकिंग भी उसी दिन सुबह 10 से 12 बजे तक होती थी। बहरहाल हम मुंह लटकाए हॉल में घुसने का कोई और रास्ता तलाशने लगे। तभी किसी ने कंधे पर हाथ रखा, ‘टिकट चाहिए’। उसके पास थर्ड क्लास की टिकटें थीं और वह उसे पांच पांच रुपए में बेच रहा था। तब फ्रंट रो यानी थर्ड क्लास का टिकट शायद एक रुपए सत्तर पैसे का होता था। वहां अगली दो कतारों में कुर्सियां नहीं बेंच लगी होती थी। हमने अपनी जेबें तलाशीं। हमारे गुल्लक से निकाले करीब ग्यारह रुपए हमारे पास थे। हमने झटपट 10 रुपए देकर दो टिकट खरीदे और शान से हॉल में दााखिल हुए। फिल्म शुरु हुई, हर दृश्य पर सीटियां बजती रहीं,  लोग बसंती के डांस पर पैसे फेंकते रहे, गब्बर को गरियाते रहे लेकिन महबूबा महबूबा पर रेज़गारियां उछलती रहीं, अंग्रेजों के ज़माने के जेलर ने भी खूब वाहवाही बटोरी और सूरमा भोपाली भी पीछे नहीं रहे। ठाकुर, वीरू और जय ने तो हर दिल में जगह बनाई ही, मौसी जी भी पीछे नहीं रहीं। ‘अरे ओ सांभा‘ , ‘तेरा क्या होगा कालिया’ और ‘ये हाथ नहीं फांसी का फंदा है’ सरीखे डॉयलॉग तो सबकी जुबान पर चढ़े ही। इस सुपर हिट फिल्म का हर किरदार, हर डॉयलॉग, कसी हुई पटकथा, एक्शन और हर सिक्वेंस लोगों के दिलोदिमाग पर छा गया। दो एलपी रिकॉर्ड के सेट में पूरी फिल्म जगह जगह लाउडस्पीकरों पर दशकों तक गूंजती रही। बिना परदे पर देखे ये सारे साउंडट्रैक आपके मानस पटल पर दृश्य बनकर उभरते रहे। एक ऐसी फिल्म जिसने लगातार पचास सालों तक अपनी अहमियत बनाए रखी और अबतक की सबसे सुपर डुपर हिट फिल्म साबित हुई। शोले के पचास साल पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। हरेक के अपने अनुभव हैं, हर किरदार के अपने मायने हैं। अपना अपना नज़रिया भी है। तो 7 रंग के पाठकों के लिए इस फिल्म के बारे में जाने माने लेखक और फिल्म पत्रकार प्रताप सिंह की किताब सिनेमा का जादुई सफ़र के कुछ हिस्से भी ज़रूर पठनीय होंगे। प्रताप सिंह की अपनी शैली है, भाषा के नए नए प्रयोग हैं और अपने उसी अंदाज़ में उन्होंने शोले पर भी लिखा है। पेश है वह आलेख जो प्रताप सिंह ने हमारे पाठकों के लिए साझा किया है।

 ‘शोले’ की सार्वकालिक सफलता और चुम्बकीय शक्ति उसकी जीवंत पात्रता और अनोखे प्रस्तुतिकरण में छिपी हुई है।बेशक,  सलीम-जावेद की पटकथा ने इसे एक दंतकथा में बदल दिया हो। जैसे कारू का खजाना अचानक {उसकी सिनेमा -घरों में ‘मरियल -ओपनिंग’ के बाद} हाथ लगा था। तब से इसके ड्रीम-मर्चेंट घोड़े बेचकर सोये रहे ! सबके लिए अहम रहस्य या सवाल यही रहा कि सोने की खान में बदल चुकी यह फिल्म पचास साल बाद भी एक सुपरहिट धमाका क्यों माना जाता है?

