पिछले दिनों दिल्ली के श्रीराम सेंटर में My son is rapist नाम का नाटक खेला गया। इसकी निर्देशक और लेखक सुनीता योगेश अग्रवाल से वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार की बातचीत:
सुनीता अग्रवाल कहती हैं कि एक नाटककार होने की हैसियत से मेरी ये जिम्मेदारी बनती है कि मैं इन मुद्दो पर बात करुं या इनको अपनी लेखनी और नाटक के माध्यम से उठाऊं भी। सुनीता योगेश अग्रवाल एक लेखिका भी हैं इनकी किताब औरत औरत का फ़र्क को सिर्फ़ महिलाओं या पुरुषों को ही नहीं पसंद आई बल्कि युवाओं ने भी उसे हाथों हाथ लिया।

आपको “माए सन इज़ रेपिस्ट” जैसा नाटक करने का आईडिया कहां से आया?
निर्भया कांड पर बनी बीबीसी की एक डाक्यूमेंटरी देख रही थी। उनमें से एक आरोपी की मां ने अपने इंटरव्यू में कहा “हमारा बेटा ऐसा नहीं कर सकता। वो तो बहुत अच्छा है।” तब एक कविता लिखी थी “मैं लड़का नहीं जन्मूंगीं” फिर एक नाटक लिखा “यत्र-तत्र-सर्वत्र” उसे करने पर बहुत से लोगों ने कहा तुम भी फंसोगी, हमें भी जूते पड़वाओगी। क्योंकि उस नाटक में पूरी समाजनीति और राजनिति दोनों पर सवाल उठाए गए थे। तो उसे छोड़ना पड़ा। फिर काफी साल के अंतराल के बाद मैंने “माए सन इज़ रेपिस्ट” फिल्म लिखी। पर बजट ना होने के कारण वो नहीं बना पाई। पर मुझे इस विषय को किसी ना किसी पटल पर लाना तो था ही तो नाटक के स्वरुप को ही चुना। नाटक की सफलता ने बता दिया कि लोग ऐसे विषयों पर बात करना चाहते हैं। और एक नाटककार होने की हैसियत से हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम समाजिक विषयों पर काम करें जिससे समाज को जागृत किया जा सके। लोगों के मन में इस नाटक को लेकर बहुत सारे सवाल थे कि क्या होगा इसमें? इस विषय को कैसे हैंडल किया जाएगा? क्या परिवार के साथ बैठकर हम ये नाटक देख पाएगें? कुछ ऐसे दृश्य होगें जो मंच पर देखने लायक ना हों? तो एक लेखक होने की हैसियत से मेरी ये भी जिम्मेदारी थी कि मैं इन सब बातों का ख्याल रखूं। अगर इस नाटक को आप पढ़ेगें या देखेगें तो इस नाटक में एक दो जगह ही मैंने रेप शब्द का इस्तेमाल किया है वरना ज्यादती या जबरदस्ती जैसे शब्दों को लिया गया है। नाटक देखने के बाद लोगों का यही रिस्पोंस था कि बहुत अच्छे ढंग से नाटक के विषय को हैंडल किया गया है और दर्शकों को बात करने के लिए शब्द मिले हैं। वरना तो हम अपने बेटे से पूछते तक नहीं हैं कि वो कल रात कहां था? हम उनसे ये नहीं कह पाते कि अगर ऐसी कोई भी हरक़त हुई तो हम तुम्हारा साथ नहीं देगें?
आपने इस नाटक में क्या संदेश देने का प्रयास किया है?
नाटक में ये संदेश देने का प्रयास किया है कि अगर उनका बेटा ऐसी कोई हरक़त करके आता है तो उनमें इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि वो अपने बेटे को बचाने की बजाय सख़्त से सख़्त सज़ा दिलवाएं। अगर उसे एक बार ये पता चल गया कि मेरे इस कुकर्म में मेरा कोई साथ नहीं देगा तो फिर उसकी हिम्मत नहीं होगी कि वो ऐसा दोबारा करे।
क्या लड़कों की परवरिश में गड़बड़ी या समाज की मानसिकता या न्याय प्रणाली की ढिलाई या पुलिस का खौफ़ नहीं?
