कोई भी संस्कृति बगैर कविता के फल फूल नहीं सकती – त्रिलोचन

अबतक जो होता आया है
उसमें जन सम्मान नहीं है
उसमें मानव को मानव के
सुखदुख का कुछ ध्यान नहीं है
उससे व्यक्तिवाद पनपा है
उससे पूंजीवाद हुआ है
इन्हें नष्ट कर शोषित मानव
शाप काट दो जगजीवन का।

                      त्रिलोचन

प्रगतिशील काव्य-धारा के प्रमुख कवि त्रिलोचन शास्त्री को याद करते हुए उनके भीतर के तमाम आयाम एक एक कर सामने आने लगते हैं। उनका लेखन, व्यक्तित्व, जीवंतता, राजनीतिक चिंतन और उनकी जनपक्षधरता। एक विशाल रचना संसार अपने पीछे छोड़कर जाने वाले त्रिलोचन को भले ही साहित्य जगत आज याद न करे लेकिन आज भी उनकी रचनाएं मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं। ये पंक्तियां महज़ एक बानगी भर हैं। 20 अगस्त 1917 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के चिरानी पट्टी में जन्में वासुदेव सिंह कैसे त्रिलोचन बन गए, कैसे गांव के समारोहों के बिरहा और लोकगीतों ने उनके बाल मन पर असर डाला और उनके भीतर कविता औऱ रचनाशीलता का संसार गढ़ गया, ये खुद त्रिलोचन जी ने उनपर बनी अनवर जमाल की फिल्म में बताया है। फक्कड़मिजाज़, मीलों पैदल चलने वाले, भूखे रहकर भी हमेशा मुस्कराने वाले, रेल पटरियों पर घंटों चलने वाले और वहां पड़े गुड़ के एक टुकड़े को भूखे पेट मुंह में डाल लेने वाले त्रिलोचन को लेकर उनके समकक्षों ने अनेकों कहानियां अपने अपने अंदाज़ में कहीं, लेकिन उनके भाषा ज्ञान के अथाह समुद्र का सब लोहा मानते रहे। सुल्तानपुर से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तक पहुंचे और शास्त्री की उपाधि के साथ हिन्दी साहित्य में अपनी अलग जगह बनाने वाले त्रिलोचन जी ने काशी से अँग्रेज़ी और लाहौर से संस्कृत की शिक्षा हासिल करने के साथ साथ अरबी और फ़ारसी भाषाओं का गहन अध्ययन किया।तमाम क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के साथ उनके पास शब्दों का विशाल भंडार था। उन्होंने प्रभाकर, वानर, हंस, आज और समाज जैसी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

अगर केदारनाथ सिंह के शब्दों पर गौर करें तो त्रिलोचन की रचनाओं में एक ओर यदि गाँव की धरती का-सा ऊबड़ खाबड़पन दिखाई पड़ेगा तो दूसरी ओर कला की दृष्टि से एक अद्भुत क्लासिकी कसाव या अनुशासन भी। त्रिलोचन की सहज-सरल-सी प्रतीत होने वाली कविताओं को भी यदि ध्यान से देखा जाए तो उनकी तह में अनुभव की कई परते खुलती दिखाई पड़ेंगी। त्रिलोचन के यहाँ आत्मपरक कविताओं की संख्या बहुत अधिक है। अपने बारे में हिंदी के शायद ही किसी कवि ने इतने रंगों में और इतनी कविताएँ लिखी हों।

गूगल पर तलाशेंगे तो आपको त्रिलोचन के लेखन के बारे में ये जानकारियां मिल जाएंगी।

हिंदी में सॉनेट (अँग्रेज़ी छंद) को स्थापित करने का श्रेय त्रिलोचन को है। सॉनेट के अतिरिक्त उन्होंने गीत, बरवै, ग़ज़ल, चतुष्पदियाँ और कुछ कुंडलियाँ भी लिखी हैं। मुक्त छंद की छोटी और लंबी कविताएँ भी उनके पास हैं। कविता के साथ ही उन्होंने कहानी और आलोचना के क्षेत्र में भी काफी काम किया है। ‘धरती’ उनका पहला कविता संग्रह था जो 1945 में आया था। ‘दिगंत’ (1957), ‘ताप के ताए हुए दिन’ (1980), ‘शब्द’ (1980), ‘उस जनपद का कवि हूँ’ (1981), ‘अरधान’ (1983), ‘गुलाब और बुलबुल’ (1985), ‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’ (1985), ‘तुम्हें सौंपता हूँ’ (1985), ‘फूल नाम है एक’ (1985), ‘चैती’ (1987), ‘सबका अपना आकाश’ (1987), ‘अमोला’ (1990) उनके काव्य-संग्रह हैं। उन्होंने ‘मुक्तिबोध की कविताएँ’ का संपादन किया है। ‘ताप के ताए हुए दिन’ संग्रह के लिए उन्हें 1981 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

हालांकि गूगल और इंटरनेट के तमाम मंचों पर त्रिलोचन जी के बारे में बहुत कुछ आपको मिल जाएगा, लेकिन अफसोस ये है कि मौजूदा दौर में साहित्य जगत की जो दुर्दशा हुई है उसमें इस महान कवि की अहमियत को भी उस तरह नहीं आंका गया, जितना आज के दौर के उन कवियों को जो अपनी मार्केटिंग में पीछे नहीं रहते।

त्रिलोचन ने मेरे साथ एक इंटरव्यू में बहुत सी बातें कीं, ‘मेरे साक्षात्कार’  में आप इसे पढ़ भी सकते हैं। इनमें से कुछ बातें आज फिर से याद करना ज़रूरी है।

वो कहते थे —

कोई भी संस्कृति बगैर कविता के फल फूल नहीं सकती। यदि साहित्य की अन्य विधाएं हरी भरी लताएं हैं तो कविता उन लताओं को और ज्यादा खूबसूरत बनाने वाला फूल है, जिसकी महक से सारा चमन गुलजार हो जाता है।

उनका मानना था –

साहित्य भी परिवर्तनशील है और यदि हम साहित्य में परिवर्तन न लाएँ तो हमारा व्यक्तित्व ही क्या रह जाएगा ? जो लोग परंपरा पर अधिक बल देते हैं, वे नवीनता का विरोध करते हैं। साहित्य या कविता में नई चीज़ों का प्रयोग होने दीजिए।

बहुत सारे लेखकों को उन्होंने पार्ट टाइम साहित्यकार भी कहा था

जहां ऐसे साहित्यकार हों जो दलों के सत्ता में आने पर अपनी विचारधारा तक बदल दें, वे क्या रचना करेंगे? अपना अस्तित्व बचाने के लिए और अपनी महात्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए आज अधिकांश कवियों और साहित्यकारों ने अपना अपना खेमा बना रखा है। इससे साहित्य सृजन को काफी नुकसान पहुंच रहा है और आत्म प्रशंसा की एक अजीब प्रवृत्ति नज़र आती है। आज ढेर सारे लेखक और कवि पार्ट टाइम साहित्यकार हैं।

जाहिर है त्रिलोचन को जानने समझने के लिए उन्हें पढ़ना ज़रूरी है और आज के दौर में उनकी अहमियत का आकलन करना भी ज़रूरी है।

 

♦ अतुल सिन्हा

Posted Date:

August 20, 2025

2:23 pm Tags: , , ,

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