किशोर कुमार: हरफ़नमौला ज़िन्दगी की सिम्फ़नी

 अपने हर गीत में नए प्रयोग करने वाले और आवाज़ का जादू दिखाने वाले किशोर कुमार हरफ़नमौला थे। अभिनय से लेकर गीत संगीत और फिल्म निर्माण और निर्देशन तक और अपनी शख्सियत में मस्तमौला। उन्हें याद करते हुए जाने माने लेखक- सिने पत्रकार प्रताप सिंह के आलेख की दूसरी कड़ी

किशोर कुमार के रोमान्टिक गानों के इस दौर और पूर्व-दीप्तियों के बाद के भी  शिखर-गीतों के लम्हे कितने ही पुरपेच रहे हों, पर वही उनके फ़राज़ की  निशानियों से भरपूर हैं। उनकी अलबेली (शास्त्रीयता से मुक्त) गायिकी की यादें  भी बाद की (शास्त्रीयता-युक्त) स्वर- लहरियों और उनके गुनगुने तरन्नुम के साथ  दिलों में बसी हैं। खिलंदड़ी सी आवाज़ का बहुआयामी रूप किसी दूसरे कलावन्त को (इतना) उस दौर में कम ही नसीब हुआ होगा। परदे पर भी किशोर कुमार के चलचित्रों में फर्तेशौक अभिनेता भगवान दादा जैसी बहक, नृत्य कला का करिश्मा ही रौशन होता दिखाई देता है। यह पा श् र्व -गायक अपनी आवाज़ की लरज, गमक, गूँज और तमाम  उपज का निरन्तर एहसास भी खूब कराता है। उनकी इस उपज के बीच-बीच में ठहाकों, कॅामेडी और करतबाई- अभिनयता का सिद्ध-रस भी सिर चढ़कर बोलता है। गमगीन – गीतों की खामोशी में धड़कती  ध्वनियाँ भी अलग से मन का चैन चुराती हैं।

अपने  शिखर दिनों में- किशोर दा सदाबहार अभिनेता देव आनंद, संजीव कुमार, धर्मेंद्र, राजेश खन्ना और अमिताभ  की रोमानी- ‘रोमांटिक- फिल्मों की ख्याति का कारण बनते हैं। उन्हें आराधना  के रूप तेरा मस्ताना  समेत कई फ़िल्मों की बेहतरीन जादुई मखमली आवाज़ की सुरमयता के  लिए आठ फिल्मफेयर पुरस्कार हासिल हैं। उनके अभिनय में हास्य  और उछल-कूद  की  भूल-भूलैया न होती तब भी- उनकी खनफ में पिरोयी गई सुगम-संगीत की मनभावन और विचित्र लहरियों का ठाठ ही उन्हें आवाज़ का जुगनू  कहलाने के लिए काफी है। यही वह जादू है जिसके दम पर वह रफ़ी,  मुकेश,  मन्नाडे,  हेमन्त दा, जैसे विदग्ध-शिरोमणियों के रहते दुनिया को अपनी लयकारी की तरफ़ मोड़ लेते हैं।  किंचित, उनका सम्मान करते हुए भावक उनकी आवाज़ की अमीरी को सैल्यूट भी करते हैं। यहां रफ़ी साहब की मिसाल देना ही काफी होगा। हाथी मेरे साथी- [1970]-[देवर की फिल्म] का गीत नफरत की दुनिया छोड़कर  किशोर दा गाते हुए–उस गाने के मिज़ाज को, संगीत के उतार-चढ़ाव के साथ महसूस नहीं करा पाए तो उन्हें लगा इस गाने के साथ मोहम्मद रफ़ी  ही न्याय कर सकते हैं। गम के गाने  में- जो दर्द चाहिए था आखिर रफ़ी साहब की लयकारी में ही संभव हुआ! और रफ़ी ने उनके लिए गा भी दिया ! सो दो बड़े गायकों की बात थी। उनके सहोदर-ख्याल की वह पहचान बाकी गानों में भी दिख पड़ती है।

