हिन्दी गीतों में “यूडलिंग ” का आगमन और बादशाहत…    

किशोर कुमार के गीतों में यूडलिंग का इस्तेमाल कैसे हुआ और कैसे किशोर दा ने फिल्म झुमरू में इसका ऐसा प्रयोग किया कि वह आज तक तमाम गायकों के लिए एक मिसाल है… ऐसे तमाम पहलुओं पर, किशोर कुमार को पहचान देने वाली फिल्मों पर और बड़े भाई अशोक कुमार के साथ उनके रिश्तों पर पेश है ये चौथी कड़ी…. प्रताप सिंह की कलम से 

यूडलिंग गायनशैली  को अपनाने, अपना बनाने, हिन्दी-सिनेमा के फिल्मी गीतों में हू-ब-हू उतारने में पहली कामयाबी किशोर कुमार को ही मिली।  पर  इसमें परिपक्वता आने में सात साल लगे। फिर शौकियाना रफ़ी साहब ने भी किशोर दा की मदद से अपने कुछ गीतों में वैसे ही प्रयोग किए। 1920  के जमाने  के यूडलर  Jimmi Rudgers  के पश्चिमी- शैली के गीत Blue – यूडलिंग  कहलाए। फिर  1945  के दौर में  Namda  Jackson  ने उसे और नया किया तो उसका नाम हुआ–‘Cowboy यूडलिंग’ ! किशोर ‘कुमार शुरू से ही धुनों और गीतों के बोल में नवल-नवीनता के आग्रही रहे हैं। उन्होंने इस भिन्न सी यूडलिंग-शैली  पर नजर रखी और 1948  से इसकी आज़्माइश शुरू की। एक गीत को उसी शैली में रूपान्तरित किया तो पहले से ईजाद  इस धुन और लयकारी को 1955  की फिल्म जोरु का भाई में हिट होते भी देखा। गीत  के बोल हैं — काली-काली..  तारों  वाली..रात ज़वां है..आजा ! यह पहला यूडलिंग- प्रयोग सफल रहा तो शंकर मुखर्जी निर्देशित फिल्म झुमरू  में– उस शैली की चपलता  और रंगत को इस गीत में पूरी तरह उतार लिया। उस गीत के बोल थे— * मैं हूँ.. झूम .. झूमss  .. झुम .. झुम.. झुमरू !! .. ”

यूडलिंग केवल जिम्मी रुदगर की ही गायन-शैली नहीं थी। उसके अलावा Tax Morton का भी उसमें योगदान था। किशोर कुमार ने अब इन दोनों महारथियों के प्रयासों की हिन्दी के और भी चुलबुले-गीतों में आईनागीरी की। पंचम दा  इस शैली की सफलताओं को समझ रहे थे। इसलिए उनसे गवाये गीतों में किशोर कुमार इस शैली की सुर की बारीक पर ऊँची उठान की स्वच्छन्दता को भी  झलकाते नजर आते हैं।

किशोर कुमार की देखा-देखी और गायकों ने भी इस नई शैली पर तवज्जो दी। पर रफ़ी साहब, मन्ना डे, महेंद्र कपूर में फ़क.त मोहम्मद रफ़ी को ही इसमें शौकियना सफलता कहीं ज्यादा मिली। ● रफ़ी ने ही कभी किशोर कुमार के नायकत्व वाली फिल्म में— अपनी आदत है सबको सलाम करना.. गाया था। अब किशोर दा की बारी  थी। उन्होंने फिल्म आगरा रोड  के लिए गा रहे रफ़ी साहब की यूडलिंग-शैली की आज़्माइश में मदद की थी।  रिपोर्टर राजू  में भी यही पेशकारी काम आई। उस फिल्म के मस्त-बोल रफ़ी की आवाज़ में- हसीन-सीन के लिए खूब ही कारगर हैं। उसके बोल हैं–चलो हो. .कहाँ. .कहो!. .ऐसा मेरी. .जाँ कहो !  पर हिन्दी फिल्मों के प्रयोगशील  ऐसे गीतों में Perfection  बहुत बाद में आया। किशोर दा  ने मुकद्दर, मासूम, अधिकार, प्यार का मौसम  जैसी फिल्मों में ‘यूडलिंग’ की झलक दिखलाई है। यह रैप  से अलग और  पूर्वयूरोपीय -शैली थी। जो पश्चिमी-गायकों के बारास्ते हम तक पहुँची। “बाप रे बाप”, “जिया sS जिया ss  मेरा जिया..पुकारे” भी इसका विलक्षण उदाहरण है। 1969 में परदे पर आई प्यार का मौसम  की यूडलिंग  की मिसाल भी दी जाती है। इस फिल्म के सितारे हैं — भारत भूषण और निरूपा राय ! शशिकपूर और आशा पारेख ! गाने के बोल हैं –तुम बिन जाऊं कहाँ कि दुनिया में आके …” इस मेलोडी के दो वर्जन  किशोर दा ने गाए। दोनों भारत भूषण पर फिल्माए गए हैं। दोनों के भिन्न – [खुशनुमा और उदास] – भावलोक की रिदम को किशोर कुमार ने नार्मल वॉयस से अलग ओपन लैंड में जैसे विस्तार दिया है, वैसा वैसा वे ही संभव कर  सकते थे, रफ़ी नहीं ! इसके पहले चरण में यूडलिंग -शैली का बेहतर प्रयोग हुआ, जान पड़ता है।  इस फ्लैशबैक से जुदा क्रिएशन इसी गाने और बोल के रोमांटिक मूड को पकड़ती रफ़ी साहब की ईजाद है। जिसका इस्तेमाल नायक-नायिका के लिए किया गया है। अपलोडिंग-साउन्ड के महत्व को अपने करिश्मे से किशोर दा ही सर्वोतम समझा सकते हैं।   आवाज़् को अर्श तक बेखटके पहुँचाने की उनकी चेष्टा और क्षमता से यह भी सिद्ध होता रहा। बहरहाल, यूडलिंग – शैली  के अनुपम- अद्वितीय सितारे-हिन्द  किशोर कुमार ही हैं।

