प्रयाग शुक्ल के रेखांकन की भाषा

…. प्रयाग शुक्ल के ये रेखांकन रेखा या रेखाओं की भाषा में कविता भी हैं और आलोचना भी।  कला समीक्षा में लंबे समय तक सक्रिय होने के कारण आलोचक में भी  वो अंतश्चेतना आ सकती जो किसी कलाकार में होती है। वैसे उच्च स्तर की कला और उच्च स्तर के कला लेखन में कोई तात्विक भेद नहीं होता। दोनों एक तरह से सृजन हैं और इसी कारण दुनिया के बड़े कवि कला-आलोचक भी हुए हैं।….

♦ रवीन्द्र त्रिपाठी

इस कोरोना काल में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर तालाबंदी (लॉकडाउन) हुई है। लेकिन दूसरे स्तर पर तालाखुलंदी भी हुई है। ये कला और साहित्य  के स्तर पर हुआ है। कलाकार और साहित्यकार का मन किसी भी स्थिति में, तालाबंदी में भी, कैद नहीं रह सकता है और एकांत में भी अच्छी कलाकृतियां रची जा सकती हैं। ऐसा पहले भी हुआ है और इस कोरोना काल में भी हो रहा है। साहित्य में फेसबुक लाइव के माध्यम से नए प्रयोग हो रहे हैं और कई ऐसे कलाकार हैं जो समकालीन समय में उपजी दुश्चिताओं को अपनी कला के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैं और उनकी कलाकृतियां फेसबुक और सोशल मीडिया के दूसरे माध्यमों पर दीख रही हैं। ये भी एक कला परिघटना है जिसकी तरफ बाद में इस स्तंभ में विस्तार से चर्चा होगी।

पर कुछ और भी हो रहा है। जो कवि या कला आलोचक हैं वे भी कला-सक्रिय हुए हैं। इनमें एक बड़ा नाम है प्रयाग शुक्ल का। प्रयाग जी हिंदी में कविता और कला के सेतु रहे हैं। पर इन दिनों जब बाकी लोगों की तरह वे भी अपने आवास में रहने को मजबूर हैं, वे लगातार रेखांकन कर रहे हैं। उनके कई रेखांकन सोशल मीडिया, ह्वाट्सअप,  पर सार्वजनिक हो चुके हैं। हालांकि ये भी ध्यान में रखना होगा कि कला मर्मज्ञ प्रयाग शुक्ल की कला सक्रियता तात्कालिक नहीं है बल्कि दशको पुरानी है। वे कई साल से रेखांकन कर रहे हैं। लेकिन जिस निरंतरता के साथ वे इस दिशा में लगातार सक्रिय हुए हैं वो कोरोना काल का ही है जिसमें वे प्रतिदिन सुबह छह बजे उठने के बाद नोएडा के अपने फ्लैट की बालकनी में आ जाते हैं और वहां से सामने दृश्य या दृश्यों को देखते हैं। हाल के उनके जितने रेखांकन हैं वे एक तरह के भूदृश्य ही हैं।

लेकिन ये भूदृश्य मूर्त नहीं हैं। बल्कि उनको अमूर्तन की तरफ ले जाया गया है। और इस अमूर्तन की वजह से इन रेखांकनो में विशिष्ट तरह की एक सार्वजनीनता भी आ गई है।  इस मायने में कि ये सिर्फ नोएडा की किसी बहुमंजिली इमारत से देखे गए दृश्य भर नहीं रह जाते बल्कि मुंबई, बंगलुरु या दूसरे बड़े शहरों के दृश्यों की अनुभूति भी इसमें हो सकती है। दूसरे शब्दों मे कहें तो ये रेखांकन `सिटीस्केप’ भी हैं। यानी .यहां महानगरी जीवन की भी अनूभूति होती है। दूर से देखा गए किसी पेड़ की झलक, किसी अकेले व्यक्ति की छाया, धूसर दिखती जमीन का कोई टुकड़ा- ये सब यहां हैं। लेकिन लोग नहीं हैं। ओर वे हो भी नहीं सकते क्योंकि आज के कोरोना समय में आप अपने मकान या फ्लैट की खिड़की या बालकनी से कोई दृश्य देखें तो उसमें व्यक्ति दिखेंगे भी नहीं। इक्का दुक्का छोड़कर। (हालांकि बाहर लोग हैं लेकिन पैदल अपने घरों की तरफ लौटते हुए, पर ये अलग मसला है) ज्यादातर लोग अपने अपने घरों मे हैं। इस लिहाज से प्रयाग शुक्ल के ये ऱेखांकन, उस चुप्पी की साथ जो उनके व्यक्तित्व की  खासियत भी है, कोरोना काल के भारतीय महानगरों के जीवन का साक्ष्य भी हैं। हालांकि इसे जीवन कहा जाए इस पर आपत्ति भी हो सकती है। क्योंकि जीवन है कहां? बाहर तो नहीं दिखता। वो तो घरो में है। पर इसी का दूसरा पहलू ये भी है कि हमारे महानगरों में उजाड़ पसर गया है।

प्रयाग शुक्ल के ये रेखांकन रेखा या रेखाओं की भाषा में कविता भी हैं और आलोचना भी।  कला समीक्षा में लंबे समय तक सक्रिय होने के कारण आलोचक में भी  वो अंतश्चेतना आ सकती जो किसी कलाकार में होती है। वैसे उच्च स्तर की कला और उच्च स्तर के कला लेखन में कोई तात्विक भेद नहीं होता। दोनों एक तरह से सृजन हैं और इसी कारण दुनिया के बड़े कवि कला-आलोचक भी हुए हैं। बहरहाल, ये सब कला चितन का विषय है। फिलहाल इतना ही रेखांकित करना पर्याप्त होगा कि प्रयाग शुक्ल के ये रेखांकन मौजूदा महानगरीय हालत पर बारीक मगर गहन अंतदृष्टि वाली टिप्पणियां भी है।

Posted Date:

May 25, 2020

8:07 pm

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