ये तीनों बातें तो हैं हीं पर प्रमुख बात ये है कि घर से लेकर बाहर तक हम लड़कियों को रिस्पेक्ट देना नहीं सिखाते। बहन को भाई तंग करता है या उसके साथ बदतमीज़ी कर जाता है तो ये कहकर बहन को समझा दिया जाता है कि भाई है, भाई तो ऐसे ही होते हैं। यहां लड़के का हौसला बढ़ जाता है। बाहर किसी लड़की को तंग कर आया उसने शिकायत की तो मां हल्के से ये कहकर कि “अच्छा मैं डांटूंगीं उसे” ये कहकर अपना पीछा छुड़ा लेती है। या उसके सामने दो चार थप्पड़ मारके दिखा देती है कि हम कितने स्ट्रिक्ट हैं पर अकेले में बैठकर उसे इस बात का एहसास नहीं कराते कि ऐसा करने से आगे क्या-क्या झेलना पड़ सकता है। लाज़मी है कि लड़के की हिम्मत एक क़दम और बढ़ जाती है। अपने घर में अपनी मां के साथ पिता का व्यवहार ठीक नहीं है। तो उसे यही समझ में आता है कि औरत को तो ऐसे ही रखा जाता है। तो वो अपनी पत्नी को भी वैसे ही रखता है जैसे पिता ने मां को रखा था। तो सोचिए जब हमें पता ही नहीं है कि अपने घर में अपनी बहन, मां, भाभी की इज़्ज़त होनी चाहिए तो बाहर की लड़की की क्या इज़्ज़त करेगें। बाहर तो उन्हें हर लड़की अवेलेबल ही लगेगी। मेरे नाटक का एक डायल़ॉग है , “रस्ता चलती मीट की दुकान हैं ना लड़कियां। उठाया उनका गोश्त नोंचा, चबाया और फेंक दिया किसी नाले के सामने। किस्मत अच्छी हुई तो उस चिथड़े हुए शरीर को कोई उसके घर छोड़ आएगा वरना तो रास्ते के कुत्ते उस ज़िंदा मांस के लोथड़े को अपने दांतों, हाथों में फंसाए उसके साथ खेलते नज़र आएगें।”
यही वास्तविकता है। वैष्णों देवी जाकर माता के पैरों में जरुर लोट आएगें।। कंजको को बिठाकर उनके पैर पूजेगें। ये संस्कार भी घर में ही देखे हैं। तो अपनी बहन-बेटी की इज़्ज़त करना अगर घर में देखेगें तो बाहर भी उन्हें लगेगा कि हां इन्हें इज़्ज़त और प्यार देना हमारा परम कर्तव्य है।
आपने पहले किन-किन विषयों पर नाटक किए हैं?
बावरामन थियेटर ग्रुप अभी 14 मई 2023 में बना था जिसके तहत हमने कुछ पांच नाटक किए हैं। सभी ज्वलंत समस्या को उठाए हुए हैं। जैसे “वो सुबह कभी तो आएगी” हमारे पुलिस प्रशासन पर सवाल उठाता है कि अगर कोई नुक्कड़ नाटक करता हुआ लड़का उनकी गोली से मारा जाता है तो अपनी ग़लती को छिपाने के लिए उस लड़के को आंतकवादी करार दे दिया जाता है और उसके मां-बाप न्याय की मांग करते-करते थक जाते हैं। और अंत में धरने पर बैठ जाते हैं इस आस में कि कभी तो वो सुबह आएगी जब उन्हें भी न्याय मिलेगा।
“बजट बदमाश” एक व्यंग्यात्मक नाटक जिसके अक्षरा थियेटर में दो शो किए गए। इस नाटक में गांव वालों को पता चलता है कि उनके गांव में पांच किलोमीटर सड़क बनने का बजट पास हुआ है। जिससे गांव से सीधे अस्पताल तक बिना रुकावट के गर्भवती महिला पहुंच सके। पर वो सड़क सिर्फ पांच सौ मीटर बनकर रह जाती है। और अस्पताल तक पूरी सड़क तैयार ना होने के कारण बरसात में कीचड़ में बैलगाड़ी का पहिया फंस जाता है और मोहना की बहू कजरी की मौत हो जाती है। वो पागल हो जाता है। गांव वाले अगले सत्र का बजट पेश होने से पहले बजट चुरा ले आते हैं ये देखने के लिए बजट आता तो है पर जाता कहां है?
