नया विवाद: प्रेमचंद की अंतिम यात्रा को लेकर उठे कुछ सवाल

साहित्य में विवाद अक्सर होते रहे हैं। चाहे लेखन पर, चाहे तथ्यों को पेश करने पर, चाहे भाषा पर या बड़े लेखकों की ज़िंदगी से जुड़ी सच्चाइयों पर। कथा सम्राट प्रेमचंद की ज़िंदगी, उनके लेखन, उनकी सादगी, उनके दर्शन या पत्रकारिता को लेकर बहुत कुछ लिखा, पढ़ा और बोला जाता रहा है। उनका तकरीबन सारा साहित्य उपलब्ध भी है और उनके उपन्यास, कहानियां और लेखन आज भी सबसे ज्यादा पढ़ा भी जाता है और उसपर चर्चा भी होती है। उनकी ज़िंदगी पर उनके बेटे अमृत राय ने भी लिखा और बहुत से साहित्यकारों ने भी लिखा। ताजा विवाद प्रेमचंद की शवयात्रा में शामिल लोगों की संख्या को लेकर उठा है। तथ्य क्या है, ये तो वही लोग बता पाएंगे जो उसमें मौजूद थे। इस नए विवाद पर खास तौर से साहित्य सृजन में तथ्यों को पेश करने और उसकी विश्वसनीयता पर बात कर रहे हैं जाने माने लेखक, कवि, पत्रकार और स्त्री दर्पण के संपादक विमल कुमार     

पिछले दिनों काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री एवं हिंदी के कवि व्योमेश शुक्ल ने हिंदवी पोर्टल पर प्रेमचन्द के निधन (8 अक्टूबर 1936) के बाद निकली शवयात्रा के बारे में एक लेख लिखकर और “आज “अखबार में छपी एक कतरन को लगाकर एक नई बहस छेड़ दी है ।उन्होंने प्रेमचंद के पुत्र एवं हिंदी के प्रख्यात लेखक अमृत राय द्वारा लिखी गई जीवनी “कलम के सिपाही” में प्रेमचंद की अंतिम यात्रा में लिखे गए इस प्रसंग को गलत बताया है कि प्रेमचंद की अंतिम यात्रा में महज 20-25 लोग शामिल थे और मोहल्ले वालों ने बडे उपेक्षा भाव से कहा कि कोई मास्टर मर गया है।
श्री शुक्ल के इस लेख से हिंदी जगत में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कई लोग जो प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हैं या वामपंथी विचारधारा से जुड़े हैं वे श्री शुक्ल की बातों का विरोध कर रहे हैं और अमृत राय के कथन को सही ठहरा रहे हैं लेकिन यह सच है कि प्रेमचंद की शव यात्रा में कौन-कौन लोग शामिल थे, उसकी सूची पहली बार सामने आई है। इससे कुछ नए तथ्य पहली बार सामने आए हैं। अब तक प्रेमचंद की शव यात्रा में के बारे जो जानकारियां हिंदी साहित्य को उपलब्ध थी , उसका आधार परिपूर्णानंद वर्मा का संस्मरण, नंदुलारे वाजपयी का लेख और अमृत राय द्वारा लिखी गई कुछ पंक्तियां ही थीं ,कमल किशोर गोयनका ने परिपूर्णानंद वर्मा के लेख के आधार पर ही प्रेमचंद की अंतिम यात्रा में शामिल हुए लेखकों का हवाला दिया था लेकिन बाद में बिहार के लेखक पत्रकार बनारसी प्रसाद भोजपुरी की रचनावली आने के बाद यह पता चला कि उस अंतिम यात्रा में द्विज जी और भोजपुरी जी भी मौजूद थे और उन्होंने भी उस अंतिम यात्रा में 20-25 लोगों के मौजूद होने की बात लिखी थी और उन्होंने कुछ के नाम भी दिए थे। इन्हीं दो तीन स्रोतों के आधार पर अब तक हम लोग यह जानते रहे कि प्रेमचंद की अंतिम यात्रा में कौन-कौन लेखक शामिल थे हालांकि अब तक हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के अलावा जयशंकर प्रसाद की अंतिम यात्रा में लेखकों के शामिल होने के बारे में कोई दिलचस्पी नहीं प्रकट की गई है और न ही उसकी कोई जानकारी हमें उपलब्ध है लेकिन प्रेमचंद की शव यात्रा में कम लेखकों का शामिल होना हिंदी में चर्चा का विषय रहा है। अब चूंकि व्योमेश ने अखबार की वह कटिंग लगा दी है उससे स्थिति बदल गई है। जो लोग अखबार की रिपोर्ट को सही बता रहे हैं , वे जाहिर है अमृत राय को गलत बताएंगे और जो लोग अमृत राय के कथन को ही सही मानते हैं वे अखबार की रिपोर्ट को गलत बता रहे हैं। परिपूर्णानंद वर्मा ने भी लिखा है कि प्रेमचंद की शव यात्रा में भीड़ उमड़ी थी लेकिन भोजपुरी जी ने भीड़ उमड़ने की बात नहीं लिखी है।