‘शोले’  तीन-चार घंटे का कोई वेस्टरनाइज-हिंसक तमाशा मात्र नहीं है। सलीम-जावेद की सधी हुई कलम से खींची गई एक सिलवर-लाइन ने पिछले व्यावसायिक सिनेमा के प्रतिघातों को उसमें समाहित करते हुए उसे एक अलग शिखर प्रदान किया था। बेशक,  यह उन दोनों महारथियों की जबर पटकथा, जावेद के तमाम सतरंगे – संवाद, कैमरामैन द्वारका द्विवेचा की डिटेल्स को बारीकी से समझने और परदे पर जिन्दा करने की कलाओं से ज्यादा सम्भव हो पाया।

हिन्दी-सिनेमा के रंगीन उजाड़ में पिछड़े हुए बर्बर कथानकों का मंथन करने पर उस युग में जिस अंधकार की परछाइयाँ हाथ लगती हैं, ‘शोले’  उनका पुनराविष्कार है। पश्चिमी- शैली के सिनेमा की कढ़ी का सालन और देसी लोकगाथाओं की क्रूरता से उपजा एक घोर अमानवीय प्रतीक (निरंकुश खल-नायक) सलीम-जावेद को इतना सम्मोहित करता है कि इस के मिश्रण के जादुई असर के बाद बाकी लोकरंजक तत्व,  संवेदनाएँ तथा पारम्परिक अच्छाइयों,  बुराइयों के निष्कर्ष उसी कथा की धुरी पर ज़रा भिन्न पैमाने पर घूमते दिखाई देते हैं। पटकथा में विरोधों का अद्भुत सामंजस्य है। शायद इसी कारण तनाव और आतंक अंत तक कायम रहता है। तकनीकी कौशल,  फोटोग्राफी,  सम्पादन,  वाइड एंगल – लांग शॉट,  कुछ क्लोज-अप और स्वर संगीत (सिम्फनी) इसमें जादुई प्रभाव पैदा करते हैं।

शोले’  की जीवन्त – पात्रता की बात करें तो बसन्ती,  सूरमा भोपाली,  अंग्रेजों के जमाने के जेलर की भड़ास में औचक नयापन पैदा किया गया है। वरना तो उनका पटकथा में शामिल होना तमाम ख्याति बटोरते हुए भी बेमानी भी कहा जा सकता है। ये लटके -झटके दो केन्द्रीय पात्रों वीरू और जय के अंतराल में मनोरंजन का जरिया भी लग सकते हैँ। जिनकी सूझ-बूझ की झौंक में छौंक लगाना भी उनका उद्देश्य- सा लगता है। अलबत्ता, हर सूरत अभिनय-सम्प्पन लीला मिश्रा जी के प्रौढ़, पर ताजगी भरे मौसी के रसीले-गंभीर किरदार में हमारे समाज की व्यंग्यात्मक-मीमांसा, हतप्रभता से अर्जित हठीला – विचलन और बतकही की भूख मोोलिक और असरदार है। उनके जज्बाती विपर्यय -संवादों तक में यह विचलन उनके अनोखे समझदार – स्वभाव (हाव-भाव) की मूल संवेदना है और दोतरफा – बतकही उनके भोलेपन,  बड़बोलेपन के ऐंद्रिक- सुख का भी गुण-धर्म है। जिसमें जीवन के अनुभव का रस टपकता रहता है। उनके बिना, उनकी लीला-भूमि, विस्मयता की निरन्तरता के बिना वह दोतरफा लोमहर्षक – बातचीत जैसे पूरे रंग में आ ही नहीं सकती थी। वह भूमिका ‘कहीं -कहीं ‘मदर इंडिया’ की जिल्लन [जि ल् लू] बाई की याद दिलाती है। [ वहां, राधा की सास की उसकी संक्षिप्त भूमिका भी वैसे ही जायके से भरपूर है। ] यूँ  हेमा मालिनी,  जगदीप,  असरानी और सर्वाधिक लीला मिश्रा के पात्रों की मानसिकता और विस्मय की उड़ान तथा कौतुक को जीने की कलाएं किसी की  कम नहीं हैं। घटनाओं का चरमोत्कर्ष ऐसे संयोगों से बुना गया है,  जो शोकान्तिक- क्षणों से अलग अपनी छाप दर्शक के मन पर छोड़ता ही है।

