साहित्यकारों, लेखकों के लिए और खासकर साहित्य की सबसे बड़ी अकादेमी के लिए यह विषय अहम है – बदलते दौर में कितना बदला साहित्य। अक्सर इस विषय पर चर्चाएं होती भी रहती हैं, लेकिन इस बार यह खास इसलिए बन गया क्योंकि इसका आयोजन साहित्य अकादेमी ने राष्ट्रपति भवन परिसर के भव्य सांस्कृतिक केन्द्र में हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इसका उद्घाटन किया और संस्कृति मंत्री से लेकर मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी बदलते दौर के साहित्य की चर्चा की। तो क्या अब साहित्य अकादेमी की स्वायत्तता के दावे खोखले हो गए, क्या अकादेमी का भी सरकारीकरण हो गया है, क्या इस आयोजन में 2014 के बाद साहित्य की बदली हुई दुनिया या प्रतिरोध के साहित्य पर कोई बात हुई? साहित्य अकादेमी के इस आयोजन से उठे ऐसे ही कई सवालों पर चर्चा कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार, कवि, लेखक अरविंद कुमार

पिछले दिनों राष्ट्रपति भवन में साहित्य अकादमी द्वारा एक संगोष्ठी आयोजित की गई जिसका विषय था – साहित्य कितना बदल गया है? गत कई दशकों में शायद पहली बार राष्ट्रपति भवन में इस तरह की कोई हिंदी संगोष्ठी आयोजित की गई । यह देखकर अच्छा लगा कि इतने दिनों बाद राष्ट्रपति को भारतीय साहित्य की चिंता सताई। यूं तो हिंदी की दुनिया और भारतीय भाषाओं की दुनिया में इस तरह की संगोष्ठी आयोजित की जाती रही है लेकिन यह संगोष्ठी राष्ट्रपति भवन में आयोजित की गई थी, इसका एक प्रतीकात्मक महत्व है क्योंकि राष्ट्रपति भवन में कोई व्यक्ति कोई गोष्ठी आयोजित नहीं कर सकता अलबत्ता कुछ लोग अपनी किताबों का विमोचन करवाते हैं पर वह भी उतना आसान नहीं जितना शंकर दयाल शर्मा के जमाने में था।

राष्ट्रपति भवन में हिंदी का कोई लेखक सीधे जा नहीं सकता , वह राष्ट्रपति से हाथ नहीं मिला सकता ,बात नहीं कर सकता कुछ पूछ नहीं सकता। राष्ट्रपति भवन के प्रोटोकाल ही ऐसे हैं। ऐसे में इस विषय पर कितनी मुक्त चर्चा हुई होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन सरकार और साहित्य अकादमी ने राष्ट्रपति भवन में संगोष्ठी आयोजित कर एक संदेश देने की कोशिश जरूर की है। आखिर वह संदेश क्या है ? जाहिर है यह संगोष्ठी सरकार की अनुमति से हुई होगी। साहित्य अकादमी जैसे अपने भवन में संगोष्ठी करती है वैसे तो वह राष्ट्रपति भवन में नहीं कर सकती। बेहतर तो यह भी होता कि संगोष्ठी के विषय में यह भी जोड़ दिया जाता कि साहित्य के बदलने के साथ साथ साहित्य अकादमी भी कितनी अब बदल गई है ? पहला बदलाव तो यह दिखता है कि साहित्य अकादमी अब तक सम्मेलन करती थी। अब वह सम्मिलन करने लगी है। अच्छी खासी हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाया गया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह वही साहित्य अकादमी है जो वीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य के जमाने की थी या यू आर अनंतमूर्ति के जमाने की थी। यूं तो यह अकादमी गोपीचंद नारंग के जमाने मे ही बहुत कुछ बदल गयी थी। लेकिन इस साहित्य अकादमी में भी पिछले 20 वर्षों खासकर 2014 के बाद जिस तरह का बदलाव आया है, अगर उसे भी इन विषयों को साथ-साथ जोड़कर बातचीत होती तो यह समग्र बातचीत होती।