सवाल यह नहीं है कि प्रेमचंद की शव यात्रा में लोगों के कम होने से उनका साहित्य कम महत्वपूर्ण हो जाएगा या किसी लेखक की शव यात्रा में अधिक लेखक होने से भी उसका साहित्य बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमें अपने बड़े लेखकों के जीवन से संबंधित तथ्यों को सही-सही नहीं जानना चाहिए और उनकी जीवनियां लिखते समय हमें तथ्यों को जांच परखकर नहीं लिखना चाहिए। अमृत राय द्वारा लिखी गई “कलम का सिपाही “हिंदी की कुछ चुनिंदा जीवनियों में से उसी तरह महत्वपूर्ण जीवनी मानी जाती रही है जैसे रामविलास शर्मा की “निराला की साहित्य साधना” पर जब निराला की जन्मशती आई तो नवभारत टाइम्स में हिंदी के प्रमुख लेखक पत्रकार विष्णु नागर ने दो-तीन किस्तों में यह रपट लिखी थी कि रामविलास शर्मा ने निराला का जन्म वर्ष ही गलत लिखा है। तब विष्णु नागर की रिपोर्ट से हिंदी जगत में काफी हलचल मची थी। तब भी जो लोग रामविलास शर्मा के समर्थक थे वे रामविलास जी के कथन को ही सही मानते रहे जबकि जो लोग रामविलास शर्मा के विरोधी थे, वे रामविलास शर्मा के लिखे को गलत ठहराते रहे। कुछ ऐसी स्थिति अब अमृत राय के संदर्भ में पैदा हो गई है।हिंदी के लेखकों में इस मुद्दे पर ध्रुवीकरण हो गया है। एक पक्ष अमृत राय के साथ खड़ा है तो दूसरा पक्ष अमृत राय की कमियां भी बता रहा है।लेकिन प्रश्न यह भी है अगर रामविलास शर्मा गलत हो सकते हैं तो क्या अमृत राय गलत नहीं हो सकते। यह बात इसलिए कही जा रही है कि कई बार लेखकों से भी भूल होती है।

एक नया उदाहरण शिवरानी जी की “प्रेमचंद घर में “ का है। उन्होंने अपनी पुस्तक में यह लिखा था कि उनकी पहली कहानी “साहस “1924 में छपी थी और उसी के आधार पर अब तक हिंदी साहित्य यह जिक्र करता रहा कि शिवरानी देवी की पहली कहानी “चांद “में 1924 में छपी थी लेकिन अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशुतोष पारथेश्वर ने 1924 में “चांद “में जो कुछ छपा था उसकी एक सूची पेश की है जिसमें” साहस “कहानी का कोई नाम ही नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि शिवरानी देवी ने 1944 में जब पुस्तक लिखी तो 20 वर्षों के अंतराल के बाद उन्होंने अपनी याद्दाश्त से जो कुछ लिखा वह सही नहीं था यानी “साहस” कहानी या तो 1924 के पहले छपी या 1924 के बाद छपी। अब तो चांद पत्रिका की सारे अंकों को खंगाला जाएगा तभी पता चलेगा कि वह कहानी कब छपी थी लेकिन हिंदी के लेखक तथ्यों को लेकर बहुत सतर्क नहीं रहे हैं। इसका एक उदाहरण यह भी दिया जा सकता है कि महादेव साहा ने “दिग्दर्शन “अखबार को हिंदी का पहला अखबार बताया था और इसके आधार पर लोग वर्षों तक बहस करते रहे। दिग्दर्शन पहला अखबार है या उदन्त मार्तंड। इस इस बात की सच्चाई का पता लगाने के लिए प्रमिला शर्मा एक लेखिका लंदन भी गयीं और उन्हें वहां संग्रहालय में दिग्दर्शन की खोज की लेकिन वहां भी वह अखबार नहीं मिला तब जाकर यह कहा जाने लगा कि उदन्त मार्तंड ही हिंदी का पहला अखबार था।

इस तरह के कई तथ्य हिंदी साहित्य को नहीं मालूम है। उग्र की किताब चॉकलेट को लोग उपन्यास बताते रहे जबकि वह कहांनी संग्रह था। बहुत कम लोग जानते हैं कि निराला की कविता “जूही की कली” महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लौटा दी तब उसे शिवपूजन बाबू ने “आदर्श “पत्रिका में 1922 में प्रकाशित की थी। कुछ साल पहले मैनेजर पांडे ने दावा किया था कि महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ की भूमिका बाबू श्याम सुंदर दास और राय कृष्ण दास ने नहीं लिखी थी बल्कि वह नंददुलारे वाजपेई ने लिखी थी। उनका कहना था की नंदुलारे जी पुस्तक” बीसवी सदी का साहित्य” में वह लेख शामिल है लेकिन उक्त पुस्तक के बाद के संस्करण में वह लेख नहीं मिला। तब पांडे ने कहा कि संभव है पहले संस्करण के बाद उसे हटा दिया गया हो। लेकिन पांडे जी पहले संस्करण का साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाए। अभी कुछ दिन पहले एक किताब आयी है जिसमें दावा किया गया है कि मुंशी देवी प्रसाद प्रेमचन्द के ससुर थे जिन्होंने 1904 में मृदुल वाणी नामक एक संग्रह में 23 कवयित्रियों को शामिल किया था, लेकिन शिवरानी देवी या प्रेमचन्द ने जिक्र नहीं किया है। शिवरानी देवी के पहले संग्रह की भूमिका शिवपूजन सहाय ने लिखी थी लेकिन पिछले दिनों जो किताब दोबारा छपी तो उसमें भूमिका गायब थी।
इस तरह गलतियां किसी से भी हो सकती हैं। नये शोध नए तथ्य जुड़ने चाहिए। विचारधारा औऱ संगठन के आधार पर ध्रुवीकरण नहीं होना चाहिए।

Posted Date:

June 1, 2025

10:57 am Tags: , ,

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