उधर, दुःख और आंतरिक पीड़ाओं के धागे से कहीं-कहीं बोलती- चुप्पियाँ भी बुनी गई हैं। दुःख का पहाड़ टूटने पर मौन विलाप की एकांतिक घड़ियाँ कितना सालती हैं, इसे ए.के. हंगल,  जया भादुड़ी और संजीव कुमार के परिपक्व अभिनय में खूब ही देखा जा सकता है। वैधव्य (विधवा होने पर) में प्रस्फुटित प्रेम के अंकुरों को मन में छिपाए रखना और अंत में एक ही आँसू से सब- कुछ कह देने का सामर्थ्य वहीदा के बाद शायद जया में ही है। इतना ही नहीं,  ठाकुर के पूरे परिवार के सफाए के बाद की हवाइयाँ,  कफ़न के उड़ते कपड़े (चादर) का बार-बार उघड़ना, ठाकुर बलदेव सिंह का मौत के सन्नाटे में अपनों के शवों को देखना और साथ ही बड़े झूले का इस गहन सन्नाटे में एक खास मोशन में हिलना-डुलना मन के दृश्य-पटल कर हमेशा के लिए अंकित हो जाते हैं। पर Sergio Leone  की वेस्टर्न-फिल्म ‘A Fist Full of Dollars’  और  ‘Once upon a time in the west’  के प्रभाव भी खुद जावेद अख्तर ने कबूल किए हैं।'(1) जो ‘शोले’ की बर्बर और हिंसक–छाया में साफ नजर आते हैँ।

गब्बर के प्रतिशोध के पश्चात् ठाकुर का जय और वीरू के मर्मान्तक सवाल पर चुप रह जाना,  एक कड़वी सच्चाई की ओर किए गए संकेत से ही उसे बयान कर देना भी शोले’  को एक असामान्य फिल्म में बदल देते हैं। जो पल-पल अपना कद और मिकदार बढ़ाती हुई मार खाए खामोश- हिन्दुस्तानी मिजाज की संरचनाओं के करीब होती- सी दिखती है।

सलीम-जावेद की पटकथा में छिपी इन यकता – बारीकियों का कई जगह बिना संवाद के बेहतर इस्तेमाल हुआ है। मन की चोट सहने और उस यंत्रणा को पूरे हौसले के साथ जीकर दिखाने वाले ये चंद ऐसे ‘फ्रेम’  हैं जो शोले’  की चमत्कारिकता तथा नाटकीय छवि के अतिरेकपूर्ण पिछले बिम्बों को धो देते हैं। एक कॉस्टयूम ड्रामा अचानक क्लासिक में बदल जाता है। एक सहृदय-भाव इन पात्रों की करुण स्थिति को लेकर जाग उठता है। चंद जानदार संवादों और शानदार सीन के दम पर शोले’  के सहायक कलाकार / किरदार तक दर्शकों की वाहवाही लूटते हैं।

शोले’  के जातीय गुण तथा संवादों की शाश्वत गुणवत्ता और अवचेतन में समा गए छोटे-बड़े सभी किरदारों की बाजीगरी,  कामेडी (कामदी) ही नहीं, हिंसक प्रतिशोध को बीच-बीच में अवकाश देने वाली लम्पट-उदारता अलबत्ता, एक ऐसी फिल्म की सर्वाधिक लोकप्रियता के सकारात्मक साँचे की मीमांसा की माँग करते हैं,  जो इन सबके बिना नकारात्मक प्रतिहिंसा का ही खेल रचती और अपने व्यावसायिक मूल्यों की किलेबंदी में ‘सुपरहिट’ फिर भी साबित होती ही !!

