वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार अनिल त्रिवेदी की कलम से इस बार कुछ पंक्तियां कवियों औऱ उनकी कविताई पर…
कवि कई दिनों से अत्यंत प्रफुल्लित है। दिल बाग-बाग है। प्रसन्नता इतनी कि कवि हृदय बार-बार छलकने को आतुर हो जाता है। कवि जब अत्यधिक खुश होता है तो कविता नहीं लिख पाता। कविता उसे सूझती ही नहीं। वह लिखने की कोशिश अवश्य करता है लेकिन शब्द ही धोखा दे जाते हैं। वह गीत गाने का भी प्रयास करता है पर बोल ही नहीं उचरते। खुशी में कवि मधुर सुर छेड़ना चाहता है लेकिन उसके होंठ नहीं फड़कते। हां, पैर जरूर थिरकने लगते हैं लेकिन वह पैरों की थिरकन रोक लेता है।
आखिर वह कवि है, कविता उसका धर्म है। चाहे जितनी खुशी हो, उसे थोड़ा भी थिरकना नहीं चाहिए। अगर उसके पैर जरा भी थिरके तो लोग कहेंगे यह कैसा कवि है जो नाचने को उत्सुक है। कवि को तो उदास, निराश और मायूस दिखना चाहिए। काव्य का स्रोत तो पीड़ा और निराशा है। दूसरों की पीड़ा न दिखाई दे तो अपना ही दर्द इतना हो जो कविता बनकर फूट सके। बिना पीड़ा के कविता प्रस्फुटित कैसे होगी? दिक्कत है कि इनदिनों प्रसन्नता के सागर में गोते लगा रहा कवि बेबस है। इतना दर्द कहां से लाए जो कविता बनकर प्रवाहित हो सके।
कवि मानता है कि प्रेम कविता का केंद्रीय तत्व है। बिना प्रेम के निबंध, कहानी, नाटक, व्यंग्य वगैरह तो रचे जा सकते हैं लेकिन कविता का सृजन असंभव है। इसलिए कवि प्रेम में पगी कविता ही रचता रहा है। उसकी कविताओं में दीवाना, पागल, इश्क, आंसू और दिल जैसे शब्दों की भरमार है। जब वह मधुर कंठ से प्रेम में ओतप्रोत कविता पढ़ता है तो लोग आह-आह और वाह-वाह कह उठते हैं। देर तक तालियां बजती रहती हैं।
प्रेम की कविताएं लिखते-पढ़ते कवि को एक बार राजनीति से भी गाढ़ा प्रेम हो गया। हालांकि वह परवान नहीं चढ़ पाया। अंत में कवि फिर अपनी कविताओं में लौट आया। बीते साल उसने युवाओं में नया जोश भरने के लिए प्रेम से इतर रचना करने की सोची। पहली लाइन लिखी-अबकी बार आरपार। लेकिन पता नहीं क्यों बार-बार कविता का अंत चार सौ पार पर होता था। कई दिन कवि उलझन में रहा, आखिर उसका कविताई मूड डगमग क्यों हो रहा है। पहले तो ऐसा न था। क्या हुआ जो शब्द दायें भाग रहे हैं। फिर कवि यह सोचकर रह गया कि हवा दायीं ओर बह रही है, संभवत: यह इसी का प्रभाव होगा।
अक्सर गायक के पैर नृत्य करने को फड़कते हैं। अभिनेता का दिल गाने के लिए तड़पता है। किसी संन्यासी को राजनीति मोह सकती है। इसी तर्ज पर कवि का हृदय प्रवचन के लिए मचल उठा। फिर क्या था वह प्रवचन करने लगा। कवि मंच का जादूगर है, इसलिए उसे प्रवचन में भी अपार संभावनाएं दिखीं। जब वह मंच पर खड़े होकर कविता पढ़ सकता है तो मंच पर विराजमान होकर प्रवचन क्यों नहीं कर सकता। और एक दिन कवि फुलटाइम प्रवचनिया बन गया।
कवि जानता है कि हर कोई कविता की समझ नहीं रखता है इसीलिए कविता के श्रोता कम हैं लेकिन प्रवचन के वक्त मूढ़ से मूढ़ भी ध्यानमग्न सा बैठा रहेगा। वह तालियां नहीं पीटेगा तो कम से कम बीच-बीच में सिर तो हिलाता ही रहेगा। वैसे भी प्रवचन की परंपरा पुरानी है। पत्नियां दिन भर पतियों को प्रवचन सुनाती हैं। शिक्षकों की नौकरी विद्यार्थियों के प्रवचन पर ही टिकी है। कर्मचारी अपने बॉस का प्रवचन सुनने को मजबूर हैं और नेता निरंतर अपने प्रवचन से जनता को कृतार्थ करने में लीन हैं।
कुछ बरसों से कवि बहुत चिंतित है कि समाज में धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों का तेजी से लोप हो रहा है। विकास और समृद्धि की ओर दौड़ रहे देश के लिए यह ठीक नहीं है। कुछ भी हो जाए इन मूल्यों की रक्षा अत्यावश्यक है। इसीलिए कवि अपने प्रवचन समारोहों के माध्यम से राष्ट्र के गौरवशाली अतीत और विरासत के प्रति लोगों को जगाने में जुटा है। कवि चाहता है कि प्रेम और विवाह के मामले में युवा दिल के चक्कर में न पड़ें बल्कि संस्कारों और सांस्कृतिक परंपराओं का ध्यान रखें। मां-बाप अपने बच्चों के नाम भी सोच समझकर ऐसे रखें जिन पर गर्व किया जा सके। कोई पुकारे तो देशप्रेम झलके। आदर में सिर स्वत: झुक जाए।
प्रवचन में कवि सम्मेलनों से अधिक श्रोता उमड़ रहे हैं। लोग संस्कृति और संस्कारों के प्रति कितने जागरूक हो पाए हैं यह तो अभी पता नहीं चल सका लेकिन वाह-वाह कहने और तालियां पीटने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्रवचन के ताप से सत्ता भी नरम होकर झुक गई है। कवि तो पहले से झुका हुआ है। सत्ता और कवि दोनों गदगद हैं। कवि में राष्ट्रकवि की उपाधि पाने के सभी गुण आ गए हैं। वह एक दिन राष्ट्रकवि बन जाएगा। कुछ नहीं तो वह सत्ता का अंग तो बनकर रहेगा। मुझे तो पूरा विश्वास है। आप भी विश्वास कीजिए।
अनिल त्रिवेदी
वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार
Posted Date:
March 30, 2025
10:10 am
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