फिर नारस्सिज़म पर एक व्यंग्य नाटक लिखा “आठवां सुर उस पर दसवीं ताल” नारस्सिटिक हर वो व्यक्ति है जो स्वप्रशंसा का मारा हुआ है। ये लोग हमारे, आपके बीच ही होते हैं पर हमें नहीं पता चलता कि ये एक मानसिक रोग से ग्रसित हैं। जिसे नारस्सिज़म कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति अपनी आत्म प्रशंसा करना और करवाना अपना परम कार्य समझते हैं। उन्हें हर वक्त अपनी प्रशंसा चाहिए और इसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है जैसे इस नाटक में एक युवा को लगता है कि वो दुनिया का बहुत अच्छा सिंगर है। उसकी मां भी उसको हमेशा प्रोत्साहित करती है कि वो दुनिया में एक दिन अपना नाम रोशन करेगा पर बाद में पता चलता है वो एक नारस्सिटक है जो एक प्रकार का मानसिक रोग है। समय रहते उसपर कंट्रोल पाना जरुरी है वरना ये बहुत नेगेटिव प्रभाव छोड़ सकता है।
एक सच्ची घटना से प्रभावित नाटक “मकान नंबर 407” जिसमें संदेश था कि परिवार के मुखिया को अपने परिवार को बताकर रखना चाहिए कि उसने कहां और कितना इन्वेस्ट कर रखा है। जिससे इमरेजेंसी में घर वाले उस पैसे का इस्तेमाल कर सकें। पर परिवार का मुखिया मर जाता है। पैसा है पर उसमें किसी का भी नाम नहीं है बतौर नौमिनी। पत्नी और उनकी तीन लड़कियां 16,18,10 साल की लड़कियां जीने की हर संभव कोशिश करती हैं पर जब कोई काम नहीं मिल पाता और भीख मांगने के दिन आ जाते हैं तब तय करती हैं कि उन्हें मर जाना चाहिए तब वो मरने की योजना बनाते हैं? और मरने के बाद उनको भगवान भी अपने घर में नहीं आने देता कि आत्महत्या समाधान नहीं है किसी भी समस्या का। उनकी बहस चित्रगुप्त के दरबान से होती है? बहुत सुनने समझने वाला परिवारिक नाटक है जिसको देखकर हर एक आंख में आंसू था और ये वादा कि हम अपनी इन्वेस्टमेंट को अपने परिवार को बता कर रखेगें। पब्लिक डिमांड पर इसे भी हमें दो बार करना पड़ा। और माई सन इज़ रेपिस्ट भी अब जल्दी ही दोबारा होगा। अभी तक तो बावरा मन थियेटर ग्रुप ने इतने ही नाटक किए हैं। जल्दी ही ये फेहरिस्त लंबी होगी।
क्या ऐसे नाटकों के ज़्यादा से ज़्यादा शो विश्वविद्यालयों में नहीं होने चाहिएं?
जरुर होने चाहिएं क्योंकि वहीं तो हमारा युवा और किशोर ज्यादा से ज्यादा सीखते हैं। अगर कम उम्र में इन बच्चों के दिलों में ये बात बस जाएगी की हमें एक अच्छा इंसान बनना है तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं कम ही होगीं और अगर इसका अभ्यास हो गया तो ना के बराबर होगीं ऐसी घटनाएं।
अगला नाटक कौन सा करेंगी?
मेरे नाटक अधिकतर कंट्रोवर्सल ही होते हैं ये लोग कहते हैं और शायद ये सच ही है जिन विषयों के बारे में कोई सोचता भी नहीं है वो मेरे दिलो दिमाग़ मे घूमते रहते हैं “छक्का या मीठा” ये मेरा अगला नाटक हो सकता है। देखा ही होगा कि हम किसी को भी आसानी से ये शब्द कह जाते हैं। और हंसते हैं पर सोचा है कभी जिसे आपने मात्र ये शब्द कहा है उसके साथ क्या हो रहा होता है क्या गुजर रही होती है उस पर। आप ख़ुश किस्मत हैं कि आप वो नहीं हैं, पर अगर होते तो? बहुत से सवाल छोड़कर जाएगा ये नाटक शायद इसे देखने के बाद लोग ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना बंद कर देगें। जिनको समाज से अलग समझते हैं उन्हें अलग नहीं समझेगें। “यत्र-तत्र-सर्वत्र” भी कर सकती हूं जिसके बारे में मैं पहले ही ज़िक्र कर चुकी हूं।
आपकी रंगमंच को लेकर अब तक के अनुभव और चुनौतियां क्या रहीं हैं?