मसलन, किशोर कुमार  कुछ और फिल्मों के जहाँ नायक है वहाँ भी, रफ़ी उन्हें अपने मीठे सुर से नवाजते नज़र आते हैं। जैसे कि शरारत और रागिनी  फिल्म के गीतों में। शरारत  में शंकर- जयकिशन के संगीत निर्देशन में– रफ़ी ने उनके लिए गाया- अजब है  दास्ताँ तेरी ऐ ज़िन्दगी । तो 1958 में बनी [नायक] किशोर कुमार की फिल्म  रागिनी  में जाँ-निसार अ.ख्तर के लिखे गीत को भी रफ़ी ने क्या खूब आवाज़ दी है। सितार के तारों के जादू के साथ रफ़ी के बोल.. [मन मोरा बावरा, नित दिन गाए..गीत मिलन के] ..ओ.पी. नैय्यर के संगीत की बंदिश में क्या खूब सजे  हैं। अपनी आदत है, सबको सलाम करना जैसे गीत भी किशोर दा के तेवर से परे के  हैं। लेकिन जो गीत एक-दूसरे की संगत की खातिर या सहजोड़ी के तौर पर  रफ़ी और  किशोर ने गाए हैं – उनका भी जवाब नहीं ! वहां दोनों की बढ़त सम पर है।  ‘Rendering  और वॉयस-क्वालिटी, रागदारी  का फ.र्क जरूर मालूम होता रहता है। यादों की बारात, निकली है आज..दिल के द्वारे  और सा..रे..गा..मा  तथा nothing  is  impossible  ऐसे ही गीत हैं। साथ-साथ जो रागदारी की उपज और भी हैं। पर उसमें भी खुद किशोर कुमार को ये चार महबूब-गाने भूले नहीं भूलते हैं। इन गानों के बोल हैं-  आने से उनके आए बहार / चाँद मेरा दिल, चाँदनी हो तुम / बदन  पे सितारे लपेटे हुए और चाँद सा रोशन चेहरा ! दोनों ही इन सरताज-गायकों के दौर को Golden Era में बदलने का श्रेय उस दौर के साकिब (प्रकाशमान)  हुनर-पसन्द..फहीम संगीतकारों को भी मिला। जो ऐसे गीतों को मिलने वाली पुरनूर आवाज़ों के असल नक्काश भी रहे। नौशाद, शंकर-जयकिशन, ओ.पी. नैयर, एस.डी. बर्मन, पंचम, जयदेव,  रौशन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ऐसे ही संगीत-गुरु हैं। ये गुरु 1950-60  के दौर में अन्य बड़े गायकों के साथ रफ़ी और कुछ हद तक किशोर दा को भी नसीब हुए।  लफ्जों के मायने आवाज़ में उतारने की कला हमारे गायकों को इन बड़े संगीतकारों के हुनर और अपनी जरखेज़-कला से .जहे-नसीब हासिल हुई। रफ़ी और किशोर दोनों ही एक दूसरे का पर्याय नहीं हैं। फिर भी रफ़ी ने किशोर दो के लिए उनकी मुख्लिसी (Sincerity ) के लिए हमेशा  अपने दिल में जगह बनाए रखी।

किशोर कुमार की आवाज़ के निरालेपन और रंग-तरंग के आईने में हमेशा कितना कुछ नया जुड़ता चला गया है। किशोर दा के  सजल-पारखी / मुरीद कनक  तिवारी ने ठीक ही कहा है-किशोर कुमार जब गाते थे तो शब्द/ शब्दकोश/ का अर्थ छोड़ कर, ध्वनि की चादर ओढ़ कर वैसे ही बने रहते थे जैसे कबीर की चादर उनके जाने के बाद जैसी की तैसी धरी है। किशोर दा की हड़बड़ी को नजरअंदाज करना  पहाड़ी नदी के इठलाते-कूदते मृग-शावकों और बच्चों की किलकारी की अनदेखी करना है। [साभार : ‘कला-वार्ता’ औरनयी दुनिया’]

