साहित्य अकादेमी पुरस्कार इस बार शुरु से विवादों में रहे, खासकर उसपर पड़ने वाली संस्कृति मंत्रालय की छाया और सरकारी दबावों में आए अकादेमी के कामकाज को लेकर। बेशक जो पुरस्कार नवंबर में घोषित होने थे, वो मार्च में घोषित हुए, लेकिन इसे लेकर भी लेखकों और साहित्यकारों में अलग अलग राय देखने को मिली। हिन्दी की जानी मानी लेखिका ममता कालिया बेशक अकादेमी पुरस्कार की हकदार रही हैं, उनका साहित्यिक सफ़र इतना समृद्ध रहा है कि उन्हें ये पुरस्कार काफी पहले मिलना चाहिए था, लेकिन इस बार उन्हें जिस कृति के लिए यानी जीते जी इलाहाबाद के लिए पुरस्कत करने का फैसला लिया गया, उसे ही लेकर कई साहित्यकारों की अलग अलग राय है। वैसे पुरस्कारों की संस्कृति और इससे जुड़ी राजनीति को लेकर अक्सर चर्चा होती है, लेकिन पुरस्कारों की अपनी गरिमा रही है और उसे लेकर सवाल उठाने वालों को भी कम से कम निर्णायक मंडल को उतनी स्वतंत्रता देनी चाहिए कि उसे सम्मान के साथ स्वीकारा जा सके। वैसे तो जीते जी इलाहाबाद ममता जी के दिल के बहुत करीब रही है, वो इसलिए कि वह संस्मरणात्मक है और उसमें वो तमाम दौर हैं जिन्हें ममता जी ने रवीन्द्र कालिया के साथ जिया भी, महसूस भी किया और साहित्यिक परिदृश्य के उस दौर के किरदारों को अपनी निगाह से देखा और समझा भी। सबके बारे में अलग अलग लोगों की अलग अलग राय हो सकती है, ऐसे में किसी कृति या किसी साहित्यकार को ही सवालों के घेरे में लाना कहां की समझदारी है… खैर ये तो सवाल उठाने वाले जानें जिन्हें इस इंटरनेटी युग में सोशल मीडिया का सहारा मिल गया है। बहरहाल उन्ही साहित्यकारों में विमल कुमार भी आते हैं जो सवाल उठाते हैं। अब भला उनका तर्क क्या है, ये भी जान लीजिए। विमल कुमार जो अरविन्द कुमार के नाम से भी लिखते हैं। तो पढ़ते हैं उन्हीं अरविंद कुमार की राय और समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्यों निर्णायक मंडल के इस फैसले को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।

पिछले दिनों हिंदी की वयोवृद्ध लेखिका ममता कालिया को जब उनके संस्मरणों की पुस्तक “जीते जी इलाहाबाद” को साहित्य अकेडमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई तो सोशल मीडिया पर आमतौर पर सबने स्वागत किया पर कुछ लोगों ने इस किताब पर आपत्तियां भी दर्ज कीं। उनक़ा कहना था कि इस किताब में भैरव प्रसाद गुप्त जैसे लेखक सम्पादक और दूधनाथ सिंह जैसे प्रतिभाशाली लेखक पर अवांछित टिप्पणियों से लेखिका की मानसिकता का पता चलता है लेकिन अब जब इस पुरस्कार की दौड़ में शामिल 13 किताबों की सूची सामने आई तो कइयों के मन मे सवाल उठा कि क्या यह किताब इतनी महत्वपूर्ण किताब थी कि उसे यह पुरस्कार दिया जाना जरूरी था?