 

भूमिकाओं का खेल

गब्बर के किरदार की ऊंचाई और बेशुमार लोकप्रियता को भाँपते-आंकते हुए शोले’  में अमजद की एंट्री से पहले बवाल कम न था। इस कारण, बाकी अहम भूमिकाओं का चयन भी मुश्किलें खड़ी करने वाला था। क्योंकि सभी प्रमुख सितारे {संजीव कुमार से अमिताभ तक} वही किरदार करने को लालायित थे। मशहूर चरित्र अभिनेता जयंत के छोटे बेटे और रंगमंच के बेहतरीन कलाकार अमजद खान का चयन रमेश सिप्पी ने जावेद के भरोसे और सलीम खान के कहे पर किया था। जावेद ने 1963 में उनका नाटक “ऐ मेरे वतन के लोगों” दिल्ली में देखा हुआ था। उस नाटक में अमजद ने फौजी अफसर की दमदार भूमिका अदा की थी। उन से पहले इस रोल के लिए डैनी ही निर्देशक की निगाह में खरे थे। तो भी अमजद की ‘परफेक्ट कास्टिंग’  का नया  अहसास भी आज ‘शोले’ देखकर हो सकता है। किन्तु एक असमंजस संजीव कुमार, धर्मेंद्र और अमिताभ को खुद था। जो भूमिकाएँ रमेश सिप्पी ने संजीव, धर्मेंद्र और अमिताभ को सौंपी थी, वे तीनों ही दूसरी भूमिकाएँ करने को बेकरार थे। धर्मेंद्र संजीव कुमार की ‘ठाकुर’  की भूमिका करना चाहते थे। जबकि अमिताभ ‘वीरू’  के भदेसपन पर इतने मोहित थे कि वे धर्मेंद्र को मिले रोल को निभाना चाहते थे या फिर संजीव की तरह वे भी गब्बर की ही भूमिका’  पर मोहित थे। और .. संजीव कुमार, उनका क्या कहना ! उनकी ‘अप्रोच’  उम्दा थी। वे भी तो गब्बर’  की भूमिका ही हड़पना चाहते थे। तब ‘जय’  के रोल का क्या होता। उसके लिए शत्रुघ्न सिन्हा भी लगभग तय थे। वितरक शत्रुघ्न के पक्ष में थे क्योंकि बच्चन का तब तक ‘ट्रेक रिकॉर्ड’  कमजोर था और उनकी “जंजीर” का जलवा तब तक परदे पर रोशन नहीं हुआ था। लिहाजा, जय के रोल में अमिताभ की तयशुदा गारंटी बतौर निर्देशक और उस पर पैसा फूँक रहे  जी . पी . सिप्पी को “जंजीर” का ट्रायल दिखाया गया था। उस समय में सफलता की गारंटी शत्रुघ्न सिन्हा जय बनते-बनते रह गये। अंतत: धर्मेंद्र की सिफारिश भी  अमिताभ बच्चन को और मजबूती दे गई । दूसरी तरफ़, धर्मेंद्र और हेमा मालिनी का रोमांस उन दिनों परवान चढ़ चुका था और रमेश सिप्पी को इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई थी। सलीम-जावेद खुद एक ‘टेरेटरी’  में बदल गए थे। उन्होंने शोले’  को सोने की खान में बदल दिया था। लेकिन बुलन्दियाँ हासिल करने से पहले फिल्म से जुड़े हर शख्स और शख्सियत को मानो एक ‘एसिड टैस्ट’ से गुजरना पड़ा था। ताज्जुब है,  आज भी इसके ‘ड्रीम-मर्चेंट’ गोया  घोड़े बेचकर सोए रह सकते हैं। रमेश सिप्पी उस के बाद वैसा कोई बड़ा धमाका समर्थ कलाकार कुलभूषण खरबन्दा के भरोसे “ शान से न कर सके। धारावाहिक “बुनियाद”  ने जरूर उन्हें एक अलग और नई पहचान दी ।   

