रंगमंच की दुनिया में लगातार कुछ न कुछ नए प्रयोग होते रहे हैं और तमाम ऐसे रंगकर्मी हैं जो कई चर्चित नाटकों का हिन्दी रुपांतरण करके पेश करते रहे हैं। खासकर फ्रांसीसी नाटक रंगकर्मियों की पसंद रहे हैं। फ्रांसीसी नाटककार मोलिएर सत्रहवीं शताब्दी के बड़े नाटककारों में रहे और पेरिस में जन्में मोलिएर आम तौर पर अपने कॉमेडी नाटकों और बैले के लिए जाने जाते थे और उनके नाटकों ने रंगमंच की एक नई परिभाषा लिखी। फ्रांसीसी साहित्य में मोलिएर का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है।
21 साल की उम्र से मोलिएर ने खुद को नाटकों के लिए समर्पित कर दिया और तीस सालों के अपने नाट्य जीवन में सौ से ज्यादा नाटक किए। 35 नाटक उन्होंने खुद लिखे। जीवन के तमाम संघर्षों के बीच मोलिएर ने सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में अपनी ऐसी पहचान बनाई जिसने फ्रांस के रंग जगत में हलचल मचा दी। 51 साल की उम्र में मोलिएर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। भारत में भी तमाम रंगकर्मी मोलिएर के नाटक अक्सर मंचित करते हैं। नाटकों की समीक्षाएं भी लिखी जाती हैं लेकिन नाटककार के बारे में कम ही लोग जान पाते हैं। ज्यादातर संस्थाएं औऱ रंगकर्मी उस नाटक की कथा और उसके इम्प्रोवाइजेशन के साथ साथ कलाकारों के अभिनय तक ही केन्द्रित रहते हैं। बेशक हर नाटक से पहले संस्था को नाटककार के बारे में भी दर्शकों को बताना चाहिए और उसकी प्रस्तुति और मौजूदा संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता की भी बात होनी चाहिए, संक्षेप में ही सही। बहरहाल वरिष्ठ रंग समीक्षक हरिंदर राणावत ने 7 रंग के पाठकों के लिए मोलिएर के एक चर्चित नाटक के मंचन की रिपोर्ट भेजी है। आप भी पढ़िए ये रिपोर्ट और अपनी प्रतिक्रिया भी दीजिए।
गुरुग्राम स्थित नाट्य संस्था ‘रंग परिवर्तन’ की ओर से रविवार 3 अगस्त को मोलिएर के नाटक ‘द मॉक डॉक्टर’ के हिंदी रूपांतरण ‘आदाब अर्ज है’ की प्रस्तुति प्रेक्षकों के लिए अविस्मरणीय रंग-अनुभव रही।
फ्रांसीसी नाटककार मोलिएर का यह नाटक मानवीय मन की मूलभूत भावनाओं को हास्यपूर्ण और संवेदनशील ढंग से सामने लाता है। वरिष्ठ रंगकर्मी महेश वशिष्ठ के निर्देशन में यह प्रस्तुति आंगिक अभिनय के प्रभावपूर्ण निरूपण के लिए भी याद रहेगी। अभिनेताओं की शारीरिक चेष्टाओं, गतियों और मुद्राओं का यह नयनाभिराम संयोजन ही था कि प्रस्तुति के अंत में मंत्रमुग्ध दर्शकों ने देर तक ताली बजाकर अभिनेताओं और निर्देशक का अभिवादन किया।
नाटक की कथावस्तु संक्षेप में यूं है कि जुबेदा का शराबी पति और पेशे से नाई जुम्मन उसे मारता पीटता है। जुबेदा बहुत परेशान रहती है। आजिज जाकर वह पति को पिटवाने की ठान लेती है। इसके लिए उसे मौका तब मिलता है जब दो व्यक्ति उसे मिलते हैं जो किसी ऐसे काबिल डॉक्टर की तलाश में निकले हैं जो उनके मालिक की गूंगी हो चुकी बेटी का इलाज कर सके। जुबेदा दोनों से कहती है कि नजदीक ही एक नाई है, जो असल में बहुत काबिल डॉक्टर है लेकिन मुश्किल यह है कि वह अपनी काबिलियत की बात आसानी से कबूल नहीं करता। जब उसकी अच्छी खासी पिटाई की जाए, तब जाकर वह यह बात मानने को तैयार होता है। जुबेदा डॉक्टर की काबिलियत का बखान करते हुए दो-चार ऐसे किस्से भी बताती है कि कैसे गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीज उस डॉक्टर ने ठीक कर दिए।
बहरहाल, दोनों व्यक्ति जाते हैं, जुम्मन की पिटाई होती है, वह मान जाता है कि वह बहुत काबिल डॉक्टर है और गूंगी लड़की का इलाज करने के लिए रईस के घर पहुंचता है।
नाटक का अंत सुखद है। रईस की गूंगी बेटी की आवाज लौट आती है और उसकी शादी अपनी पसंद के लड़के से हो जाती है लेकिन इस सुखद अंत तक पहुंचने के दौरान नाटककार ने जो ताना-बाना बुना है और निर्देशक ने इस ताने-बाने को, बिना किसी मंच सज्जा (खाली मंच) और बहुत साधारण प्रकाश व्यवस्था के साथ जिस सुगठित और प्रभावपूर्ण तरीके से पेश किया है, वह रंग-अनुभव प्रेक्षकों को लंबे समय तक स्मरण रहेगा।
प्रस्तुति का एक और उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि सभी अभिनेताओं-अभिनेत्रियों ने अपने पात्रों के साथ न्याय किया।
मयंक शेखर की भूमिका में जुम्मन, प्रीति (जुबैदा), विकास (लल्लन), यश कौशिक (हिकमतुल्लाह), अमित मिश्रा (फखस्त), सुधीर सोलंकी (गुलमेख), एकता शुक्ला (फातिमा), यशिका वशिष्ठ (शमीम), यश (आशिक अली) का अभिनय बेजोड़ रहा। प्रकाश व्यवस्था तरुण की थी और संगीत का जिम्मा कपिल के पास था।
Posted Date:August 4, 2025
8:32 pm Tags: आदाब अर्ज़ है, मोलिएर, नाटक आदाब अर्ज़ है, महेश वशिष्ठ, रंग परिवर्तन