वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है

तीसरी कड़ी : कितने अलबेले  और कितने अज़ीम गायक थे किशोर कुमार  

यह हमें याद रखना चाहिए गमगीन-गीतों की शबाहत {FORM} को अपने हुनर का रंग देने में माहिर किशोर दा का मूल स्वर शोक-गीतों के लिए नहीं है। उनकी पहचान रोमांटिक -मूड के गीतों पर कहीं ज्यादा निर्भर रही। दो अलग पीढ़ियों के सुपर-स्टार देवानन्द और राजेश खन्ना के लिए ‘रोमांटिक- मूड और जवां- दिलों’ को जगाते गीतों में किशोर कुमार की आवाज़ ज्यादा फबती रही। फिल्म तीन देवियाँ  का–अरे यार ! मेरी तुम भी हो..गज़ब ! घूँघट तो जरा ओढ़ो… [देव आनन्द- कल्पना पर फिल्माया] गीत हो या फिर तनुजा-देव की ज्वैल-थीफ  फिल्म की जोड़ी पर फिल्माया…ये दिल ना होता बेचारा…कदम न होते आवारा गाना हो, ऐसे सभी गाने किशोर  कुमार ने अनूठे  और जज़्बाती अंदाज़ में गाए हैं। यह अलग बात है कि इन गीतों से भी ज्यादा  खुलापन और इकरार फिल्म- आराधना  के गीत—मेरे सपनों की रानी.. कब आएगी तू  के  बोलों में रचा-बसा माना गया। लेकिन ऐसे गीतों या बोलों से ही किशोर दा की गायन-शैली एक फ्रेम में कैद नहीं हो जाती। वहां तो अनन्त संभावनाएं बनी रहती हैं। खइके पान बनारस वाला (डॉन फिल्म का गीत) इसी संभावना का विरल विस्फोट है।

एक समय तक सहगल से बेहद प्रभावित इस संवेदनशील कलाकार-गायक के सुरों की खुली छोड़ दी गई रास को केवल एस.डी बर्मन ही काबू (अनुशासित) कर पाए। वर्ना तो-  किशोर कुमार के गीतों की एक असीमित सी मधुर-धारा हमारे दिलों  में निर्बंध ही बहती रही। मौसिकार खेमचन्द प्रकाश के संगीत-निर्देशन में रिमझिम  फिल्म में गाया, भरत व्यास का रचा- जगमग…जगमग..करता निकले..चँदा पूनम का..प्यारा  ¨गीत उन्हें चाहने वालों के दिलों में एक खास जगह बना चुका था। लेकिन इसके बाद भी किशोर को आवाज़ की दुनिया में मन्ना डे,  मुकेश, मोहम्मूद रफ़ी और तलत महमूद जैसे दिग्गज़ों के मुकाबिल ठहरने के लिए अपनी आवाज़ की वही ‘मौलिकता पकड़ने- पाने और फिर उसके जादू को बनाए रखने  के लिए सालों-साल संघर्ष करना पड़ा हो, ऐसा जान नहीं पड़ता। बर्मन दा  किशोर कुमार की उस सफलता और श्रम को पहचान देने की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उन्होंने ही किशोर कुमार के सुर के नयेपन और  लचीले-नटखट-स्वभाव व ढब को / निरालेपन को पहचान दी।

 बहार फिल्म के लिए किशोर से गवाया गया चंचल-गीत भी यहां याद आता है—कुसूर आपका / हुजूर / आपका,  मेरा नाम लीजिए / ना / मेरे बाप का !! करण दीवान और वैजयंती माला की जोड़ी पर यह गीत उस समय खूब फबता है। अलबत्ता, यह एक नये पा श् र्व-गायक और खुद उनके उस्ताद के लिए जोखिम वाला रास्ता था। लेकिन लीक से हटकर गीत और .गज़ल तक गाने वाले उसी किशोर ने संगीत की  दुनिया में संगीत की शिक्षा -दीक्षा पाये बिना ही अपना पुख्ता कदम रख दिया था।  उन्होंने अपने आत्मविश्वास के बल पर यश और नाम कमाया। शुरू-शुरू में  देवानन्द के अलावा राजकपूर के लिए प्यार  फिल्म में और प्रेमनाथ के लिए नौजवाज  में भी अपना स्वर दिया था।