चुनौतियां ही चुनौतियां हैं रंगमंच में एक नाटक मतलब सवा लाख से डेढ़ लाख का खर्च। हम लोग अपनी जेब से पैसा खर्च करते हैं। थियेटर मेंटन नहीं होते। एक एमाऊंट थियेटर वालों को देने के बाद भी वहां इमरजेंसी में कितने पैसे देने पड़ जाएं आप सोच भी नहीं सकते। थियेटर मतलब माईक बढ़िया होगें। पर नहीं आवाज ही नहीं आती। तो फिर लेना पड़ता है फुट माईक उसके अलग पैसे दिजिए आप कुछ कर भी नहीं सकते। वहां का स्टाफ आपकी हेल्प के लिए दिया जाएगा जो सिर्फ़ कुर्सियों पर बैठा रहेगा। कुछ काम कहा तो आ रहे हैं चाय पीकर फिर वो नाटक शुरु होने से पहले कुछ देर के लिए इधर-उधर लाईट सेट कराएगें फिर नाटक खत्म होते ही वो नहीं उनके बढ़े हुए हाथ दिखाई देते हैं जिनपर पैसे रखना हमारी मजबूरी होती है। पर ये कोई नहीं सोचता कि एक नाटक ग्रुप कैसे-कैसे अपनी मेहनत की कमाई इस पर लगा रहा है। बावरा मन पहला ऐसा थियेटर ग्रुप है जो अपने कलाकारों से पैसे नहीं लेता। ऐसा ही रहा तो हमें भी पैसे कमाना सीखना पड़ेगा।
बावरा मन थियेटर ग्रुप का वायदा है देखने वालों से कि उसके दर्शक जब भी हमारे नाटक देखने आएगें तो निराश होकर नहीं जाएगें। वो कुछ ना कुछ इतना बड़ा मैसेज लेकर जाएगें जो उनकी ज़िंदगीं को बदल देगा। गुजारिश है दर्शकों से कि वो नाटकों को प्रोत्साहन दें। नाटकों को ज्यादा से ज्यादा देखने जाएं। यहीं से फिल्मों के कलाकार बनते हैं और यहीं से आपका मंनोरंजन भी होता है।
नाटक माई सन इज़ रेपिस्ट
बावरा मन थियेटर का ग्रुप का नाटक” माई सन इज़ रेपिस्ट “ का टाईटल पढ़ते और बोलते वक्त़ लोग रुक जाते हैं क्योंकि ऐसा समाज में हो रहा है, ये तो मानते हैं पर ये किस के लड़के कर रहे हैं ये मानने को तैयार नहीं होते। क्योंकि अपना भाई अपना पिता अपना बेटा सबको पाक़ साफ़ लगता है पर सवाल ये है कि फिर ये लोग कौन हैं? जो सड़क पर चलती हुई लड़कियों को सिर्फ़ एक मांस का लोथड़ा समझते हैं जिसे उठाया नोंचा मसला और किसी गंदे नाले के सामने फेंक दिया। किस्मत अच्छी हुई तो कोई उस चीथड़े हुए शरीर को उसके घर पहुंचा देगा वरना तो गली के कुत्ते उस पड़े हुए ज़िंदा मांस के लोथड़े को अपने दांतों हाथों में फंसाए खेलते नज़र आएगें। इस नाटक में ये किसके बेटे हैं ये किसके भाई हैं ये सवाल नहीं पूछा है बल्कि एक मां ने मजबूर होकर ये जिम्मेदारी ली है कि अगर मैंने आज अपने बेटे को सज़ा नही दी तो मैं कभी भी अपने और इस समाज की किसी भी बेटी से आंख नहीं मिला पाऊंगी। इस नाटक से आप आख़िरी पल तक बंधे रहेगें ये इतना पावरफुल नाटक है इसको लिखा और निर्देशित किया है सुनीता योगेश अग्रवाल ने। जो बावरा मन थियेटर की फाऊंडर भी हैं।
“माई सन इज़ रेपिस्ट” नाटक में दस कलाकारों ने काम किया है जिसमें रेडियो की प्रख्यात एनाऊंसर और आर्टिस्ट राजश्री मां का रोल निभाया है। चंद्रकांत भंडारी जो बावरा मन थियेटर के फाऊंडर आर्टिस्ट हैं वो पिता का रोल में हैं। हार्दिक बेटे की भूमिका में हैं। रेनू चौहान दादी की भूमिका में हैं। मिनकी का किरदार शताक्षी शर्मा। मिनकी की मां का रोल बाबुशा शर्मा, डाक्टर आनंद की भूमिका में डाक्टर राजीव टंडन। मिनाक्षी शर्मा एक ऑफिस की सेक्सुली हैरास हुई लड़की की भूमिका में है। और मोहित ने एक ट्रांसजेंडर की आपबीती सुनाया हैं।
इस ग्रुप की फाऊंडर सुनीता योगेश अग्रवाल एक डाक्यूमेंटरी फिल्म मेकर हैं जिन्होंने हेल्थ, वाटर एंड सेनिटेशन, शिक्षा का महत्व तथा अन्य मुद्दों पर डाक्यूमेंटरी बनाई हैं। इनका अपना एक यूट्यूब चैनल भी है जिसकी फिल्में बहुत ही अलग मुद्दे उठाती हैं। वो समाज के सामने सवाल नहीं छोड़ती वो सोल्यूशन बताती हैं। ये उनके काम की खासियत है। अगर आप इस ग्रुप से जुड़ना चाहते हैं तो आप बावरा मन 14325@gmail.com या उसके इंस्ता हैंडल पर संपर्क कर सकते हैं।
अरविंद कुमार की बातचीत
Posted Date:October 11, 2025
10:28 am