क्या हिंदी में प्रतिरोध साहित्य काफी लिखा जा रहा है?

पिछले दिनों जनवादी लेखक संघ ने प्रतिरोध की काव्य संध्या का आयोजन किया जिसमें बड़ी संख्या में कवियों ने भाग लिया। लेकिन सवाल है  कि क्या हिंदी में लिखे जा रहे लेख कविताओं का कोई असर समाज पर  पड़ रहा है? क्या ये कविताएं सत्ता को चुनौती दे पा रही हैं? विमल कुमार का आलेख..

कुछ सालों से यह कहा जा रहा है कि हिंदी में प्रतिरोध साहित्य नहीं लिखा जा रहा है या अगर लिखा जा रहा तो वह पर्याप्त  नहीं है और उसका  व्यापक असर समाज पर नहीं है?

इन सवालों का बहुत सरलीकृत ढंग से जवाब नहीं दिया जा सकता है पर यह सच है कि हिंदी के लेखकों का समाज पर अब कोई प्रभाव नहीं  रहा है जैसा कभी दिखाई देता था। वैसे हमारा समाज भी बदल गया है। वह सत्तर के दशक के समाज नहीं रह लेकिन यह भी सच है कि आज हिंदी में कोई  प्रेमचन्द, निराला, दिनकर, मुक्तिबोध, नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, धूमिल, दुष्यंत और अदम गोंडवी, गोरख पांडेय भी नहीं हैं जिससे हिंदी पट्टी की जनता खुद को जुड़ा महसूस करती हो। अगर आज जनता किसी से जुड़ा महसूस करती है तो वे कुमार विश्वास, अशोक चक्रधर और सुरेंद्र शर्मा जैसे लोग हैं जो प्रतिरोध का साहित्य नहीं लिखते बल्कि सत्त्ता प्रतिष्ठान से जुड़े रहते  हैं और साहित्य का बाज़ार बनाने में लगे हैं। उनके लिए साहित्य एक तरह का मनोरंजन है तो क्या यह मान लिया जाय कि अब प्रतिरोध का साहित्य नहीं लिखा जा रहा है और उसका कतई असर नहीं।

लेकिन ऐसा नहीं है, हिंदी में प्रतिरोध कविताएं काफ़ी लिखी जा रही हैं और पहले भी लिखी गयी हैं। आज सोशल मीडिया पर भी लिखी जा रही हैं लेकिन जरूरत है कि  वे लोगों तक पहुंचाई  कैसे जाएं और  उपन्यास और कहानियों में प्रतिरोध किस  रूप में चित्रित हो कि जनता तक बात पहुंचे और उन पर चर्चा हो। पर क्या आज  के लेखक अपना धर्म और दायित्व निभा रहे ? वे आत्ममुग्ध अधिक नहीं  हों गए हैं और बाजार के हाथ में नहीं  खेल रहे हैं। वे लिट् फेस्ट में डूबे हुए नहीं  हैं। क्या यह सच नहीं कि साहित्य की नई संस्कृति विकसित हुई है। आयोजक और प्रकाशक अपने बाजार तलाशने में लगे हैं। अब लिट् फेस्ट में शार्ट लिस्टेड किताब का भी खेल शुरू हो गया है।

पिछले दिनों गौहर रज़ा, देवी प्रसाद मिश्र, केशव तिवारी ने शॉर्टलिस्ट की सूची से अपने को खुद अलग किया क्योंकि कलिंगा लिट् फेस्ट में अडानी का पैसा लगा है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की फंडिंग भी जनविरोधी ताकते करती हैं लेकिन हिंदी के लेखक विरोध और बहिष्कार नहीं कर पाते। 2014 के बाद जिस  जोर शोर  से पुरस्कार वापसी अभियान शुरू हुआ और सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान शुरू हुआ वह आगे नहीं बढ़ा बल्कि ठंडा हो गया। जयपुर में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के विरोध में समानांतर जन फेस्टिवल शुरू हुआ लेकिन उसने भी बाद में गति नहीं पकड़ी। उसका राष्ट्रीय असर नहीं पड़ा। स्त्रियों और दलितों ने जो प्रतिरोध व्यक्त किया वह भी अस्मिता विमर्श से अब ऊपर नहीं उठ पाया। उनके लिए प्रेम, निजता, व्यक्तिगत संघर्ष, परिवार, बच्चे, अकेलापन और सामुदायिक संघर्ष तो है पर व्यापक राजनीतिक संघर्ष बन नहीं पाया क्योंकि दलित राजनीति ने भी समझौते कर लिए। यह भी देखा जा रहा है जो लेखक प्रतिरोध साहित्य लिख रहे हैं वे साहित्य के सत्ता प्रतिष्ठान से समझौता कर लेते हैं, वे उसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठा पाते। इसमें वामपंथी लेखक भी शामिल हैं। साहित्यकार को हर तरह के अन्याय औऱ सत्ता प्रतिष्ठान  का विरोध करना चाहिए, तभी बात बनेगी लेकिन “आज तक”  और “कलिंगा अवार्ड” के प्रसंग में लेखकों का विचलन देखा गया। अब लेखका भाजपाई मंत्रियों से पुरस्कार लेते दिखाई दे रहे हैं। हिंदी में इसको लेकर काफी बहस सोशल मीडिया में देखने को मिली।

बहरहाल प्रतिरोध के साहित्य को संकलित करने के कुछ प्रयास हुए हैं। कवि पत्रकार संजय कुंदन ने  ‘गहन है यह अंधकार’ नामक एक सुंदर संचयन निकाला है जिसमें 25 कवि  शामिल हैं।

