बेशक संगीत की दुनिया बदल गई हो, पार्श्वगायन का अंदाज़ बदल गया हो, इलेक्ट्रानिक और एआई तकनीक ने संगीत के मूल तत्व, गायन शैली, आवाज़ का अंदाज़ सबकुछ बदल दिया हो, लेकिन साठ और सत्तर के दशक के सदाबहार गायक-गायिकाओं, संगीतकारों और गीतकारों ने जो खज़ाना दे दिया, वह अमूल्य है। आज भी हरेक की वही पसंद है। किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, मन्ना जे, तलत महमूद, हेमंत कुमार से लेकर शमशाद बेग़म, लता मंगेशकर, आशा भोंसले औऱ सुमन कल्याणपुर, गीता दत्त तक कोई भी नाम ले लें, हरेक की आवाज़ अब भी जब गूंजती है तो हम किसी और दुनिया में चले जाते हैं…. सदाबहार किशोर कुमार 4 अगस्त 1929 को खंडवा में जन्मे थे और उन्होंने फिल्म संगीत की दुनिया में जो कमाल किया, उसे बताने की ज़रूरत नहीं। किशोर कुमार की जयंती के मौके पर जाने माने लेखक-फिल्म पत्रकार और फिल्मों की गहरी समझ रखने वाले प्रताप सिंह ने अपनी किताब ‘इन जैसा कोई दूसरा नहीं’ में संपूर्णता से याद किया है। तमाम पहलू हैं किशोर दा के। 7 रंग के पाठकों के लिए प्रताप सिंह के आलेख को चार खंडों में हम प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें आपको इस गायक और शख्सियत के अनेक रंग मिलेंगे। पहली कड़ी में जानते हैं आभास कुमार गांगुली के किशोर कुमार बनने की कहानी और खासकर सिनेमा में पहचान बनाने की कहानी…
किशोर कुमार की जीवन और संगीत की बारादरी में मस्ती और फक्कड़पन अहम हैं । साथ ही फकीराना अंदाज भी!! “झुमरु” फिल्म और मजरूह के लिखे उसके बोल इसका सबसे सुंदर प्रमाण हो सकते हैं। उनकी अपनी शख्सियत का जादू भी वहां प्रतिबिंबित होता है। अलबत्ता, कहीं -कहीं दूसरी छटाओं के, उनकी बहुल- छवि रँगीले-रंगबाज गायक-नायक की रही है। हर्षित-मन का खिलंदड़ापन और आकाश जैसी चुप्पी में छाये गहन उदासियों के चढ़ते -उतरते रंग भी उनमें मौजूद हैं। सिनेमा की दुनिया में बेशक, वे पहले-पहल अपनी बेमेल अद्वियता के अति-प्रयोगशील आविष्कारक हैं। मौसीकी की उस बेमिसाल दुनिया में, उन जैसी सिद्धि की भी कोई दूसरी मिसाल नहीं। जो गायिकी की अपनी बेताज-गलियों में किसी बाहरी कठिन यूडलिंग -शैली को भी इतना अपना या प्रिय बना ले कि बाद के दिनों में, रफ़ी जैसा बड़ा गायक उनसे उसे सीखने-सिखाने की जिद करे! और जो खुद हमारी आदमकद – गायिकी के आईने के सामने ही अपने कच्चे-सुर की परवाह न करते हुए, अपनी इकसार पकड़ से ही उन जैसा.. यानी सहगल होना चाहे। या अभिनय की नाटकीयता में रमते हुए भी वही होकर दिखाए !! वह भी शुरू के दिनों में, बर्मन दा की मौजूदगी में ! वही अपनी अनूठी गायिकी की गलियों में रहते-रहाते, अभिनय ही नहीं.. डायरेक्शन में भी कभी-कभार महारत हासिल करने की कला को सार्थक कर दिखाए। गमगीनी से भरपूर .ग.जल को नये मिजाज का अर्श प्रदान करे । उसे साध ले। पर साथ ही दुखों के दरिया के पार की खुशनुमा घड़ियों में अगले ही पल लौट जाय ! पुरानी गायिकी में सैंध लगाते हुए अपनी निराली-सी आवाज़ से जीवन की तमाम नयी रंगीनियों को जन्म दे और उसी आवाज़ को अपने दिगंत में हौले से बसाकर, उसे सुनने में तल्लीन बाकी वैसी ही सरफिरी दुनिया के दिल में तत्काल उतार दे! उसे मनमौजी अंदाज में हर पल जीकर भी दिखाए! दर’सल किशोर कुमार कहते ही- एक ऐसी शख्सियत सामने आ खड़ी होती है जो हमारे सिनेमा की तमाम गलियों में मनमौज़ीपन के साथ भटकने-ठुमकने के बाद मानों अपनी आवाज़ की तहदारी