दर’सल, किशोर कुमार की ऐसी गायिकी  के पीछे जातीय-चुलबुलापन   परम्परा  की गुणवत्ता से कुछ अलग ग्रहण करने की निजी कशिश भी है। वही उनके रोमांटिक गीतों की प्राणवत्ता (जान) है। ऐसे गीतों में सर्वाधिक मस्ती भरा गीत 1969  की फिल्म आराधना  का रूप तेरा मस्ताना  ही जैसे उनका स्वर- मुकुट  हो । इस गीत के लिए ही उन्हें पहला फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया था। ऐसे और भी कितने  ही गीत किशोर दा के रोमानी मस्ताने अन्दाज़ की खूबसूरत पायेदारी साबित भी हुए। लेकिन इन गीतों के नेपथ्य में भी इस  गायक की साधना, श्रम, सब्र, संयम का कोई आकाश है, जो उनके प्राणों में प्रदीप्त है और हम उसे देख नहीं पाते। वह चिन्तना की तरह छिपा रहता है। रियाज़ में उसकी झलक भर हमें दिख पड़ती है। इसी  साधना का नतीजा है कि उन्हें लता मंगेशकर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। इतना ही नहीं, 1997 में मध्य प्रदेश सरकार उनके लिए स्वनामधन्य अवॉर्ड किशोर कुमार अलंकरण की स्थापना करती है। (अब तक) इस अलंकरण के साथ 19 सिने-हस्ताक्षरों के नाम दर्ज हैं। किशोर दा की  अहमीयत, अर्ज़ोसमा और .फौकि.यत (श्रेष्ठता) भी इस अनमोल- अलंकरण में दर्ज है ! पर यह तो बहुत बाद का, उनकी  यादावरी को हर साल सींचते रहने का समय है।

किशोर कुमार हमारे लिए इसी यादावरी का मरकज़ और आसमान हैं- तो अपने जीवन में विविधताओं के साथ जीये  गए गीतों  और उन्हें संभालती अभिनयता  के कारण भी। कोई गीत उठा लीजिए- पता ही नहीं चलेगा कि यह एक सुरसाधक के मिज़ाज और महक से जन्मा है। चिक -चिकी,  बम.. ! चिकी –बम..बम  के साथ ही  चिक..पट डम..डम !!..डम..बम-बम..!! की लहक और  तुकबंदी ऐसे चुटीले गीतों को रौशन करने के लिए काफी है। किशोर दा ने ऐसे गीतों  की कतार खड़ी कर दी है।.. जो जलतरंग से जन्में मालूम होते हैं।

यही मखमली-स्वर जब  दुःख की पाती  किसी गमगीन सुर में  डूब कर गाता है। तो हम भूल जाते हैं कि किशोर दा की चहचहाहट अभी  हमने सुनी थी। उस पल तो बस खामोशी के पल ही ही  लो पिच पर  किशोर दा के मणिमुख से झरते से महसूस होते हैं !  जिनमें खोये  अकेलेपन  और सन्नाटे की गूँज में अलहदा-नमकीन सी गुनगुनाहट जाग उठती है!! जो  उनकी भी स्वर-पूँजी है ! ऐसे गीतों की बादशाहत हेमन्त दा के पास रही है।  पर  किशोर दा ने भी उन्हें अपनी आवाज़ की तरावट, तरंग और मल्कियत से पूरी .खला  में लहरा दिया है। किशोर दा के सुर की यह कारीगरी बीच-बीच में कुदरतन, उनकी  चहक-बहक के पास लौट आती है तो गमगीनीयत  फिर से किशोरीयत  में बदल जाती है। जो उनकी जन्मजात-कला का बार-बार स्पर्श कराती है। यही उस मौलिकता का ठिकाना है, जो एक गायक के वजूद की जड़ों में छिपा रहता है और उसे माँजते रहने  के अवसर प्रदान करता है। उसके लहजे को संवारता है। इसका अंदाजा अलबत्ता,  किशोर कुमार के शुरूआती चलचित्रों से नहीं होता। 1946 में शिकारी फिल्म  में बड़े भाई-बड़े  अभिनेता अशोक कुमार के साथ उनकी एंट्री  होती है। फिर भी, मन गायिकी की लहक-ललक लिए हुए है। 1948  में परदे पर आई फिल्म जिद्दी  देवानन्द जैसे सलोने- नायक की भी एक उदास-कथा के नायक के तौर पर यह पहली आज़्माइश है।  इस्मत चुगताई की इस कहानी, के रुपान्तरित होते-होते एक गमगीन-गीत की जरूरत आन पड़ी है। तब किशोर आवाज़ उस श्याम- श्वेत फिल्म में प्राण फूँकती  मालूम पड़ती है। किशोर दा का वह Solo- song मरने की दुआएँ क्यों  माँगू, जीने की तमन्ना कौन करे !  नायक और गायक दोनों के लिए इतिहास बन चुका है। वहीं बेशक, किशोर कुमार के लहजे में सहगल भी समाये हैं।

