नवजागरण की नायिका हरदेवी जेल जानेवाली पहली लेखिका थी

 

इलाहाबाद 5 मार्च। सीमांतिनी उपदेश की लेखिका हरदेवीं जेल जाने वाली पहली लेखिका  थी और स्त्री लेखकों को शामिल किए   बिना हिंदी नवजागरण अधूरा है। देश की  जानी  मानी  स्त्री विमर्शकारों ने आज इलाहाबाद विश्विद्यालय शताब्दी समारोह के अंतर्गत स्त्री विमर्श पर  आयोजित दो दिवसीय समारोह में यह बात कही।

 हैदराबाद विश्विद्यालय के हिंदी विभाग की शिक्षिका डॉ. चारू सिंह ने   नवजागरण काल में स्त्रियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि  सीमांतनी उपदेश की लेखिका हरदेवी आज़ादी की लड़ाई में जेल जानेवाली पहली लेखिका थी और उन्होंने 1881 में सहवास संबंधी कानून बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उन्होंने भारत भगिनी पत्रिका को  पहली स्त्री संपादित पत्रिका बताते हुए कहा की इतिहास में  कई ऐसी गुमनाम महिलाएं हैं जिन्हें मुख्य धारा में लाना बाकी है।

मेरठ विश्विद्यालय में प्रो. प्रज्ञा पाठक ने कहा कि स्त्री लेखिकाओं को शामिल किए बिना हिंदी नवजागरण अधूरा है। इलाहाबाद से निकलने वाली स्त्री दर्पण पत्रिका जो रामेश्वरी नेहरू द्वारा निकाली जाती थी।इस पत्रिका में स्त्री समस्याओं पर प्रगतिशील वैचारिकी के साथ स्त्री को नैसर्गिक अधिकार दिलाने का संकल्प था।लेकिन स्त्री दर्पण पर और गृहलक्ष्मी पत्रिका पर बात नहीं होती। नवजागरण के संदर्भ में भारतेंदु का तो उल्लेख बारंबार होता है लेकिन उसी समय की लेखिका मल्लिका पर हम बात नहीं करते हैं।

दिल्ली विश्विद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर प्रो. सुधा सिंह ने कहा कि यदि स्त्रियों के लेखन को भी नवजागरण में शामिल किया जाता तो इसकी दिशा और दशा दोनों अलग होती।स्त्री लेखन के सामने न सिर्फ ब्रिटिश चुनौती थी बल्कि सामाजिक आंतरिक चुनौतियां भी थीं। जागरण युक्त स्त्री और नवजागरण में गुणात्मक अंतर है।भक्तिकाल को जहां स्वर्ण युग कहा जाता है वहीं स्त्रियों ने इसे वैराग्य काल कहा। धर्म ने स्त्रियों पर प्रतिबंध लगाने का काम किया।जबकि वर्तमान समय विज्ञान और प्रज्ञा का है।

 दिल्ली विश्विद्यालय में इतिहास विभाग की प्रो. चारू गुप्ता ने हिंदी नवजागरण पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि हमे जरूरत है यह देखने की, कि हिन्दी नवजागरण स्त्रियों के पक्ष में किस प्रकार खड़ा था। विरोधाभासों पर ध्यान आकृष्ट करने की जरूरत है। पत्रिकाओं में उद्धृत कार्टून्स जिसमें यौन शास्त्र और घरेलू शिक्षा दी जाती थी ,इसका जिक्र किया। पर्दा विमर्श आज के दौर का एक ज्वलंत मुद्दा है।कई बार इसे संस्कृति और सम्मान का प्रतीक माना जाता है तो कई बार इसे स्वतंत्रता का पर्याय।

संयोजकीय  वक्तव्य देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो.लालसा यादव ने कहा कि हिंदी विभाग के  शताब्दी वर्ष के आयोजन क्रम में विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया है जिसमें प्रेमचंद पर  संगोष्ठी हुई है।’स्त्री साहित्य: विविध आयाम’ पर यह दूसरी महत्वपूर्ण संगोष्ठी है।इसके साथ ही दयानंद सरस्वती पर एक संगोष्ठी आयोजित होने वाली है।