 बड़े भाई के जन्मदिन पर – अलविदा !

                       

किशोर कुमार कितना-कुछ नया और अद्वितीय मौसिकी की दुनिया में कर गए हैं। जब दुनिया से अलविदा ली तो वह भी अचानक ही। किशोर कुमार गीत-संगीत के चहेतों के साथ, अपने बड़े भाई सदाबहार अभिनेता अशोक कुमार के सीने में भी एक दर्द छोड़कर, उनसे चार साल पहले ही रुख्सत हो गए। 1987 में अशोक कुमार 76 साल के  होने पर 13 अक्तूबर को अपने जन्मदिन के दिन से,  उस दर्द को भीतर छिपाए ही  जीते रहे। 13 अक्तूबर की सुबह उस साल किशोर दा अपनी रिकार्डिंग को  दरकिनार कर, बड़े भाई अशोक कुमार के जन्मदिन पर कोई ‘सरप्राइज’ देना चाहते थे। वह उसकी तैयारी में जुटे थे। मर्लिन मुनरों की सिनेमास्कोप रोमांटिक 1954 की फिल्म River Of No Return” का एक कैसेट (संभवतः Cyril  J. Mockridge के संगीतबद्ध) गानों का रहा होगा ) उन्होंने खास मकसद से अपने सबसे बड़ी विडियो लाइब्रेरी  के खजाने में से खोज निकाला। शायद किसी नये रूप  में उसे नये गीत के भी जन्मदिन की खुशी बतौर अशोक कुमार से साझा करना चाहते  रहे। यह नयी खुशी बांटना ही वह ‘सरप्राइज’ रहा हो ! पता यह चला कि उस फिल्म में  मुनरो की छवि को ही केंद्र में रखकर वह अपनी नयी फिल्म की भी घोषणा करने वाले थे। उस अगली फिल्म के नायक के रूप में डैनी ही उनकी पारखी नजर में थे। कथित उस अज्ञात फिल्म की  भूमिका के बाबत डैनी को फोन भी किया गया। पर डैनी तत्काल मौके पर पहुँच ही  नहीं सके। बड़ा बेटा अमित कनाडा से नहीं लौटा था। भीतर देह में उथल-पुथल मचनी शुरू हुई। इसलिए छोटे बेटे सुमित को अपने पास से डिगने नहीं दिया। तुरन्त बड़े भाई अशोक  कुमार को बुलावा भेजा। संदेशा था—“चल रही शूटिंग छोड़कर, जुहू में आवास पर आ जाएं।”.. कहते हैं– घबराए अशोक कुमार संदेश पढ़कर सन्नाटे में आ गए। पर उस ‘urgent – Message’ को भांप नहीं पाए। अशोक कुमार की पत्नी शोभाजी को |गुजरे अभी छह माह भी नहीं हुए थे।  उधर, किशोर कुमार के पास युवा-अभिनेत्री उनकी पत्नी लीना चंदावरकर ही थी और छोटा बेटा– सुमित ! इतनी गंभीर हालत में भी किशोर दा ने पत्नी से (इतना ही)  कहा- डॉक्टर को मत बुलाना, हार्ट अटेक आ जाएगा। अगले पल वही हुआ। और अन्तत: .. डैनी, दादा मुनि- अशोक कुमार,  अनूप कुमार सभी को जुहू उनके घर आना ही  पड़ा।..