यह  संचयन देखकर असद ज़ैदी के दो खंडों में प्रकाशित दस वर्ष और रणजीत वर्मा द्वारा संपादित प्रतिरोध की कविताओं के संचयन तथा रजा फाउंडेशन द्वारा हिंदी के दिवंगत कवियोँ की प्रतिरोध कविता के संचयन की याद आना स्वाभाविक है। रज़ा के संचयन में निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय,  धूमिल, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल आदि  की कविताएं हैं।

हाल ही में कवि विशाल श्रीवास्तव द्वारा उत्तरप्रदेश के जलेस से जुड़े 48 कवियों की कविताओं का संचयन आया जिसमें 14 कवयित्रियाँ भी शामिल हैं। इसमें भी कई कविताएं प्रतिरोध की कविताएं हैं। पिछले दिनों प्रेम तिवारी के संपादन में एक संयुक्त कविता संग्रह “जमीन की कविता-1’ आया है। इस संग्रह में वक्त के बदलाव को दर्ज करने वाले 45 कवियों की 140 कविता को स्थान दिया गया है।

इससे पहले विष्णु नागर का संग्रह मैँ ऐसा हिन्दू हूँ मै भी प्रतिरोध की काफी कविताएं हैं। वे 2014 के बाद लगातार इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ तीखे अंदाज़ में लिख रहे हैं।

हरे प्रकाश उपाध्याय का नया संग्रह –हर जगह से भगाया गया हूँ भी प्रतिरोध की कविताएं लिए हुए है। अजय सिंह, असद ज़ैदी, कौशल किशोर, देवी प्रसाद मिश्र, कुमार अम्बुज, कात्यायनी, मदन कश्यप, रणजीत वर्मा, कविता कृष्णपल्लवी, अमिताभ बच्चन,  पंकज चतुर्वेदी,  मुकुल सरल, अदनान कफील, दरवेश, विहाग वैभव  जैसे अनेक कवि प्रतिरोध  की कविताएं लगातार लिख रहे हैं। लेकिन क्या वे लोगों तक पहुंच रही हैं?

जबलपुर में मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने प्रतिरोध की कविताओं के पाठ का आयोजन किया जिसमें कुमार अम्बुज, कात्यायनी, नेहा नरुका जैसे कवि शामिल रहे।

जलेस कार्यक्रम का आगाज करते हुए दिल्ली जलेस सचिव प्रेम तिवारी ने कहा, “इतिहास में जब यह दौर दर्ज होगा तो उसमें यह भी जरूर दर्ज होगा कि तीन पीढ़ियों के इंकलाबी कवियों ने एक साथ मंच साझा किया।”

उत्तर प्रदेश जलेस के सचिव और कवि नलिन रंजन सिंह ने कहा, झूठ के दौर में सच का पक्ष लेना है तो खतरा तो उठाना ही होगा। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे। आज के दौर का खलनायक बड़ा है तो नायक को भी सशक्तता से खड़ा होना पड़ेगा और यह काम हमारे दौर के कवि बखूबी कर रहे हैं। जलेस दिल्ली के कार्यकारी अध्यक्ष बली सिंह ने  धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि उन्होंने ख्वाबों की ऐसी ताबीर बताई कि वहां मौजूद लोग देश-दुनिया के फाल को लेकर सभी स्तब्ध हो गए। लेकिन अपने उसी रोचक अंदाज में इस नाउम्मीद दौर में सपनों के बदलते रूप-रंग में कंपकपाता सा ही सही उन्होंने उम्मीद का एक दिया भी जला दिया, भले वह टिमटिमा रहा था, लेकिन उसकी रोशनी उन्मुक्त उड़ने वाले जुगनुओं का एहसास दिला रही थीं।

कवि सम्मेलन की खास बात यह थी कि अधिकतर कवियों के तेवर बगियाना थे। वसंत में कवि सम्मेलन होने के बावजूद उत्तर प्रदेश के कवियों की कविता इंकलाबी स्वर लिए हुए थीं और उनकी जमीन में विविधता भी थी।

नूर आलम ने छह दिसंबर, माधव महेश ने पत्थर का देवता, लोकतंत्र में विश्वास, लक्ष्मण प्रसाद ने शांत पथ, तालाबंदी, सलमान खयाल ने खबर और वारिस, अंर्तद्वंद्व,  ज्ञानप्रकाश चौबे ने सलीका, थोड़ा-सा खिसक जाएं, मतदान, बुशरा बेगम मोहब्बत का दरख़्त, खूबसूरत अलमारी, विशाल श्रीवास्तव ने मलबा, बसंत के बारे में बयान, फासिस्ट की कविता कैसे पहचाने, बेदखली, सीमा सिंह ने कितना गिरना शेष है, यह प्रेम कविता नहीं, धर्मराज ने कुंभ, मोनालिसा, गजब हुआ पतझड़, नलिन रंजन ने प्रूफरीडर, तुम कहां हो नजीब और नारे, शालिनी सिंह ने धूप के बंद दरवाजे, यात्राओं के अनुवाद, कथावाचक शालू शुक्ला ने स्त्री की अभिलाषा, सुनो कवि, हाउस वाइफ, बसंत त्रिपाठी ने दो मिनट का मौन, ज्यादा उत्सव, नए तंत्र में रामदास, आभा खरे ने प्रतिरोध के स्वर, हम समझदार बेटियां, महेश आलोक ने किसी दिन पत्थरों की सभा होगी, जैसी कविताएं सुनाई। इससे प्रतिरोध का एक व्यापक फलक बनता है। पर ये सब निरंतर हो और संयुक्त रूप से हो तब इसका असर पड़ेगा।

Posted Date:

February 24, 2025

12:22 pm

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