 उन्होंने  इस बात पर जोर दिया कि सामाजिक परिवर्तन के साथ स्त्री के सरोकारों और दृष्टिकोण में भी आमूलचूल परिवर्तन हुआ है।पहले  जहां स्त्री की आज़ादी घूंघट से थी फिर यह यात्रा बढ़ती हुई अन्य आधुनिक सरोकारों तक आई है।यह यात्रा परंपरागत आजादी से आधुनिक समय और अब उत्तर आधुनिक समय की भी यात्रा है।

उन्होंने साहित्यकार अनामिका की कविता को उद्धत करते हुए कहा कि एक स्त्री को हमेशा से एक ऑब्जेक्ट के रूप में ही देखा गया है। उसे हमेशा एक कागज की तरह ही पढ़ा गया, पितृसत्ता हावी रही है।स्त्री की संवेदनाओं को कभी भी तवज्जो नहीं दिया गया।

उंन्होने कहा कि आधुनिक समय में एक स्त्री जब सेक्स के लिए मना करती है; तो इस देहमुक्ति के सवाल को व्यभिचार से जोड़ दिया जाता है। सौंदर्य को केंद्र में रखकर कहा कि एक स्त्री को हमेशा इसी सौंदर्य का आदर्श और मानक दिखाकर भ्रमित रखा गया है।

उन्होंने यह भी सवाल खड़ा किया कि  ‘ ‘एक औरत का गहना पुरुष के लिए तौहीन क्यों हैं? ‘महिला साहित्यकारों पर बात करते हुए कहा कि मध्यकाल में पद्मा,उमा जैसी स्त्री लेखिका भी रचना कर रही थी।ये महिला रचनाकार तुलसी और  मध्य काल के अन्य बड़े कवियों के साथ, समान बल्कि पहले से ही रचना कर रही थी,लेकिन इन्हें मुख्य धारा में पुरुषों जैसे नहीं तवज्जो नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय नेट क्रांति और सूचना क्रांति का दौर है।वैश्वीकरण के दौर में एक स्त्री को विज्ञापनों में वस्तु के रूप में परोसा जा रहा है।

 इस समय में जरूरत है कि स्त्री विमर्श अपने लक्ष्य से भटक न जाए।जरूरत है  कि स्त्री को ब्यूटी विथ ब्रेन समझा जाए।यह भी कहा कि वर्तमान समय में यह समझने की जरूरत है कि पितृसत्त्ता एक वैचारिकी है।पितृसत्ता सिर्फ पुरुषों में ही होती है यह धारणा बहुत ही नकारात्मक और गलत है।

संगोष्ठी का बीज वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार  जया जादवानी ने कहा कि आज इक्कीसवीं सदी में भी मुट्ठी भर स्त्रियाँ ही है जो वास्तविक रूप से खुद से अपने निर्णय लेने के आज़ाद हैं।स्त्री हमेशा से ही नैसर्गिक हक के लिए संघर्षरत रही है।

ये वहीं नैसर्गिक अधिकार हैं जो पुरुषों को उपलब्ध रहे हैं। कुछ औरतें जो हर क्षेत्र चाहे वह शिक्षा हो, सिनेमा हो,या अन्य हों आज अपना परचम लहरा रही हैं।उनके इस हासिल के पीछे नरकीय जीवन रहा है।जिसे तोड़कर वो आगे बढ़ीं है।यह मकाम कभी भी आसान नहीं रहा। रुकैया शेखावत की कहानी ‘सुलताना का सपना’ का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें लेखिका ने एक पुरुष को चारदीवारी में एक स्त्री की ही भांति रखकर कहानी बुनी है।

 वनमाली के नवोदित कथाकार अंक का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें कई नई लेखिका उभर कर आई हैं जिनकी रचनाओं को पढ़ना चाहिए।

 उन्होंने कहा कि अब समय तेजी से बदलकर आज इक्कीसवीं सदी में पहुंच गया है।इस समय काल में हर क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है लेकिन स्त्री के प्रति आज भी नजरिया कमोबेश वैसे ही है।यह एक विडंबना है।स्त्री के प्रति पुरुष नजरिया भी बदलना जरूरी है। जरूरी है कि पुरुष स्त्री को एक ऑब्जेक्ट न समझकर उसकी संवेदना को भी समझे।इसके साथ स्त्री भी यह समझे कि उसका संघर्ष पितृसत्ता से है न कि पुरुष से। स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं।इनके सहभागिता से ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता है।

 इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलसचिव और संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि प्रो. आशीष खरे  ने कहा कि ‘स्त्री साहित्य: विविध आयाम’ विषय पर बात करना सिर्फ स्त्रियों पर बात करना नहीं है। हिंदी के योगदान में अन्य विभागों के प्रोफेसर ने अपना योगदान दिया है।जिसमे हरिवंश राय बच्चन, फिराक गोरखपुरी का नाम उल्लेखनीय है।

उन्होंने  प्रेमचंद के उपन्यास गोदान का जिक्र करते हुए कहा कि इस उपन्यास में धनिया कई बार होरी से ज्यादा   दृढ़ संकल्प है।वह डरती नहीं है बल्कि लड़ती है। धनिया कहीं ज्यादा अपने विचारों में आधुनिक और तार्किक है।

भोजनंतराल के बाद  ‘स्त्री वैचारिकी और स्त्रीवादी आलोचना’ विषय पर द्वितीय सत्र  में

 डॉ सुप्रिया पाठक हिंदी के कई रचनाकारों के लिए गए साक्षात्कार की बात के आधार पर यह कहती हैं कि स्त्रीवादी आलोचना का मतलब है कुछ दिखाना और कुछ छिपाना। स्त्रीवाद यह मानता है कि स्त्रियां भी मनुष्य हैं, स्त्रीवादी चेतना विमर्श हमारे समाज  में रची बसी बहुत पुरानी परंपरा है। इस आलोचना परंपरा की तलाश में हमें लोकवृत्त की तरफ जाना होगा। वे पवन किरण और सविता सिंह के कविता संग्रह के माध्यम से अपनी बात समाप्त करती हैं।

अगली वक्ता डॉ. अर्चना सिंह कहती हैं 20 वीं सदी में कई छोटे – छोटे मंच तैयार  किए जा रहे थे, जो महिलाओं को बात करने का मंच प्रदान कर रहा था। वे अपनी बात के दौरान महादेवी वर्मा की बात करती हैं और ये कहती हैं कि स्त्री विमर्श की बात के दौरान महादेवी वर्मा की बात तो होती है परन्तु उनके श्रृंखला की कड़ियां निबंध संग्रह की बात बहुत कम होती है । महिलाओं का ज्ञान लोक की दुनिया में अधिक था । वे वैलेडिटी और न्यूट्रियलिटी  को स्त्री विमर्श के नजरिए से बात करके अपनी बात समाप्त करती हैं।

 अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो. जगदीश चतुर्वेदी ने कहा स्त्री साहित्य पर यह हमारा पहला और अंतिम सेमिनार है । वे कहते हैं स्त्री आलोचना की पहली शर्त है स्त्री अनुभूति का होना । हिन्दुस्तानी स्त्रियों की परंपरा विचारवान स्त्रियों की परंपरा रही है।

वे कहते हैं मै अक्सर मंदिर में बैठता हूं क्योंकि वहां बैठकर स्त्रियों से संवाद करने का सबसे बड़ा अवसर है। स्त्री को शरीर में नहीं अनुभति में देखना चाहिए।

भक्तिकाल में कबीर को पीछे करते हुए वे कहते हैं उमा और पार्वती नामक दो महिलाओं ने भक्तिकाल के उदय की बात सबसे पहले की है।

वे कहते हैं स्त्री जो कुछ भी लिखती है अच्छा , खराब , बढ़िया, रद्दी वह सबकुछ प्रकाशित होना चाहिए। कृष्णा सोबती एकमात्र ऐसी महिला लेखिका हैं जो सैद्धांतिक लेखन करती हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया आज सभी धारणाओं को प्रभावित किया है इसी बात के माध्यम से अपनी बात समाप्त करते हैं।

Posted Date:

March 5, 2025

10:06 pm

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright 2024 @ Vaidehi Media- All rights reserved. Managed by iPistis