
मजाज़ की ख़ूबसूरत, पुरसोज़ शायरी के पहले भी सभी दीवाने थे। इतने सालों बाद भी यह दीवानगी क़ायम है. मजाज़ सरापा मुहब्बत थे. तिस पर उनकी शख़्सियत भी दिलनवाज़ थी. सुरीली आवाज़ और पुरकशिश तरन्नुम में नज़्म पढ़ते तो बस उनकी आवाज़ महसूस की जाती, उनका क़लाम सुना जाता. सामयीन उनकी नज़्मों में डूब जाते. बाज़ आलोचक उन्हें उर्दू का कीट्स कहते थे, तो फ़िराक़ गोरखपुरी की नज़र में, ‘‘अल्फ़ाज़ के इंत
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मच्छर आपको हर जगह मिल जाएंगे। इनके लिए कहीं कोई रोक-टोक नहीं। जहां अनुकूल माहौल मिला डाल दिया डेरा डंगर और फैला लिया अपना साम्राज्य। कोई भी मौसम या कोई भी जगह इनके लिए पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। फिर भी जहां इनके रहने, खाने और पीने की सुविधाएं मिलती हैं, वहां चप्पे-चप्पे पर इन्हीं का कब्जा रहता है। अपने यहां मच्छरों के लिए सारी सुविधाएं मौजूद हैं। प्रशासन इनका विशेष ध्यान रखता है।
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पत्थरों पर शिल्प और मूर्तिशिल्पियों की मेहनत से आकार लेती चट्टानें। लखनऊ में इन दिनों कलाकारों और कलाप्रेमियों के लिए इसे जीवंत देखना एक नई अनुभूति है। आठ दिनों तक चलने वाले अखिल भारतीय समकालीन मूर्तिकला शिविर यानी शैल उत्सव में कलाकृतियों को देखने बड़ी संख्या में कलाप्रेमी आ रहे हैं जिससे कलाकारों का मनोबल काफी बढ़ा है। लखनऊ विकास प्राधिकरण के सहयोग से वास्तुकला एवं योजना सं
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महाभारत की तीन सशक्त महिला किरदारों ने जो किया क्यों किया, उनपर सवाल उठाने वालों को जवाब देने की रचनात्मक कोशिश... देश की शीर्ष नृ्यांगनाओं ने 'स्त्री संपंदन ' के ज़रिये नारी हृदय और उनके फैसलों के पीछे की कहानी को समझने और समझाने का किया जीवंत प्रयास ... कथक गुरु शोवना नारायण, मोहिनीअट्टम की गोपिका वर्मा और ओडिसी की शैरोन लॉवेन का 'स्त्री स्पंदन'
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जन सरोकार के कवि सरोज कुमार पाण्डेय के जन्मदिन पर देवरिया में जुटे साहित्यकार, कौशल किशोर से मिलिए कार्यक्रम में कविता पाठ और कविता पर सार्थक बातचीत
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त्तर के दशक में एक युवा अभिनेता बंगाल की धरती से अभिनय की दुनिया में कदम रखता है, पहले क्लासिक फिल्मकार मृणाल सेन उसे पहचान देते हैं, इस पहली ही फिल्म से वह राष्ट्रपति पुरस्कार पाता है और जल्दी ही डिस्को डांसर बनकर युवाओं के दिलों की धड़कन बन जाता है... बात मिठुन चक्रवर्ती की हो रही है जिन्हें अपने जीवनकाल में बेहतरीन फिल्में करने और अभिनय की दुनिया में खास मुकाम बनाने के लिए इस साल का
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लड्डू प्रकरण के बाद चूंचूं अंकल का दिल रह रहकर लड्डुओं के लिए मचल उठता है। मुंह का पानी कतई सूखने में नहीं आ रहा है। हर समय उनके मन में लड्डू फूट रहे हैं। लड्डुओं के प्रति अचानक उमड़ी उनकी प्रीति से घर के बाकी लोग हैरान हैं। रोज घर में आधा किलो लड्डू आते हैं और चूंचूं अंकल शाम तक सब अकेले ही निपटा देते हैं। सुबह फिर लड्डू-लड्डू की रट लगाने लगते हैं। अंकल का लड्डू प्रेम इनदिनों उनके देश
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