मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के कई रंग

  • रवीन्द्र त्रिपाठी

आलोक चटर्जी एक बेहद चर्चित और स्थापित नाट्य अभिनेता है। पर एक संस्थान को रचनात्मक दिशा देने की उनकी क्षमता तब उजागर हुई जब पिछले हफ्ते मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय का नाट्य समारोह हुआ। इस संस्थान का निदेशक बने उन्हें सिर्फ नौ-दस महीने ही हुए है पर एक पूरे सत्र में जिस तरह के स्तरीय नाटक हुए उससे तो ऐसा ही लगता है कि ये विद्यालय एक जबर्दस्त ऊर्जा से संचारित हो रहा है। इस समारोह में कुल चार नाटक हुए और चारो भिन्न शैलियों के थे। पहला नाटक अरुण पांडे द्वारा निर्देशित  था –`हंसा करले किलोल’। दूसरा था सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ के निर्देशन में `बरी द डेड’ (दफ्न करो)। तीसरा था देवेंद्र राज अंकुर के निर्देशन में `परसाई के संग प्रेम के तीन रंग’ और चौथा था `वेनिस का सौदागर’ जिसका निर्देशन बापी बोस ने किया था।

इन चारो नाटक या प्रस्तुतियों में एक बात समान थी। सभी गुणवत्ता लिए हुए थीं और रंगमंच की चार पंरपराओं से जुडी थीं- लोकसंस्कति से, अंतरराष्ट्रीय रंगमंच से, हिंदी साहित्य से और शेक्सपीयर से ।  और  ये साधारण छात्र प्रस्तुतियां नहीं  बल्कि किसी  प्रोफेशनल नाट्य दल की  लग रही थीं। मजे हुए कलाकार और जरूरत के मुताबिक शानदार डिजाइन। उतना ही बेहतर संगीत और प्रकाश परिकल्पनाएं।  साफ लग रहा था कि पूरे सत्र के दौरान रंगकंर्म के हर क्षेत्र का प्रशिक्षण विद्यार्थियों ने पाया है। मध्य प्रदेश कई तरह की सांस्कृतिक और रंग परंपराओं का इलाका है। यहां बुंदेलखंड भी हैं, मालवा भी है, मध्य भारत भी हैं और विध्य का बघेलखंड भी है। सबमें अलग अलग बोलियां है जिनकी अपनी मिठास है और अपनी सुंदरता भी।

ये अच्छी बात है कि मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के छात्र पिछले सत्र में निर्देशक अरुण पांडे के सानिध्य में बुंदेलखंड की यात्रा पर गए और वहां की ऐतिहासिक कहानियों और सांस्कृतिक यादों के आधार पर `हंसा करे किलोल’ नाटक तैयार किया।  प्रसंगवश ये कहना भी जरूरी है बुंदेलखंड का आधा हिस्सा मध्य प्रदेश मे है और आधा उत्तर प्रदेश में। पर मध्य प्रदेश वाले हिस्से के बुंदेलखंड का सांस्कृतिक व्यक्तित्व ज्यादा उभरा है और उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने बुंदेलखंड के इलाकों की सांस्कृतिक विरासत को उभारने पर कम ध्यान दिया है।

 बहरहाल . ये अलग विषय हैं और इस नाटकों तक सीमित रहें तो सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ के निर्देशन में हुआ `बरी द डेड’ एक युदध विरोधी नाटक है। इरविन शॉ का लिखा ये नाटक कुछ कुछ रहस्यात्मक भंगिमा लिए हुए है जिसमे  एक अनाम युद्ध मे मरे हुए सैनिक दफ्न होने से इनकार करते हैं। इसका मिजाज जरूर रहस्यात्मक है लेकिन विषय के स्तर पर यथार्थे से जुड़ा है। ये एक ऐसा नाटक है जिसमें कोई केंद्रीय चरित्र नहीं है या यों कहें कि हर चरित्र बराबर महत्त्व रखता है। देवेंद्र राज अंकुर ने हरिशंकर परसाई की  जिन कहानियों को मंच पर उतारा उनके मूल में भारतीय समाज में प्रेम की समस्या है। बीसवी सदी के गुजर जाने के बाद भी भारतीय समाज में युवा लड़कों और लड़कियों के बीच प्रेम स्वाभाविक चीज नहीं है और इसके मिसाले आज भी रोज मिलती रहती है।

बापी बोस के निर्देशन में हुआ `वेनिस का सौदागर’ शेक्सपीयर के मशहूर नाटक `मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का हिंदी अनुवाद था। ये जगत प्रसिद्ध नाटक है और इसमें पश्चिमी समाज में यहूदियों और ईसाइयों के बीच धार्मिक विद्वेष,  कोर्टरूम ड्रामा और यूरोप में आरंभिक दौर में उभरते पूंजीवाद के आंतरिक तनाव दिखते हैं। निर्देशक और अभिनेताओं- अभिनेत्रियों ने इन पहलुओं को बेहतरीन तरीके से मंच पर उभारा। नाटक मंचसज्जा और प्रकाश योजना के नजरिए से भी कल्पनाशीलता लिए हुए था। समारोह के चारो नाटक न सिर्फ विद्यार्थियों के लिए बल्कि दर्शकों के लिए भी अलग अलग तरह के अनुभव देनेवाले थे।

Posted Date:

July 24, 2019 3:10 pm

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