58  बरस की शानदार ज़िन्दगी के कंगूरे अचानक कड़कड़ाए    और ढह गए। अपने  शिखर, अपने मनाज़िर.. यहीं इसी संसार के हवाले छोड़कर और अपनी रसमयी-यादों के दस्तावेज यहीं  छोड़ कर, सबके लाडले किशोर कुमार अकस्मात ही, अलविदा कह गए। खुद दादा मुनि भी चार साल बाद 10 दिसम्बर 2001  को उसी द्यु-लोक में चले गए। लेकिन किशोर दा के ‘अलविदा’  होने पर उन्होनें कभी  जन्मदिन नहीं मनाया। क्या समरूपता थी कि किशोर कुमार की पहली फिल्म  शिकारी, दूर का राही, चलती का नाम गाड़ी और बन्दी  फिल्म  में कभी दोनों भाई  जुड़वा ज्यादा नजर जाते थे। कहीं दूर उनके एक और बड़े भाई जैसे ही बड़े गायक रफ़ी का गाया..दोस्ती  फिल्म का यह गाना बज रहा था—आवाज़ मैं ना दूंगा।..   किशोर कुमार..  चले गए पर उनकी गायिकी की गूँज [हमेशा] सुनाई पड़ती है। उस  गूँज में उतराते- गहराते नग्में उसी गायिकी का आकाश हैं – जिसे एक मनमौज़ी ने ईजाद किया था। अपनी धुन- में / लहन में वह आवाज़ की खामोशियों में जीने वाले के दर्द की शहतीर को भी वह  संभाले रखता था और वही खुशनुमा गानों को आखिरी सिरे तक चमकाने-छलकाने वाला [पराकाष्ठा तक पहुँचने वाला] मुंतही अगले पल में हमारे बीच नहीं था। पर सबके दिलों में उस अ.फ्रोज़ की अलबेली- गायिकी का उजास चमकता-दमकता रहेगा।