के तश्कील { साकार } होने के साथ ही- ‘नग्मा-ए-पुरदर्द लिए हमारे दिलों में बस गई है। चुलबुले-गीतों के सफ़र से सहगल साहब की आवाज़ की अमीरी तक [हासिल करने] की, एक मुगन्नी (गायक) की यह महा-यात्रा बड़ी ही दिलचस्प रही होगी। इतनी दिलचस्प कि हाशिये पर रहते किशोर कुमार, संगीत के शिरोमणियों और नायक -महानायकों- नायिकाओं की पहली पसन्द होते चले गए। पर बड़े संगीतकारों की खुद के बारे में सोच को बदलने में और अपनी तरह की योडलिंग-{ यूडलिंग -शैली की }-गायिकी का सिरमौर, कहलाने में उन्हें वक़्त तो लगा। फिर भी वह महज़ ‘हिज मास्टर वाइस‘ का ठप्पा लगने से बच गए। संगीत की शिक्षा से दूर रहे किशोर ने ‘पंचम’ की खातिर ही शास्त्रीयता को अपनाया।
किंचित, अनूठी स्वर-लहरियों और साथ अभिनय में बोड़मपन से भी अनूठी पहचान कायम करने वाले उसी किशोर कुमार को एस.डी बर्मन, आर.सी. बोराल, खेमचन्द प्रकाश, सलिल चौधरी, पंकज मलिक, हेमन्त कुमार, नितिन बोस और सुखद आश्चर्य के साथ सत्यजीत रे का भी चहेता और मोतबर (भरोसे का)- मुगन्नी कहा जाता है। बर्मन दा के साथ किशोर की आखिर तक बनी रही। गंगोजमन जैसी जुगलबंदी और इस .गज़लसरा आवाज़ की पहरेदारी करने वाले बर्मन दा की दिली-तमन्नाओं और उसके हासिल की चर्चा तो हर कोई करता है। खुद किशोर कुमार, उन्हें एक पल नहीं भूल पाए। सलाहीयत हासिल कर चुके इस गायक ने नई मंजिलें खोजने के बाद भी उनसे यही सीखा और सीखते रहे—देख !.. किशोर..गाना अच्छा देना चाहिए।” बर्मन दा की इस सीख से बड़ा उनके लिए कुछ नहीं था।
पहली बार बड़े भाई अशोक कुमार उन्हें बर्मन दा से मिलाने ले गए तो उन्हीं का गाया गीत सुरमय होकर सम्मुख ही, बेहिचक पेश कर दिया –कौन नगरिया जावो रे, बंशी वाले ! सचिन देव बर्मन अचंभित हुए और बाद के दिनों में खुशी-खुशी बहार फिल्म में गाने का उन्हें मौका दे दिया। अपनी चुलबुली आवाज़ के डोरे डालकर उन्होंने गाया–कुसूर आपका ! हुजुर आपका / मेरा नाम लीजिए ना, मेरे बाप का !! .. आवाज़ की यह लचक और पहली सी अदाकारी भी चंद फिल्मों –बाज़ी, जिद्दी, शिकारी से नौकरी, मुसाफिर और पेइंग गेस्ट तक आते-आते उस नायक-गायक के अभिनय और गायिकी में भी अलग रंग लिए हुए है। सचिन दा ने जो गाना उनसे गवा दिया, वह तो अमर हो गया। लेकिन शुरुआती फिल्मों में गजब के मौसिकार खेमचन्द प्रकाश ने जिद्दी में, किशोर दा को गमगीनीयत का गायक पहली नज़र में ही सिद्ध कर दिया। संगीतकार सलिल चौधरी ने भी उनकी आवाज़ को परखा और एक नयी सान पर चढ़ाया।
पर एक बड़ी पारी सत्तर के दशक में पंचम (आर.डी. बर्मन) और किशोर दा की अलग से कामयाबी के शिखर छूने के लिए याद की जाती है। सदाबहार हसीन-गीतों की लड़ियाँ आर.डी. बर्मन ने जैसे किशोर कुमार की खातिर ही उस दौर में पिरोयीं थीं। क्या गाने थे..! एक से एक नायाब..जोशीले और सबके सब तमन्नाई ..!! ..ये जो मोहब्बत है / ये शाम मस्तानी / चिंगारी कोई भड़के.. / रात कली.. एक..ख्वाब में आई / मेरे नैना.. सावन भादों / हमें तुमसे प्यार है कितना.. क्या किशोर दा की—‘सिग्नेचर-ट्यून’ से कम हैं। ये गीत-मालाएँ…कटी- पतंग, खुशबू, अमर- प्रेम, बुडढा मिल गया, महबूबा और कुदरत फिल्म के इन मधुर-गीतों की धड़कन हैं। हमेशा के लिए ये गीत हर पीढ़ी के जीवन की लहरों को परिभाषित करते जवां-नग्मात की मिसाल बन गए ।
Posted Date:August 3, 2025
5:07 pm Tags: Kishore Kumar, Film Music, Bollywood music, Kishore Kumar Songs