
मैं वही चाणक्य हूँ जिसे आप कौटिल्य भी कहते हो और मुझे विष्णु गुप्त के नाम से भी पुकारते हो। आज मैं बिहार विधानसभा चुनाव होने से पहले राजधानी पाटलिपुत्र से अपना दुख दर्द आपके सामने बयाँ कर रहा हूं। आपको मालूम है कि बिहार में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है और सभी राजनीतिक दलों ने टिकटों की घोषणा भी कर दी है ।इन टिकटो के बंटवारे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच खींचतान और मतभेद भी साम
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भारतीय मूर्तिकारों, शिल्पकारों ने हमारी आधुनिक संवेदनाओं, जीवन और मिजाज को किस तरह पकड़ा है और इन सौ सालों में कला को, समाज को और राष्ट्र को क्या दिया है। पिछले दिनों इस आकलन की कोशिक के तहत प्रोग्रेसिव आर्ट गैलरी और रजा फाउंडेशन ने त्रिवेणी कला संगम की श्रीधरणी आर्ट गैलरी में एक अनोखी प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसमें गत 100 वर्षों की मूर्तिकला को सामूहिक रूप से पेश किया गया। इसे क्यूरे
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निर्भया कांड पर बनी बीबीसी की एक डाक्यूमेंटरी देख रही थी। उनमें से एक आरोपी की मां ने अपने इंटरव्यू में कहा “हमारा बेटा ऐसा नहीं कर सकता। वो तो बहुत अच्छा है।” तब एक कविता लिखी थी “मैं लड़का नहीं जन्मूंगीं” फिर एक नाटक लिखा “यत्र-तत्र-सर्वत्र” उसे करने पर बहुत से लोगों ने कहा तुम भी फंसोगी, हमें भी जूते पड़वाओगी। क्योंकि उस नाटक में पूरी समाजनीति और राजनिति दोनों पर सवाल उठाए गए थे।
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