किशोर कुमार की पहचान बनी फिल्में   

अपनी गायिकी का मूल धर्म निभाते हुए .फैज़याब  किशोर कुमार ने हमें ऐसी अदाकारी से लैस फिल्में भी दीं –जिनमें हीरो- हीरोइन का रोमानी सौन्दर्य- बोध युगल गीतों में दिलकशी को छलकाता रहा और कामेडी का छौंक भी उनमें लगता रहा। उनकी कुछ फिल्मों में गमगीनीयत, सादगी और यथार्थ-शैली का अभिनय भी उनकी जान है।  बशर्ते, बिमल राय उन फिल्म की कमान संभाले हुए हों या फिर ऋषिकेश मुखर्जी ! मसलन.. नौकरी, मुसाफिर ! मुखर्जी मोशाय की मुसाफिर  फिल्म  में तो प्रयोग ही प्रयोग हुए। एक घर और अलग-अलग तीन घरबासियों की कहानी ! संसार की तरह उस घर में भी नवेले गृहस्थी जोड़ों का आना -जाना दिख पड़ता है। फिर- फिर मकान मालिक को TO-LET टांगना पड़ता है। यह प्रतीकात्मक भी है। मुसाफ़िर में इस दृष्टि से  विवाह [नवजीवन],  संतान [नया जन्म] और मृत्यु-दर्शन का साथ- साथ चित्रण संभव हुआ है। ऋत्विक घटक की कहानी पर बनी इस फिल्म के तीसरे हिस्से में अभिनय के बादशाह दिलीप कुमार ने violinist  राजा पगला बाबू की रहस्यमय भूमिका अदा की। जो किसी से नहीं मिलन चाहता। दूसरे भाग में किशोर कुमार, नाजीर हुसैन और निरुपा राय तथा पहले और प्रमुख भाग में सुचित्रा सेन और शेखर लीड  रोल में हैं। फिल्म के दूसरे भाग में किशोर कुमार ने भानु के किरदार के तौर पर..घर में बच्चे के आगमन पर अपनी आवाज़् में एक प्यारा सा गीत भी गाया है।  गीत के बोल हैं :–मुन्ना बड़ा प्यारा, अम्मी का दुलारा ! ऋषिकेश मुखर्जी  ने यहां किशोर कुमार के Wit -Humour को भी इस्तेमाल किया है।   बाद में खुद किशोर कुमार ने फिल्म हाफ टिकट  के कुछ दृश्यों में मस्ख.रे-पागलपन का और बाकी समय वहां दिल्लगी का नये तेवर के साथ तड़का लगाया था । बहुत पहले 1952 में छमछमाछम  ने उन्हें स्टार बना दिया था। किशोर कुमार इल्जाम, मिस-माला, पहली झलक, मदभरे नैन, भागमभाग, भाई- भाई, आशा, चलती का नाम गाड़ी, दिल्ली का ठग, रागिनी, शरारत, झुमरू, मन-मौजी, दाल में काला, रंगोली, नया अंदाज में भी खूब चमकते रहे। पर दूर गगन की छाँव में, ममता की छाँव में, दूर वादियों में कहीं  खो गईं उनकी गंभीर छवि और बेहतर कहानी के बावजूद ये फिल्में उतनी नहीं चलीं। पर दर्ज हुईं। जबकि गंगा की लहरें, मिस्टर एक्स इन बाम्बे, हम सब उस्ताद हैं, श्रीमान फन्टुश, अक्लमंद, प्यार किए जा, पड़ोसन  ने उन्हें नई ऊँचाइयाँ दीं। पड़ोसन  में महमूद, सुनीलदत्त, सायरा बानो, ओमप्रकाश, आगा, केस्टो मुखर्जी, सुंदर, मुकरी  की अपनी-अपनी लाजवाब छवियों और उनमें से कई से टक्कर के रहते किशोर कुमार विद्यापति / गुरुजी की अपनी मनोहारी-मेलोडीअस भूमिका को एक अलग ही ऊँचाई पर ले गए। जबकि दूसरे किरदारों में मास्टर पिल्लई, भोला, बिन्दु, कुँवर प्रताप से लेकर कलकतिया, बनारसी, पंडित जानकी प्रसाद  के रूप में बेहद दमदार सहपंथी उनके सामने खड़े थे। वैसे तो तीनों भाइयों [अशोक, अनूप, किशोर] की एंट्री वाली चलती का नाम  गाड़ी  तक पहुँचने से पहले ही सफलता ने उनका दामन थाम लिया था और फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर, कम ही देखा। नफा-घाटा होता रहा। चलती का नाम गाड़ी  में किशोर का गाया और मधुबाला के संग फिल्माया गया गाना एक लड़की भीगी- भागी सी / सोती रातों में जागी सी / मिली एक अजनबी से / कोई आगे ना पीछे / तुम ही कहो.. यह कोई बात है !!! मजरूह का लिखा हमेशा दिलों में धड़कता / मचलता -सा यह अनमोल- गीत तो आज भी देखा-सुना जाता है। मजरूह के लिखे इस मृदुल – गीत की बागडोर भी बेशक बर्मन दा के हाथ में थी। पर परदे पर जादूगरी नायक-नायिका की ही गजब ढा रही थी। ऐसा जादू किशोर कुमार ने कई बार जगाया। उन्होंने झुमरू  जैसे अनूठे अंदाज बाद की फिल्मों में भी अपनाए। हाफ टिकट  में भी हसीन मधुबाला थी। पर सारा दारोमदार उन पर ही था। इसे उन्होनें विजय उर्फ मुन्ना के अपने किरदार से साबित भी कर दिया कि वह किरदार की ऊटपटाँग हालात में भी, { अमूमन बहकते से दिखते } बेइ.ख्तियार कुछ भी कर दिखाने में सक्षम हैं और उनमें अपार संभावनाएं हैं ! हाफ टिकट  में उनकी अपूर्व- भूमिका की तुलना फिल्म  अप्पू राजा  से करते हुए सिने-पारखी ब्रजेश्वर मदान ने कहा थापूरे  पैसे वसूल हो गए किशोर कुमार की हाफ टिकट से। [हो सकता है, ऐसा हुआ हो!] यहाँ किशोर के उस बोड़म-नायक की तुलना अप्पू राजा  के नायक [कमल हसन] की बेमिसाल कारीगरी से करना भी, उनकी अभिनय-कला का सम्मान है। यह सत्कार-सम्मान उनकी और भी फिल्मों को मिलता रहा। बेशक, पीढ़ियाँ बदल गईं हों, दर्शक आज भी कुछ हद तक उस कलावंत की अभिनयता का लोहा मानते हैं। चलती का नाम गाड़ी  और पड़ोसन  की उनकी छवियाँ तो इस हरफ़नमौला को गायिकी  के साथ नायकी  में भी सरताज साबित कर चुकी हैं।    

Posted Date:

August 4, 2025

4:30 pm Tags: , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright 2024 @ Vaidehi Media- All rights reserved. Managed by iPistis