किशोर कुमार अपनी ही बनाई फिल्म चलती का नाम गाड़ी  में यूं तो सभी गीतों में छाए नजर आए। लेकिन दो गीतों में – – प्रेम में हास्य के पुट के साथ बेजोड़ नजर आते हैं। ये गीत हैं:- दे दे मेरा पाँच रुपया बारह आना  और हम थे, वो थी और समां रंगीन, समझ गए ना !! इससे पहले मौसिकार मदन मोहन भी किशोर की आवाज़ में ही ऐसा दिल का हाल बयान करने वाला, हँसी भरा एक जोरदार गीत रेकार्ड कर चुके थे। इस गीत के बोल हैं :-  भइया..छोड़ो… बालम घर..जाना रे ! देखो..अच्छा नहीं…तड़पाना रे !!  पर बहुमुखी प्रतिभा के धनी किशोर की पहचान हवा सी ताजगी बिखेरती फिल्म झुमरू  से ही  बनी। उस  फिल्म में किशोर के इस गीत को याद कर कौन न झूम उठेगा :- ठंडी हवा ये चाँदनी सुहानी..ऐ..मेरे दिल सुना..कोई कहानी ! इसके  साथ ही दो और गीत : झूम रे झूम रे, दिल मेरा दिल ! मैं हूँ झुम..  झुम..  झुम..  झुम..  झुमररू !.. ”  और पतली कमर, तिरछी नजर .. ”  भी उसी किशोर कुमार की कर्णप्रिय, ताजगी भरी आवाज़ के परिचायक हैं। मुनीमजी  जैसी रोमांटि क-कामेडी में साहिर के लिखे गीत – जीवन के सफर में राही / मिलते हैं बिछड़ जाने को / और दे जाते हैं यादें / तनहाई में तड़पाने को  भी किशोर का नशीला और दर्दीला स्वर [ sad -version ] एक साथ ही, एक अलग पैमाने पर नई पहचान देता है। दशकों  बाद गाइड  फिल्म के बोल–गाता रहे..मेरा दिल  में वही सरमस्ती और नशात (हर्ष) स्वर में जाग उठते हैं। तो ताज़्जुब तो होता ही है।

उधर, गम  के गीतों में भी Mr.X in Bombay’ के  गीत मेरे महबूब क़यामत होगी,  कोई  हमदम ना रहा, कोई सहारा ना रहा.. भी दिल के भीतर की .कल.क / व्याकुलता / दुखदर्द और खालीपन की (अलग ही) कनाराकश तस्वीर बन गया है। हां, फिल्म खामोशी  का, कवाइफ़ [हालात बयान करता] अफ़्सुर्दगी का वो गीत वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है। [हमारे दिलों की गहराइयों में बसा] किशोर दा की क्लॅासिकी की जीवन्तता का प्रमाण है। आवाज़ का  ऐसा .कुल्ज़ुम (सागर) कहाँ मिलेगा, जो .कुल्फ़त (दुख-Sorrow, Distress)  की भीतर  हलचल मचाती लहरें भी संभाले हुए है और अपनी कुशादगी (विस्तार) में जीवन के कितने ही रंगों और खुशियों के कसीदे भी कारे-नुमायाँ उसी आवाज़ से पूर गया  हो। यही अलबेला-गायक काबिले ए’तिवार, सुर-अ.फ्रोज़- *अब्रे-नैसाँ*१  जितना दुःख के गीतों के  लिए जाना गया, उससे कहीं ज्यादा [अपनी स्वभावगत-कमजोरियों के साथ] प्रेम-गीतों में जान फूँकने की अपनी कला की कोमलता के लिए भी पहचाना गया। किशोर दा के अनोखे अभिनेता-रूप  की भी एक दुनिया रही है। निर्देशक और पटकथाकार की उनकी दृष्टि कई अनमोल फिल्में दे गई है। पर गायक  किशोर कुमार गांगुली के अफ़्ज़ल (Excellent) के बाद, कहने को- क्या कुछ शेष रहा होगा ! कुछ फिल्में-ऐसी भी रहीं जो उन्होंने  गंभीरता से निर्देशित कीं, vआज भी अनमोल हैं।

