एक युवा छायाकार अगर अपने कैमरे में आम जनता की जीवन शैली, अपने देश की परंपराएं और मनोभावों को कैद करता है, उनकी बारीकियों को पकड़ता है तो बेशक उसकी दृष्टि आने वाले दिनों में उसे एक बड़े छायाकार की संभावना जगाती है। दिल्ली में युवा फोटोग्राफर नितिन गुप्ता की फोटो प्रदर्शनी में ऐसी ही संभावनाओं से भरे चित्र देखे जा सकते हैं… विमल कुमार की एक रिपोर्ट
*************
कुम्भ पर अब तक देश में कई प्रदर्शनियां लग चुकी हैं औऱ कॉफी टेबलबुक भी निकले हैं लेकिन युवा फोटोग्राफर नितिन गुप्ता की फोटो प्रदर्शनी का अंदाज ही कुछ अलग है क्योंकि वह कुछ खास बात कहती है। ब्लैक एंड व्हाइट इन तस्वीरों को देखकर रघु राय की याद आती है।
यूं तो नितिन हिंदी के साहित्यिक समारोह की शानदार फोटोग्राफी के लिए जाने जाते हैं और पिछले सात सालों में उन्होंने दिल्ली के सांस्कृतिक जगत की हलचलों को कैमरे में दर्ज किया है पर नितिन की यह प्रदर्शनी ” महाकुंभ :एक संघर्ष यात्रा’ एक अलग कहांनी कहती है। इसमें बहुत तस्वीरें स्त्रियों पर हैं। बिना स्त्रियों के भारतीय पर्व अधूरे हैं। यहां की स्त्रियों ने ही त्योहार में रंग भरे हैं इसलिए बिना स्त्रियों के पर्व फीके हैं।
पिछले दिनों मीडिया में कुंभ को लेकर जो शोर शराबा हुआ उससे अलग एक मानवीय तस्वीर इस प्रदर्शनी में दिखाई देती है। इसमें 18 तस्वीरें हैं।
कुंभ साधारण लोगों का महापर्व है लेकिन इसे इस साल राजनेताओं और अति विशिष्ट लोगों का पर्व बनाने की कोशिशें हुई पर नितिन के चित्रों में कोई राजनेता, कोई फिल्मी कलाकार, कोई अधिकारी नहीं। यही इसकी विशेषता है। इसमें खामोश बैठी नावेँ हैं, इसमें स्त्रियाँ हैं कपड़े सुखाती, इसमें बस से उतरती गांव की महिलाएं हैं और मुंडन कराते सामान्य जन हैं।
यह जनता की नज़र से देखी गयी तस्वीरें है। इस प्रदर्शनी में नितिन जनता के फोटोग्राफर बनकर उभरे हैं।अगर वे इसी तरह मानव जीवन के कलात्मक क्षणों को और भावों को कैद करते रहे तो एक बड़े छायाकार की संभावना जगा सकते हैं। हालांकि देश में राजा दीन दयाल से लेकर रघुराय, राम रहमान ,ओपी शर्मा, प्रशान्त पँजियार, अशोक दिलवाली, अविनाश पसरीचा , राहुल बेदी, प्रवीण जैन जैसे कई नामी गिरामी छायाकार हैं। नितिन को अगर आगे बढ़ना है तो उन्हें काफी मेहनत करनी होगी। इस फील्ड में प्रतिस्पर्धा कड़ी है। नितिन को एक नई दृष्टि विकसित करनी होगी। फोटोग्राफर की आंख और कोण ही महत्वपूर्ण होते हैं। इससे ही कैमरे की भाषा का जन्म होता है।
विमल कुमार की रिपोर्ट
Posted Date:
June 1, 2025
8:12 am