इसका एक अलग ही अर्थ होता और उसका भी एक अलग संदेश जाता लेकिन साहित्य अकादमी ने इस विषय को शामिल नहीं किया। इसलिए साहित्य अकादमी से इतर संस्थाओं औऱ संगठनों को इस पर जरूर बात करनी चाहिए कि आखिर हमारी साहित्य अकादमी भी कितनी बदल गई है। यह कितनी हमारी रह गयी है। यह कितनी सरकारी बन गयी है। इसकी कितनी स्वायत्तता बची है। या इसने कितने घुटने टेक दिए हैं, न चाहते हुए भी। हालांकि ये बातें तो अकादमी के भीतर के लोग ही बता पाएंगे लेकिन उम्मीद कम है क्योंकि सबको अपनी नौकरी बचानी होती है। पहली महत्वपूर्ण बात यह है कि साहित्य तभी बदलता है जब उसका समाज बदलता है, लेखकों के विचार बदलते हैं उनकी दृष्टियां बदलती है, उनकी मानसिकता बदलती है और उनके एजेंडे भी बदलते हैं । राष्ट्रपति भवन के कला केंद्र में आयोजित संगोष्ठी में क्या इन सारे पहलुओं पर विचार किया गया ?क्या यह विचार किया गया कि भूमण्डलीकरण और बाजार के आगमन के बाद साहित्य कितना बदल गया है? क्या यह विचार किया गया कि 2014 के बाद हमारा देश कितना बदल गया है, समाज कितना बदल गया , उसकी इकॉनमी कितनी बदल गयी, मीडिया कितना बदल गया ।हमारा साहित्य तो इस तरह के बदलावों से प्रभावित होगा ही। तब क्या इस पर बात नहीं होनी चाहिए कि देश में लेखक समाज के सामने किस तरह की चुनौतियां सामने आयी हैं ?
क्या पत्रकारों की तरह अब लेखकों का भी ध्रुवीकरण हुआ है? क्या लेखकों को भी अब कुछ लिखते हुए डर लगने लगता है कि कहीं उन्हें भी कुछ लिखने पर परेशान ना किया जाए क्योंकि जिस तरह पिछले 10 वर्षों में बहुत सारे पत्रकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को अभिव्यक्ति की आजादी के कारण परेशान किया गया, उसे देखते हुए अब हिंदी के लेखकों के सामने भी यह समस्या खड़ी हो गई है कि वह क्या लिखे और क्या ना लिखें। इन दस सालों में हिंदी की दुनिया में प्रतिरोध का साहित्य भी काफी कुछ लिखा गया है लेकिन क्या राष्ट्रपति भवन में किसी वक्ता ने उसका जिक्र किया। क्या उन्होंने बताया कि अब साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलने पर कोई लेखक उसे लौटा नहीं सकता। उसे पुरस्कार लेते समय शपथ लेनी पड़ेगी और लौटाने पर जुर्माना लगेगा। शायद ही किसी देश में यह नियम हो। क्या उन्होंने बताया कि इस सरकार के कार्यकाल में कागज़ और डाकखर्च इतना बढ़ गया है कि प्रकाशन मुश्किल है। हमारे साहित्य की संस्कृति भी इस रूप में बदल रहा है। शायद इसलिए लेखकों को प्रतिरोध का साहित्य लिखना पड़ रहा है। क्या उस संगोष्ठी में उन वक्ताओं में किसी ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में हमारे देश में हिंदू मुस्लिम की राजनीति चल रही है और नफरत की राजनीति तथा सांप्रदायिकता का जहर फैल रहा है। क्या किसी ने बताया कि इन मुद्दों का साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है? यह सच है कि उस संगोष्ठी में स्त्री विमर्श पर भी चर्चा हुई .21 वीं सदी स्त्रियों के साहित्य की सदी है। प्रतिभा राय जैसी लेखिका ने तो स्त्री लेखन को एक अलग इकाई मानने से इनकार कर दिया लेकिन महुआ मांझी जैसी लेखिका ने यह जरूर कहा कि स्त्री लेखन पितृसत्त्ता का विरोधी है ना कि वह पुरुषों का विरोधी है। महुआ ने काफी समझदारी भरी बातें की लेकिन क्या किसी ने यह सवाल उठाया कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नारे के बाद भी समाज में स्त्रियों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है और कट्टरता भी बढ़ी है। बाजार ने स्त्रियों को एक उपभोक्ता वस्तु के रूप में तब्दील कर दिया है। आखिर हमारी सत्ता इन सवालों पर मौन क्यों हैं। क्या साहित्य इन सवालों से बचा जा सकता है? क्या लेखक और लेखिकाओं को इस मसले पर नहीं बोलना चाहिए था। क्या राष्ट्रपति ने जो खुद एक स्त्री हैं औऱ वंचित समाज से आती हैं, कुछ ऐसा कहा जो दस वर्षों के झूठ का पर्दाफाश करता हो। बहरहाल गोष्ठी में जो मुख्य बातें कहीं गयी वह यत्र तत्र आ गयी हैं। साहित्य अकादमी के सेमिनार में आदिवासी दलित और मुस्लिम लेखकों का प्रतिनिधत्व नहीं था या कम था या उचित नहीं था।अधिकतर वे चेहरे थे जो साहित्य अकादमी के इर्द गिर्द चिपके होते हैं या मंडराते रहते हैं।
ऐसे में साहित्य में हुए बदलाव को वस्तुपरक ढंग से नहीं रखा जा सकता है। जिस तरह लेखकों ने सोशल मीडिया में अपने फोटो लगाए उससे तो यह गोष्ठी सैर सपाटा अधिक लगती है। किसी ने कायदे से एक रपट भी नहीं लिखी, इससे अंदाज़ लगाया जा सकता है कि वे आत्म प्रदर्शन में अधिक थे।
Posted Date:
May 31, 2025
11:17 pm