गब्बर की खतरनाक हँसी

 ‘शोले  के ‘थर्ड डिग्री’  ट्रीटमेंट से गब्बर के रूप में एक ऐसा नया खलनायक सामने आया,  जो बहुत मौलिक न होते हुए भी हिन्दी – सिनेमा की दो धुरियों में बँटे हुए तब तक के परदे पर अवतरित होते आए खूंखार / खाँटी और आदर्श डाकू के (धोती, साफे, तिलक वाले) बाने को ठुकराकर ‘काऊ बॉय’  शैली का अलग बाना और घराना तैयार करता है। जबकि मुझे जीने दो’  और जिस देश में गंगा बहती है’  का ठाकुर जरनैल सिंह और राका डाकू बीहड़ के एक गुमनाम छोर पर खड़ा रहकर लूटता और किसी को अपना दिल दे बैठता था।

दूसरे छोर पर, उसी परदे पर चम्बल के वास्तविक सम्मोहन और दमन से उपसृजित असल डकैत बैंडिट क्वीन’  में लालाराम,  मलखान के रूप में बाद में सामने आए। लेकिन इनसे पहले शांत और वाचाल क्रूर गब्बर का उदय मॅाड नजर आते डाकू का सुपर इम्पोजिशन’ सामने  था। यह डाकू लालाराम और मलखान या गुर्जर से कतई भिन्न था। बाद के फिल्मी-डाकुओं ने उसी की जीवन-शैली और वेशभूषा तक को अपना लिया। उसे भूतो न भविष्यति’  कहे जाने वाले डाकू के रूप में ख्यात होना था। उसका चरित्र-चित्रण, वेशभूषा और सूरती ठोकना कुछ बेमेल से थे। फिर भी , वह अमजद खान की कद-काठी और खतरनाक हँसी में खूब फबता था। उसके संवादों के बीच ही दो सहायक पात्रों की संरचना कालिया और सांभा  के रूप में की गई ताकि परदे पर रंजन की इस मार्मिक और तार्किक-मनोभूमि के महानाटक की भूमिका से निर्मित आखेट का उसका परिवेश बेहद दिलचस्प बन सके। उसके परदे पर अवतरित होते ही पूरे सीन को चुरा लेने का जादू अमजद की अपनी ईजाद ज्यादा था । इसमें निर्देशक के सृजित-संकेत भी शामिल थे जिसने पश्चिमी शैली के डकैतों के लिबास,  चुरूट,  मटमैले दाँतों व दाढ़ीजार कटीले चेहरे और डरावनी  हँसी से उसे मुकम्मील निर्मित किया था। खलनायिकी के इस आसमान के बाद अमजद की जगह डैनी  की कल्पना किसी भी कसोोटी पर अब हो ही नहीं सकती थी। बेशक, कभी डैनी ही  शोले’  के निर्देशक रमेश सिप्पी  की पहली पसंद थे।  जो उन दिनों अफगानिस्तान में धर्मात्मा ‘  की शूटिंग छोड़कर, वास्तव में इसलिए उनके सेट पर नहीं पहुँचे क्योंकि खलनायक की सारी खूबियों के बावजूद उन्हें यह डाकू चार्ल्स ब्राउस्टन  और क्लिन्ट ईस्टवुड  की फिल्मों का भी क्लोन’ कुछ-कुछ साफ  नजर आता था। उसकी असीम सफलता में हॉलीवुड के अभिनेता बस्टन कीटन  के हाव-भाव और बेजोड़ मुद्राएँ भी छिपी हुईं थीं। जिनका बेहतरीन इस्तेमाल बाद में अमजद खान ने इतालवी फिल्म the master touch पर आधारित फिरोज खान निर्देशित   कुर्बानी ‘  के पुलिस अफसर  के किरदार में जमकर किया था। लेकिन यह अमजद की भी चमत्कारिक सफलताओं को भरपूर कमाने का भ्रामक – समय था। तदन्तर, “शतरंज के खिलाड़ी”  के वाजिद अली शाह जैसी अलोनी भूमिका और सत्यजित रे जैसे निर्देशक और गब्बर का आविष्कार करने वाले रमेश सिप्पी उनको भी कभी नसीब नहीं हुए।   

 

Posted Date:

August 20, 2025

11:24 am Tags: , , , , , ,

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