मुईन अहसान जज़्बी  की इस .गज़ल का असर बाद की फिल्मों के गानों में भी  देखा जा सकता है। ऐसा ही नायाब एक गीत किशोर कुमार ने लता जी के साथ, सालों बाद अगर तुम न होते  फिल्म के लिए गाया था। गुलशन बावरा के लिखे उस गीत के बोल हैं :–में और जीने की चाहत न होती, अगर तुम न होते।  पर कई  खुशनुमा-लम्हों के गीत भी किशोर के लहजे की चाहत और मलकियत बने हैं। जैसे ये बोल :–नीले-नीले अम्बर पर..चाँद जब आए / प्यार बरसाए.. हमको तरसाए !  प्यार  और दिल को परिभाषित करते ये बोल :- पल पल दिल के पास / या फिर .. तू है वही, दिल ने जिसे .. / क्या यही प्यार है।  इसके अलावा वादा करो, नहीं  छोड़ेंगे,  तेरा मुझसे है पहले का और उनका नग्मा –चलते चलते.. मेरे ये गीतमिस्टर एक्स इन बाम्बे  के गाने मेरे महबूब कमायत होगी  ने भी इतनी ही ख्याति कभी हासिल की थी। बहुत बाद के—फिल्म सफ़र,  अमरप्रेम  और खामोशी  के गीत भी  एक नई रंगत, तल्खी और रूहानीयत लिए हुए हैं। जिद्दी  में देवानंद  के नायक के गमगीनी के क्षणों में अपनी आवाज़ देने  वाले किशोर कुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कभी उन्हें हल्के में लेने  वाले संगीतकार सचिन देव बर्मन और दूसरे मौसिकारों ने बड़े मौके उन्हें ना भी दिए  हों। शायद मामूली- बोलकार  समझ उन्हें हल्के-फुलके गीत ही मय्यसर होने दिए।  लेकिन जब देवानंद के लिए  फंटूश  फिल्म में  किशोर कुमार की आवाज़ ने एक नया जादू जगाया तो उनकी दुनिया बदलनी शुरू  हो गई। 1957  की फिल्म फ़ंटूश  का वह गीत है–दुखी मन मेरे..सुन मेरा कहना..जहाँ नहीं..चैना..वहाँ  नहीं रहना ! इस गीत की धाक ऐसी जमी कि सबको उनकी लरज़ और लयकारी का लोहा मानना पड़ा। इसके बाद तो बर्मन दा ने ही मुनीमजी, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह से पेइंग गेस्ट, तीन देवियाँ ,  गाईड,  ज़्वेल थीफ,  प्रेम पुजारी और तेरे मेरे सपने  तक किशोर कुमार की आवाज़ की दीवानगी को सुनहले-अवसर दिए। किशोर कुमार ने 1946  से 1987  के दौरान के अपने कैरियर की लम्बी पारी में करीबन 574 गीत गाए और 81 फ़िल्मों में अभिनय किया और 18 फिल्मों का डायरेक्शन भी किया। जो खुद का किरदार वह ज़िन्दगी में  निभा रहे थे- उसी की मस्त-मौला छवियाँ मानो पड़ोसन  सहित कुछ फिल्मों में दिख पड़ती हैं।

Posted Date:

August 3, 2025

11:30 pm Tags: , , , ,

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