इस सूची में उषा प्रियम्बद का भी नाम है जो ममता कालिया से अग्रज पीढ़ी की हैं और कृष्णा सोबती और मन्नू भंडारी की समकालीन हैं। हिंदी कथा साहित्य में इनकी त्रयी काफी चर्चित रही है।अगर ममता जी को इस किताब पर यह अवार्ड दिया गया तो उषा जी को क्यों नहीं? वह भी उनकी तरह वयोवृद्ध और इस पुरस्कार से वंचित रही हैं।
(साहित्य अकादेमी के लिए इस बार हिन्दी के लिए प्रविष्ठियां)
अगर यह मान लिया जाए कि जूरी की नजर में उषा जी का उपन्यास “अर्कदीप्त “ममता कालिया की किताब से कमजोर था तो सवाल यह है कि क्या शिवमूर्ति का “अगम बहै दरियाव “,हृषिकेश सुलभ का “दाता पीर ” और रणेन्द्र का उपन्यास “गूंगी रुलाई का कोरस “भी ममता जी की कृति से कमजोर है क्योंकि ये किताबें भी दौड़ में शामिल थीं। इन तीन किताबों की इन दिनों बहुत चर्चा भी है औऱ ये नए तरह की महत्वपूर्ण कृतियाँ बतायी जा रहीं हैं। ममता जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलना चाहिए पर उनकी कमजोर कृति पर क्यों। वैसे यह अच्छी बात है कि साहित्य अकादमी के इतिहास में पहली बार संस्मरण विधा को यह पुरस्कार दिया गया लेकिन जब अजीत कुमार, प्रसाद जैन और दूधनाथ सिंह ने सुंदर संस्मरण लिखे तब इस विधा की किताबें क्यों पुरस्कृत नहीं हुईं। आत्मकथा विधा में भी पुरस्कार नहीं दिए गए अब तक और यहाँ तक कि बच्चन को भी उनकी कविता की किताब दो चट्टानें पर दिया गया उनकी आत्मकथा को नहीं जो सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।इस बार सोलह किताबों की सूची में लीलाधर मंडलोई का काव्य संग्रह भी थी तो क्या उसे देकर किसी दलित लेखक को सम्मानित करने का गौरव हासिल करना साहित्य अकादमी के लिए उचित नहीं होता ? इस संस्था पर अक्सर सवाल उठे हैं कि अकेडमी अवार्ड के मामले में दलितों मुस्लिमों और वंचितों की उपेक्षा हुई है।इन सच है कि ममता कालिया अपने रोचक संस्मरणों के लिए जानी जाती हैं पर दौड़ में शामिल बेहतर कृतियों को अनदेखा कर यह पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए।क्योंकि यह अवार्ड कृति को दिया जाता है ,व्यक्ति को नहीं लेकिन साहित्य अकेडमी वयोवृद्ध लोगों को यह पुरस्कार देकर बैकलॉग क्लियर करती रही है। रामदरश मिश्र को जब यह पुरस्कार दिया गया तो उन्हें उनकी कविता पुस्तक के लिए दिया गया जो अब तक पुरस्कृत काव्य संग्रहों में सबसे कमजोर किताब तो है ही रामदरश जी की भी सबसे कमजोर किताब है। उन्हें भी उनके उपन्यासों के लिए यह अवार्ड दिया जाना चाहिए था।
हम यह नही कह सकते कि ममता जी ने यह पुरस्कार पाने के लिए कोई यत्न किया होगा। इस उम्र में उन्होंने इस अवार्ड की उम्मीद भी छोड़ दी होगी क्योंकि उनके सामने कनिष्ठ लोगों को कई साल पुरस्कर दिए गए। जाहिर है ,यह निर्णय जूरी का होता है पर सवाल यह है की क्या जूरी के सदस्य भी किसी दवाब में रहते हैं ,क्या वे भी यह सोचते हैं कि अमुक को इस बार दिया जाना चाहिए क्योंकि उसकी इतनी उम्र हो गयी और साहित्य अकेडमी पुरस्कार नहीं मिला। क्या वे भी निबटाने का काम करते हैं। ममता जी से पहले चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा और मृदुला गर्ग को यह अवार्ड मिल चुका था और कहा जा रहा था कि ममता जी इससे क्यों वंचित रह गयीं जबकि उनकी सभी समकालीनों को मिल गया।
पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है जब साहित्य अकादमी ने तीन माह के विलंब के बाद अवार्ड घोषित किये गए तो क्या जूरी के लोग और पुरस्कृत लेखकगण यह सवाल उठाएंगे कि सरकार ने हस्तक्षेप क्यों किया? क्या हमारा लेखक इतना साहस कर पायेगा?
साहित्य अकेडमी के सचिव जब यौन प्रताड़ना के मामले में फंसे थे तब जूरी के सदस्य और आज के पुरस्कृत लेखक भी चुप थे।
क्या लेखक को सच के साथ खड़े होने की नहीं जरूरत है?
क्या हमारे लेखक जीते जी साहित्य अकेडमी पुरस्कार पाकर संतुष्ट होना चाहते हैं। यहाँ तक कि क्रांतिकारी लेखक संगठन से जुड़े रचनाकार भी पुरस्कार ले लेते हैं। वे लौटाने का साहस नहीं कर पाते। बहरहाल ,साहित्य अकेडमी ने ममता जी को यह अवार्ड देकर अपनी गरिमा बहाल करने की कोशिश की है और यह संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा शासन काल मे एक कांग्रेसी को अवार्ड दिया जा सकता है लेकिन कांग्रेस के शासनकाल में किसी भाजपाई को नहीं दिया जा सकता। क्या ममता कालिया को अवार्ड देकर अकेडमी ने अपनी छवि साफ कर ली है ,उसके दाग मिट गए हैं। क्या वह सरकार के इशारे पर काम नहीं करेगी। क्या 3 माह तक अवार्ड रोके जाने की घटना के तीखे विरोध के कारण सरकार झुक गयी और उसे अवार्ड घोषित करने पड़े।
– अरविंद कुमार
वरिष्ठ कवि, लेखक, पत्रकार और संस्कृतिकर्मी
Posted Date:
March 19, 2026
2:55 pm