सत्यजित रे और किशोर कुमार का साथ

हिन्दी-सिनेमा को गीत-संगीत और कॉमिक-सिच्युएशन में साध कर, अपने अभिनय से जगमग करने वाले किशोर कुमार उड़िया, बांग्ला सहित अन्य बोलियों में भी अपनी आवाज़ से बाकी अँचलों को तर कर चुके हैं। यहाँ- सत्यजित रे की दो फिल्मों में किशोर दा की आवाज़ का होना उनकी सार्थकता के पैमाने छलकाना नहीं, बल्कि चारुलता और घरे बाइरे  में उनकी आवाज़ की जरूरत का अहसास कराना भी है। सत्यजित रे अन्य कलाओं के संग-संग संगीत /  रवीन्द्र-संगीत की बारीकियों और प्रयोगशीलता के भी बड़े पारखियों में से हैं। इन दोनों फिल्मों में किशोर कुमार की आवाज़ का महत्व वह महसूस कराते हैं।  उन जैसे समर्थ पर, हटीले – गायक की भी प्रयोगशीलता, प्रवीणता और लहजे की मुलामीयत को जानते-बूझते वह उन्हें अपनी इन दो अहम फिल्मों में मौका देते हैं। क्लॅासिक- फिल्मों की यथार्थ-शैली के और संभ्रात -बांग्ला–समाज की पृष्ठभूमि के भी सबसे बड़े जानकार सत्यजित राय  की पारखी-दृष्टि का भी इससे पता चलता है ! प्रमुखतः रवीन्द्र-संगीत के स्वर, टेक और शब्द- राग से जन्में  [टैगोर के रचे दो गीत]  सत्यजीत रे ने इन् फिल्मों में पुनर्सर्जित किए हैं। पर उन्हें अपने अंदाज से नायक-नायिका के मनोभावों को दर्शाने के लिए खूबसूरती से, बड़े ही फ़हम से इस्तेमाल किया गया है!  इस दृष्टि से किशोर दा की सुरीले ठहराव भरी आवाज़ में लयबद्ध करते हुए, उन्हें कम्पोज पहले ही कर लिया गया था।

माधवी मुखर्जी और सौमित्र चटर्जी पर फिल्माया गया पहला गीत  बांग्ला में सप्तसुरों में पारंगत बंगाल के प्रथम पा श् र्व – गायक के.सी. डे और  पारुल घोष की परम्परा में ही (ऊँचे सुरों में) है, लेकिन हटकर है। बोल हैं:–“तुम ठाको.. सिन्धु—पारे..ओ..गो बिदेशिनी..  {अर्थात:–तुम सागर पार की दुनिया में रहती हो, मैं जानता हूँ तुम, मेरी !  विदेश से आई मित्र !!} इसके बाद सत्यजित राय ने “घरे बाइरे” में भी किशोर कुमार की आवाज़् को तरजीह दी। कदाचित्, किशोर कुमार गांगुली की बेलौस [pure] -बहुमुखी-सांगीतिक ज़िन्दगी में सत्यजित रे की इस कदमबोसी की धमक बौद्धिक-परिसरों में ही सुनाई पड़ती है। • हिन्दी-सिनेमा का दर्शक-वर्ग इस पहल के प्रतिमानों से बे-.खबर या बा.खबर रहा होगा। जहां  किशोर कुमार गांगुली पहले से ही दीप्त-प्रदीप्त हैं।

 

Posted Date:

August 3, 2025

11:47 pm Tags: , , ,

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